अनुभूति से सीख
भूमिका मनुष्य का सबसे बड़ा सौंदर्य उसकी आत्मा की निर्मलता में निहित होता है। यह संग्रह, यह विचार, यह भावना—सब उस एक सरल लेकिन गहन इच्छा से उपजे हैं, जो कहती है: "मेरा दु:ख किसी के लिए हंसी की वजह भले बन जाए किंतु मेरी हंसी किसी के दु:ख का कारण न बने।" इस एक पंक्ति में वह सम्पूर्ण संवेदना सिमटी है, जो किसी शुद्ध हृदय से उपजती है। यह उस मन की पुकार है जो स्वयं पीड़ा सहने को तैयार है, पर किसी और को चोट पहुँचाना नहीं चाहता—चाहे वह शब्दों से हो, दृष्टिकोण से हो या फिर अपनी मुस्कान से। यह भाव किसी साधारण सोच का परिणाम नहीं, बल्कि एक विकसित, सजग और प्रेमपूर्ण चेतना का प्रतीक है। इसमें त्याग नहीं, बल्कि अपनत्व है। इसमें दया नहीं, बल्कि गहराई से उपजा वह भाव है जो दूसरों की आंखों के आंसू पढ़ लेता है—even before they fall. यह भूमिका उस मूल भावना को समर्पित है, जो मनुष्य को केवल जीवित नहीं रखती, बल्कि जीवंत बनाती है। जो सिखाती है कि जीवन केवल स्वयं के लिए नहीं, अपितु दूसरों की मुस्कान और उनके आंसुओं की गरिमा के लिए भी जिया जाए। यदि इस भावना को एक दीपक माना जाए, तो यह पुस्तक उसका लौ है—...