मन से परे मायने का सत्य

 मन से परे मायने का सत्य

दोस्तो, आचार्य निखिल जब कहते हैं कि

“अधिकांश उलझनें मन और मायने के मध्य अटकी होती हैं, जिनको यदि आप मन पर न लें, तो वो मायने ही नहीं रखतीं।”

तो यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि मनुष्य के आंतरिक संघर्षों का गहन विश्लेषण है। यह कथन उस अवस्था से उपजा प्रतीत होता है जहाँ व्यक्ति जीवन के अनेक अनुभवों, संबंधों और परिस्थितियों को गहराई से देख चुका होता है और यह समझ लेता है कि हमारी पीड़ा का मूल कारण बाहरी घटनाएँ नहीं, बल्कि उनके प्रति हमारी मानसिक प्रतिक्रिया होती है।

गुरु जी की उस समय की मनःस्थिति अत्यंत शांत, स्थिर और साक्षी भाव से भरी हुई रही होगी। वे मानो यह अनुभव कर चुके हैं कि संसार में घटित होने वाली हर घटना अपने आप में न तो सुख है, न दुःख—वह केवल एक घटना है। उसे “मायने” हम देते हैं, और उन मायनों को “मन” स्वीकार कर लेता है। यही स्वीकार ही उलझन बन जाता है। गुरु जी उस सूक्ष्म बिंदु को पहचान चुके हैं जहाँ मन और अर्थ (मायने) एक-दूसरे में उलझकर भ्रम रचते हैं।

चित्र परिचय - घटनाएँ बाहर होती हैं, लेकिन उनकी उलझन तब बनती है जब हम उन्हें अपने मन में जगह दे देते हैं।
यदि मन शांत और साक्षी हो जाए, तो वही घटनाएँ अपना “मायने” खो देती हैं।

वे मानो अपने शिष्यों से कह रहे हों—“तुम्हारे जीवन में जो भी उलझनें हैं, वे वस्तुतः बाहर नहीं हैं, वे तुम्हारे भीतर ही अर्थ ग्रहण करने की प्रक्रिया में अटकी हुई हैं। यदि तुम उस अर्थ को अपने मन में स्थान न दो, तो वह घटना अपने आप शून्य हो जाएगी, उसका कोई अस्तित्व ही नहीं बचेगा।”

इसे एक सरल दृष्टांत से समझिए। एक साधु नदी किनारे बैठा था। एक व्यक्ति आया और उसने साधु को अपशब्द कहे, अपमानित किया और चला गया। साधु शांत ही बैठे रहे। उनके शिष्य ने पूछा—“गुरुजी, आपने कुछ कहा क्यों नहीं? क्या आपको बुरा नहीं लगा?” साधु मुस्कुराए और बोले—“यदि कोई तुम्हें कोई वस्तु दे और तुम उसे स्वीकार ही न करो, तो वह वस्तु किसकी रहेगी?” शिष्य ने उत्तर दिया—“देने वाले की।” साधु ने कहा—“बस, वही मैंने किया। उसके शब्द मैंने अपने मन में लिए ही नहीं, तो उनका कोई मायने मेरे लिए बना ही नहीं।”

यही वह स्थिति है जहाँ आचार्य निखिल का कथन जीवंत हो उठता है। जब हम किसी के शब्दों, परिस्थितियों या घटनाओं को अपने मन में स्थान देते हैं, तभी वे हमारे लिए अर्थपूर्ण बनती हैं—चाहे वह अर्थ दुखद हो या सुखद। यदि हम उस अर्थ को स्वीकार ही न करें, तो वह घटना केवल एक क्षणिक लहर बनकर समाप्त हो जाती है।

एक और दृष्टांत पर ध्यान दीजिए। एक व्यापारी को उसके साझेदार ने धोखा दिया। वह भीतर ही भीतर जलता रहा, हर दिन उसी घटना को याद करता और स्वयं को पीड़ा देता। वर्षों बाद एक संत से उसकी भेंट हुई। संत ने पूछा—“तुम्हें धोखा कब मिला था?” व्यापारी ने कहा—“दस वर्ष पहले।” संत ने कहा—“तो क्या वह व्यक्ति आज भी तुम्हें धोखा दे रहा है?” व्यापारी ने कहा—“नहीं।” संत बोले—“तो फिर तुम स्वयं को हर दिन क्यों धोखा दे रहे हो? वह घटना तो समाप्त हो चुकी, पर तुमने उसे अपने मन में जीवित रखकर उसे मायने दे दिए हैं।”

गुरु जी का यह कथन उसी गहरी समझ का परिणाम है कि मन ही वह द्वार है जहाँ से हर अर्थ प्रवेश करता है। यदि यह द्वार सजगता से नियंत्रित हो, तो कोई भी नकारात्मकता भीतर प्रवेश नहीं कर सकती। वे हमें सिखा रहे हैं कि जीवन की जटिलताओं को हल करने के लिए बाहर नहीं, भीतर देखना आवश्यक है।

जब मन पर लेना बंद हो जाता है, तब जीवन हल्का हो जाता है। तब व्यक्ति घटनाओं का दर्शक बन जाता है, उनका बोझ उठाने वाला नहीं। और यही वह अवस्था है जहाँ सच्ची शांति का अनुभव होता है—जहाँ न उलझनें रहती हैं, न उनके मायने।

ज्ञान का सेतु 

 

आचार्य निखिल
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 






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