कवि और कविता
कवि और कविता भूमिका कविता केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि वह संवेदना की वह धारा है जो हृदय से फूटकर मानवता तक पहुँचती है। प्रस्तुत दोनों काव्य— कवि और कविता — इसी संवेदनात्मक प्रवाह के दो सशक्त आयाम हैं, जिनमें सृजनकर्ता और सृजन, दोनों का गहन और आत्मीय चित्र उभरता है। कवि शीर्षक से कविता में रचनाकार ने यह अत्यंत सूक्ष्म सत्य उद्घाटित किया है कि कवि कविता नहीं रचता, बल्कि कविता स्वयं कवि के भीतर जन्म लेती है। कवि का हृदय एक दर्पण है, जिसमें समाज का हर सुख-दुःख, हर पीड़ा और हर उल्लास प्रतिबिंबित होता है। वह स्वयं को भुलाकर जन-जन की वेदना को स्वर देता है। उसकी संवेदनशीलता ही उसे विशिष्ट बनाती है—वह रोते हुए को हँसा सकता है और हँसते हुए को विचारों में डुबो सकता है। राष्ट्रप्रेम, भक्ति और मानवीय करुणा का ऐसा समन्वय इस कविता को एक व्यापक सामाजिक दृष्टि प्रदान करता है। वहीं कविता शीर्षक वाली रचना में कवि ने कविता को एक जीवंत सत्ता के रूप में प्रस्तुत किया है—एक ऐसी बेटी, जो कवि के हृदय में जन्म लेकर समय, परिस्थिति और भावनाओं के साथ नृत्य करती रहती है। यहाँ कविता केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्क...