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समाज बोध से राष्ट्र निर्माण तक श्री सोमदत्त जी

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प्रेरक साक्षात्कार   समाज बोध से राष्ट्र निर्माण तक              श्री सोमदत्त जी संक्षिप्त परिचय श्री सोमदत्त सिंह जी का जन्म ग्राम–चक बारसपुर, जनपद अमरोहा में हुआ। आपने एम.ए. (हिन्दी, अर्थशास्त्र) एवं बी.एड. की शिक्षा अर्जित की। आपने वर्ष 1983 से 2019 तक राजकीय सेवा में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। आपकी सेवाओं का विस्तार इस प्रकार रहा— सहायक अध्यापक (माध्यमिक शिक्षा विभाग) – कृषक उपकारक इंटर कॉलेज, सदरपुर–मतलबपुर, मुरादाबाद परियोजना अधिकारी – साक्षरता/शैक्षिक योजनाएँ (जनपद बदायूँ एवं रामपुर) परियोजना अधिकारी (राजपत्रित) – प्रौढ़ शिक्षा विभाग, जनपद रामपुर सहायक अध्यापक – राजकीय इंटर कॉलेज (जनपद मुरादाबाद/अमरोहा) जिला समन्वयक (राजपत्रित) – मुरादाबाद/सम्भल प्रधानाचार्य (राजपत्रित) – राजकीय इंटर कॉलेज, अमरोहा बातचीत प्रश्न १. सोमदत्त जी, आपके जीवन की शुरुआत एक साधारण ग्रामीण परिवेश से हुई। इस पृष्ठभूमि ने आपके व्यक्तित्व को कैसे गढ़ा? उत्तर:  "गाँव का जीवन ही मेरा पहला विद्यालय...

खत: कागज़ पर उतरती हुई आत्मीयता

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खत कागज़ पर उतरती हुई आत्मीयता कभी संवाद इतना धीमा भी होता था कि उसमें प्रतीक्षा की धड़कनें सुनाई देती थीं। कभी शब्द इतने सजीव होते थे कि वे कागज़ पर नहीं, सीधे दिल पर लिखे जाते थे। वह समय खतों का था—जहाँ हर पत्र केवल सूचना नहीं, बल्कि एक जीवित एहसास होता था। खत … सिर्फ अक्षरों का संयोजन नहीं, बल्कि उन भावनाओं का विस्तार था, जहाँ जुबां की सीमाएँ समाप्त हो जाती थीं और आत्मा अपनी भाषा स्वयं चुन लेती थी। जब बोलना कठिन होता, तब लिखना सहज हो जाता। और यही सहजता, खतों को जादुई बना देती थी। खत पढ़ना— मानो किसी अनुपस्थित व्यक्ति की उपस्थिति को महसूस करना। शब्दों के बीच छिपी धड़कनों को सुनना, और हर पंक्ति में एक चेहरा उभरते देखना। कुछ पंक्तियाँ मुस्कान बनकर होठों पर ठहर जातीं, तो कुछ अनायास ही आँखों को भिगो जातीं। वह संवाद नहीं, संवेदनाओं का प्रवाह था— जो दूरी को अर्थहीन कर देता था। समय बीतता गया… तकनीक ने संवाद को तेज़ तो किया, पर उसकी आत्मीयता कहीं पीछे छूट गई। आज जब वर्षों पुराने खत हाथों में आते हैं, तो एक अनकहा प्रश्न मन में तैरता है— *क्या सचमुच खतों की खुशबू खो जाती है?* या वह हर बार उँगल...

विजया जी का पितरों को लेकर नज़रिया

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विजया जी का पितरों को लेकर नज़रिया भारतीय संस्कृति में पितृ केवल दिवंगत पूर्वज नहीं होते, बल्कि वे हमारे अस्तित्व की जड़, हमारे जीवन की अदृश्य सुरक्षा-रेखा और मार्गदर्शक शक्ति माने जाते हैं। विजया डालमिया जी का प्रस्तुत आलेख इसी गहन आस्था, अनुभव और भावनात्मक सत्य को अत्यंत सरल, किन्तु प्रभावशाली ढंग से उजागर करता है। पितरों की अवधारणा  आस्था और अनुभव का संगम विजया जी के अनुसार पितर वे पूर्वज हैं जो देह त्यागने के बाद भी अपने परिवार से जुड़े रहते हैं। वे केवल स्मृति मात्र नहीं, बल्कि एक जीवंत चेतना के रूप में हमारे जीवन में हस्तक्षेप करते हैं। उनका मानना है कि पितर समय-समय पर संकेतों के माध्यम से हमें सचेत करते हैं, हमारी रक्षा करते हैं और संकटों से उबारने का प्रयास करते हैं। यह दृष्टिकोण भारतीय परंपरा में निहित उस विश्वास को पुष्ट करता है कि जीवन और मृत्यु के बीच का संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं होता, बल्कि एक सूक्ष्म रूप में निरंतर बना रहता है। पितृकृपा के प्रत्यक्ष अनुभव विजया जी ने अपने जीवन की दो घटनाओं के माध्यम से पितरों की उपस्थिति को अनुभवात्मक रूप में प्रस्तुत किया है— प्रथम...

आत्मकथ्य — डॉ. अशोक कुमार चौधरी

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आत्मकथ्य  डॉ. अशोक कुमार चौधरी शब्दों से मेरा संबंध केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मा की उस धारा का प्रवाह है, जो जीवन के अनुभवों, संवेदनाओं और समाज के प्रति उत्तरदायित्व से निरंतर सिंचित होती रही है। साहित्य मेरे लिए साधना है—एक ऐसी साधना, जो व्यक्ति को स्वयं से जोड़ते हुए समाज के व्यापक सरोकारों तक ले जाती है। हस्तिनापुर साहित्य उत्सव जैसे विराट और गरिमामय आयोजन में मेरी पुस्तक का लोकार्पण होना मेरे लिए केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि यह मेरे साहित्यिक जीवन की एक भावपूर्ण और स्मरणीय साधना-पूर्ति का क्षण है। उस ऐतिहासिक धरा पर, जहाँ महाभारत की गूंज आज भी संस्कृति के कण-कण में जीवित है, अपने शब्दों को प्रतिष्ठा मिलना मेरे लिए अत्यंत विनम्रता और गर्व का विषय है। इस अवसर पर मैं विशेष रूप से इस आयोजन के जनक, दूरदर्शी व्यक्तित्व और प्रेरणास्रोत आयोजकों के साथ श्री यतीन्द्र कटारिया के प्रति अपनी हृदय से कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। उनकी कल्पना, प्रतिबद्धता और साहित्य के प्रति समर्पण ने इस आयोजन को केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया। उनके प्रयासों...

पूर्वोत्तर भारत की ‘सात बहनों’ की यात्रा

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पूर्वोत्तर भारत की  ‘सात बहनों’ की यात्रा किसी स्वप्निल लोक में विचरण करने से कम नहीं हैं ये यात्राएँ! प्राकृतिक सौंदर्य, अनूठी संस्कृतियों और पर्वत-श्रृंखलाओं के मध्य बिताए गए वे क्षण स्मृति-पटल पर एक अमिट छाप छोड़ जाते हैं। प्रस्तुत है इस यात्रा का एक संक्षिप्त, किंतु हृदयस्पर्शी संस्मरण। पूर्वोत्तर के आँगन में सात बहनों की एक झलक प्राकृतिक वैभव और हरियाली यात्रा की शुरुआत असम में ब्रह्मपुत्र के विशाल पाट और काजीरंगा के सघन वनों से हुई, जहाँ प्रकृति अपनी पूर्ण भव्यता के साथ मानो बाहें फैलाकर स्वागत करती है। मेघालय में बादलों का लुका-छिपी खेलना और चेरापूंजी की रिमझिम फुहारें ऐसा आभास कराती हैं, मानो धरती और आकाश का मधुर मिलन हो रहा हो। अरुणाचल प्रदेश की तवांग घाटी में बर्फ़ की श्वेत चादर और शांत मठों का वातावरण मन को एक अद्वितीय शांति से भर देता है। क्षेत्रीय प्रवास के दौरान का छायांकन सांस्कृतिक विविधता का संगम प्रत्येक राज्य की अपनी विशिष्ट पहचान है। नगालैंड के जीवंत लोकगीत, मणिपुर का शास्त्रीय नृत्य, मिज़ोरम के बाँस के वनों की मधुर सरसराहट और त्रिपुरा के भव्य मंदिरों की उत्कृष्...

मन से परे मायने का सत्य

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  मन से परे मायने का सत्य दोस्तो, आचार्य निखिल जब कहते हैं कि “अधिकांश उलझनें मन और मायने के मध्य अटकी होती हैं, जिनको यदि आप मन पर न लें, तो वो मायने ही नहीं रखतीं।” तो यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि मनुष्य के आंतरिक संघर्षों का गहन विश्लेषण है। यह कथन उस अवस्था से उपजा प्रतीत होता है जहाँ व्यक्ति जीवन के अनेक अनुभवों, संबंधों और परिस्थितियों को गहराई से देख चुका होता है और यह समझ लेता है कि हमारी पीड़ा का मूल कारण बाहरी घटनाएँ नहीं, बल्कि उनके प्रति हमारी मानसिक प्रतिक्रिया होती है। गुरु जी की उस समय की मनःस्थिति अत्यंत शांत, स्थिर और साक्षी भाव से भरी हुई रही होगी। वे मानो यह अनुभव कर चुके हैं कि संसार में घटित होने वाली हर घटना अपने आप में न तो सुख है, न दुःख—वह केवल एक घटना है। उसे “मायने” हम देते हैं, और उन मायनों को “मन” स्वीकार कर लेता है। यही स्वीकार ही उलझन बन जाता है। गुरु जी उस सूक्ष्म बिंदु को पहचान चुके हैं जहाँ मन और अर्थ (मायने) एक-दूसरे में उलझकर भ्रम रचते हैं। चित्र परिचय - घटनाएँ बाहर होती हैं, लेकिन उनकी उलझन तब बनती है जब हम उन्हें अपने मन में जगह दे देते हैं। य...

हस्तिनापुर साहित्य उत्सव २०२६ का आरंभिक संबोधन

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स्वागत संबोधन भूमिका हस्तिनापुर साहित्य उत्सव २०२६ के प्रथम आयोजन का यह आरंभिक स्वागत संबोधन केवल शब्दों का संयोजन नहीं, अपितु एक दूरदर्शी संकल्प, सांस्कृतिक पुनर्जागरण की भावना और साहित्य के माध्यम से समाज को दिशा देने के प्रयास का सशक्त उद्घोष है। इस भूमिका में सृजक आदर्श जी की वह चेतना स्पष्ट झलकती है, जो परंपरा और आधुनिकता के मध्य सेतु बनाकर भारतीय मूल्यों को पुनः प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न करती है। उनके शब्दों में न केवल अपने पूर्वजों के संस्कारों का सम्मान है, बल्कि भविष्य के लिए एक सुदृढ़ वैचारिक आधार भी है। यह संबोधन आयोजन की गरिमा, उद्देश्य और व्यापकता को स्थापित करते हुए उपस्थित जनसमूह को एक ऐसे साहित्यिक एवं सांस्कृतिक प्रवाह से जोड़ता है, जो आत्म-बोध से विश्व-बोध की ओर अग्रसर है। मूल संबोधन पूजूँ मात सरस्वती, सिमरूँ सिद्ध गणेश, जिनके सिमरन मात्र से, जड़ता रहे न शेष ॥ आज के इस हस्तिनापुर साहित्य उत्सव के प्रथम संस्करण के आयोजन के अध्यक्ष योगनिष्ठ पूज्यपाद स्वामी कर्मवीर जी, महामहिम श्री आरिफ़ मोहम्मद ख़ान जी, आदरणीय श्री वीरेंद्र सिंह जी, श्री अशोक कटारिया जी, डा॰ पुष्कर...