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मार्च, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कवि और कविता

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कवि और कविता भूमिका कविता केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि वह संवेदना की वह धारा है जो हृदय से फूटकर मानवता तक पहुँचती है। प्रस्तुत दोनों काव्य— कवि और कविता — इसी संवेदनात्मक प्रवाह के दो सशक्त आयाम हैं, जिनमें सृजनकर्ता और सृजन, दोनों का गहन और आत्मीय चित्र उभरता है। कवि शीर्षक से कविता में रचनाकार ने यह अत्यंत सूक्ष्म सत्य उद्घाटित किया है कि कवि कविता नहीं रचता, बल्कि कविता स्वयं कवि के भीतर जन्म लेती है। कवि का हृदय एक दर्पण है, जिसमें समाज का हर सुख-दुःख, हर पीड़ा और हर उल्लास प्रतिबिंबित होता है। वह स्वयं को भुलाकर जन-जन की वेदना को स्वर देता है। उसकी संवेदनशीलता ही उसे विशिष्ट बनाती है—वह रोते हुए को हँसा सकता है और हँसते हुए को विचारों में डुबो सकता है। राष्ट्रप्रेम, भक्ति और मानवीय करुणा का ऐसा समन्वय इस कविता को एक व्यापक सामाजिक दृष्टि प्रदान करता है। वहीं कविता शीर्षक वाली रचना में कवि ने कविता को एक जीवंत सत्ता के रूप में प्रस्तुत किया है—एक ऐसी बेटी, जो कवि के हृदय में जन्म लेकर समय, परिस्थिति और भावनाओं के साथ नृत्य करती रहती है। यहाँ कविता केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्क...

बुद्ध होना आसान है, स्त्री होना नहीं

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बुद्ध होना आसान है, स्त्री होना नहीं एक अंतर्संबंध की पड़ताल भूमिका मानव सभ्यता के इतिहास में त्याग और सत्य की खोज  को हमेशा एक उच्चतम आदर्श के रूप में स्थापित किया गया है। जब कोई पुरुष, जैसे गौतम बुद्ध, रात के अंधेरे में अपने घर-परिवार को छोड़कर ज्ञान की तलाश में निकलता है, तो समाज उसे महान कहता है, उसके इस निर्णय को विरक्ति  और उत्कर्ष का नाम देता है। वहीं, यही कार्य यदि एक स्त्री करे, तो वही समाज उसे कठघरे में खड़ा कर देता है। यही विरोधाभास इस काव्यांश का मूल भाव है—जहाँ बुद्ध होना एक उपलब्धि है, पर स्त्री होना एक निरंतर परीक्षा। यह रचना केवल एक तुलना नहीं करती, बल्कि एक गहरे सामाजिक और भावनात्मक अंतर्संबंध को उजागर करती है—कर्तव्य बनाम स्वतंत्रता, त्याग बनाम अपेक्षा, और व्यक्ति बनाम समाज। पुरुष के लिए त्याग व्यक्तिगत मुक्ति का मार्ग बन जाता है, जबकि स्त्री के लिए त्याग स्वयं को मिटाकर दूसरों में जीने की प्रक्रिया बन जाता है। यहाँ स्त्री की स्थिति केवल सामाजिक बंधनों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने भीतर भी बंधी हुई है—ममता, जिम्मेदारियों और भावनाओं के अदृश्य धागों से। यह...

दिशाबोधक सच्चे शब्दों का विश्लेषण

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 "फलदार शाख ही सदा  झुकना जानती है। विनम्रता ही इन्सान को  पहचान बनाती है, ऊंचाइयों पर पहुंचकर  जो सहज बना रहे, दुनिया उसी के व्यक्तित्व का मान करती है।" श्रीमती प्रमिला त्रिवेदी जी की इन पंक्तियों में एक बहुत गहरी और जीवन को दिशा देने वाली सच्चाई को बेहद सरल तरीके से कहा गया है। सरल विश्लेषण 👉 “फलदार शाख ही सदा झुकना जानती है” जिस पेड़ की शाखाओं पर फल लगते हैं, वह अपने आप झुक जाती है। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति गुणों, ज्ञान और उपलब्धियों से भरा होता है, वह स्वभाव से विनम्र हो जाता है। उसे घमंड नहीं होता। 👉 “विनम्रता ही इंसान को पहचान बनाती है” मनुष्य की असली पहचान उसके पद, पैसे या शक्ति से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और विनम्रता से होती है। लोग उसी को याद रखते हैं जो नम्र और सहज होता है। 👉 “ऊंचाइयों पर पहुंचकर जो सहज बना रहे” जीवन में आगे बढ़ना, सफलता पाना अच्छी बात है, लेकिन उससे भी बड़ी बात है कि उस सफलता के बाद भी इंसान अपने स्वभाव में सरल और सामान्य बना रहे। 👉 “दुनिया उसी के व्यक्तित्व का मान करती है” ऐसे व्यक्ति का समाज में सम्मान होता है। लोग उसे दिल से मान द...

पंचतत्व आकर्षण, विस्मरण और पुनर्स्मरण का रहस्य

पंचतत्व   आकर्षण, विस्मरण और पुनर्स्मरण का रहस्य मनुष्य जब अपने भीतर की स्थिरता खो देता है, तब वह बाहर किसी सहारे की तलाश करता है। कभी वह ऊँचाइयों की ओर भागता है, कभी गहराइयों में उतर जाता है, कभी वेग में स्वयं को भूल जाना चाहता है, तो कभी अग्नि-सी उत्तेजना में सब सीमाएँ लाँघ देना चाहता है। यह केवल व्यवहार नहीं, बल्कि भीतर छिपे उस तत्व-संबंध का संकेत है जिससे उसकी रचना हुई है। भारतीय दर्शन कहता है कि सृष्टि का प्रत्येक जीव पंचतत्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — से निर्मित है। यह कथन मात्र आध्यात्मिक उद्घोष नहीं, बल्कि एक गहन अनुभवजन्य सत्य है। 1️⃣ पृथ्वी : स्थिरता की पुकार पृथ्वी तत्व धैर्य, सहनशीलता और आधार का प्रतीक है। जब मनुष्य अस्थिर होता है, तब वह किसी ठोस धरातल की खोज करता है — चाहे वह किसी पर्वत की चोटी हो, किसी चट्टान का सहारा हो या किसी जीव का साथ। अस्थिर मन अंततः स्थिरता चाहता है। धरती पर लेट जाना, किसी वृक्ष के तले बैठ जाना, मिट्टी को स्पर्श करना — ये सब संकेत हैं कि भीतर का जीव अपने मूल आधार की ओर लौटना चाहता है। पृथ्वी हमें सिखाती है — जो जितना स्थिर है, वही उ...

बहुआयामी प्रतिभा की धनी सुश्री लता शर्मा 'निहान'

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✨ परिचय बहुआयामी प्रतिभा की धनी सुश्री लता शर्मा "निहान" साहित्य, कला, रंगमंच और सामाजिक सरोकारों की दुनिया में सक्रिय एक सशक्त व्यक्तित्व हैं। कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक और मंच संचालन से लेकर नृत्य, गायन व चित्रकारी तक उनकी रुचियां विविधता का आभास कराती हैं। साहित्यिक मंचों पर सम्मानित और सामाजिक कार्यों में संलग्न, वे न केवल एक लेखिका और रंगकर्मी हैं, बल्कि संवेदनशील उद्घोषिका और कथावाचक भी हैं। प्रस्तुत है उनसे एक संवाद— 🌸 साक्षात्कार प्रश्न १. लता जी, आपके व्यक्तित्व में साहित्य, कला और सामाजिक सरोकार एक साथ दिखाई देते हैं। आपको इस दिशा में आने की प्रेरणा कहाँ से मिली? उत्तर : "बचपन से ही किताबों और मंचीय कार्यक्रमों का वातावरण मिला। संवेदनशील मन हमेशा कुछ रचने और समाज से जुड़ने की ओर खिंचता रहा। यही प्रेरणा मुझे आज तक ऊर्जा देती है।" प्रश्न २. आप कविता, कहानी, लघुकथा और नाटक लिखती हैं। इनमें से किस माध्यम को अपनी सबसे प्रिय अभिव्यक्ति मानती हैं? उत्तर: कविता मेरे हृदय की सबसे निकट है, क्योंकि भाव तुरंत कविता का रूप ले लेते हैं। लेकिन कहानियां और नाटक मुझे समाज...