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विरासत से सेवा तक

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  विरासत से सेवा तक सेवा कल्पना जी के लिए प्रदर्शन नहीं, जीवन को सार्थक बनाने का  मार्ग है विशेष साक्षात्कार : कल्पना  पाटिल अहिल्या देवी की नगरी और स्वच्छता के लिए पहचाने जाने वाले इंदौर से जुड़ी कल्पना पाटिल का व्यक्तित्व कई अनुभवों और संस्कारों की परतों से बना है। लेखन, वाचन, समाज सेवा और ध्यान-साधना उनके जीवन के प्रमुख सरोकार हैं। स्वतंत्रता संग्राम और समाजसेवा से जुड़े परिवार में जन्म लेने के कारण सेवा का संस्कार उन्हें विरासत में मिला। उनकी माताजी सौ. लीलाताई उत्तमराव पाटील स्वतंत्रता सेनानी, लेखिका तथा 1972 में शिंदखेड़ा, महाराष्ट्र से विधायक रहीं। महिला होमगार्ड की अध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने महिलाओं के लिए निरंतर कार्य किया। उनके पिता डॉ. उत्तमराव गिरधर पाटिल स्वतंत्रता सेनानी, लेखक और समाजसेवी रहे। स्वतंत्रता संग्राम पर उनकी पुस्तक ‘क्रांतिपर्व’ मराठी और हिंदी दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुई। उनके चाचा श्री शिवाजीराव गिरधर पाटिल भी स्वतंत्रता सेनानी रहे और 1972 से लगभग दस वर्षों तक विधायक रहने के बाद सहकार मंत्री के रूप में कार्य क...

शिक्षा, साहित्य, कला और सामाजिक चेतना का रचनात्मक संगम हैं नेहा जी

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शिक्षा, साहित्य, कला और सामाजिक चेतना का रचनात्मक संगम हैं नेहा जी परिचय नेहा जैन शिक्षिका, साहित्यकार और सामाजिक सरोकारों से जुड़ा एक रचनात्मक व्यक्तित्व हैं। ललितपुर में लगभग 12–13 वर्षों के शिक्षण अनुभव के बाद उनका चयन प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (TGT) के पद पर हुआ। शिक्षा के साथ वे बाल साहित्य, कविता, आलेख और ग़ज़ल के क्षेत्र में सक्रिय रही हैं तथा ‘गंगी का खोजू’, ‘एक रास्ता चाँद का’, ‘वो गौतम बुद्ध हुआ’, ‘चंद हिस्से सत्य रेत की धरा पर’ और ‘आईना-ए-अज़ीज़’ जैसी कृतियों के माध्यम से साहित्यिक पहचान बनाई है। आदिवासी एवं किन्नर विमर्श सहित सामाजिक विषयों पर भी उन्होंने लेखन किया है। शिक्षण में कला, पुनर्चक्रण, स्ट्रीट प्ले और अन्य नवाचारों के प्रयोग के लिए उन्हें जिला स्तर पर सम्मानित किया गया। बाल सम्प्रेक्षण गृह में किशोरों के साथ Expressive Art Therapy आधारित गतिविधियों पर भी कार्य किया। रक्तदान, नेत्रदान तथा महिला सशक्तीकरण जैसे सामाजिक सरोकारों से जुड़ी नेहा जैन का व्यक्तित्व शिक्षा, साहित्य, कला और सामाजिक चेतना के रचनात्मक संगम का परिचायक है। बातचीत नेहा जैन से संवाद शिक्षा, साहित्...

नहीं रहा वो जो साथ-साथ आया था जहाँ में

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नहीं रहा वो जो साथ-साथ आया था जहाँ में — राजीव कुछ लोग जीवन में केवल साथ नहीं चलते, वे अपने साथ चलने वालों की स्मृतियों में एक ऐसी जगह बना लेते हैं, जहाँ समय बीतने के बाद भी उनकी उपस्थिति महसूस होती रहती है। यतेंद्रवीर सिंह भी ऐसी ही शख्सियत थे। कुछ माह के अंतर से इस जीवन से साक्षात्कार हुआ था—यतेंद्र, सुनील और राजीव का। उम्र लगभग साथ-साथ बढ़ी, जीवन की अनेक अवस्थाएँ समान समय में देखीं और अपने-अपने ढंग से जीवन के ध्येय को साधने का प्रयास किया। दिलचस्प संयोग यह भी रहा कि ये तीनों केवल सम-वय ही नहीं थे, बल्कि एक ही कुनबे की अलग-अलग शाखाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए जीवन की यात्रा में एक-दूसरे से जुड़े रहे। इन तीनों में यतेंद्रवीर सबसे अधिक नवाचारी थे। उनकी सोच में एक अलग तरह की गति थी। उन्होंने बुद्धि-कौशल से आयुर्वेद की शिक्षा अर्जित की, लेकिन उनकी प्रतिभा ने अपनी असली उड़ान बीमा क्षेत्र में भरी। जिस क्षेत्र में सामान्यतः लोग निर्धारित प्रक्रियाओं और परंपरागत तरीकों के सहारे आगे बढ़ते हैं, वहाँ यतेंद्रवीर अपनी कल्पना, व्यवहार-कौशल और परिस्थितियों को अपने पक्ष में ढाल लेने की क्षमता के कारण...

सेवा, संघर्ष और सहज मुस्कान का नाम है श्री मोहन लाल वर्मा जी

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विशेष साक्षात्कार सेवा, संघर्ष और सहज मुस्कान का नाम  श्री मोहन लाल वर्मा जी 18 सितंबर — जन्मदिवस विशेष परिचय कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका परिचय केवल उनके पद, कार्य या उपलब्धियों से नहीं दिया जा सकता। उनका असली परिचय उनके व्यवहार, उनकी सहज मुस्कान और दूसरों के लिए कुछ कर गुजरने की भावना में छिपा होता है। श्री मोहन लाल वर्मा जी ऐसे ही मिलनसार, हँसमुख और सेवाभावी व्यक्तित्व के धनी हैं। समाज के शोषितों, पीड़ितों और विशेषकर मजदूरों के अधिकारों के लिए निरंतर आवाज़ उठाने के साथ-साथ वे समाजसेवा को अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। गुर्जर समाज के उत्थान के प्रति उनका समर्पण और भगवान देवनारायण के प्रति उनकी अटूट आस्था उनके व्यक्तित्व को एक अलग पहचान देती है। ‘देव चेतना’ मासिक पत्रिका के संपादक एवं प्रकाशक के रूप में भी उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में जागरूकता और वैचारिक चेतना फैलाने का निरंतर प्रयास किया है। प्रश्न : मोहन लाल जी, आपके लिए समाजसेवा का क्या अर्थ है? उत्तर : मेरे लिए समाजसेवा कोई अलग से किया जाने वाला कार्य नहीं है। यदि हम किसी जरूरतमंद के काम आ सकें, क...

करियर की उलझनों से स्पष्ट दिशा तक डॉ. प्रियंका शर्मा से विशेष बातचीत

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करियर की उलझनों से स्पष्ट दिशा तक डॉ. प्रियंका शर्मा से विशेष बातचीत विशेष परिचय डॉ. प्रियंका शर्मा एक वरिष्ठ करियर काउंसलर और स्टूडेंट एडवाइजर हैं, जिन्हें करियर काउंसलिंग के क्षेत्र में दो दशकों से अधिक का अनुभव है। विज्ञान से शुरू हुई उनकी शैक्षणिक यात्रा बायोटेक्नोलॉजी, मानव संसाधन प्रबंधन और अंततः प्रशिक्षण एवं विकास में पीएच.डी. तक पहुँची। NCDA, CCC और UCLA जैसी संस्थाओं से प्राप्त पेशेवर प्रमाणन ने उनकी विशेषज्ञता को और व्यापक बनाया है। आज वे विद्यार्थियों को केवल करियर चुनने में ही नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं को पहचानने, सही कौशल विकसित करने और बदलती दुनिया में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने में सहायता कर रही हैं। बातचीत प्रश्न १. डॉ. प्रियंका जी, आपकी शैक्षणिक यात्रा विज्ञान से मानव संसाधन और फिर करियर काउंसलिंग तक पहुँची। यह यात्रा कैसे शुरू हुई? उत्तर: "मेरी शैक्षणिक यात्रा की शुरुआत कक्षा बारह में विज्ञान विषय से हुई। इसके बाद मैंने बायोटेक्नोलॉजी में बी.एससी. किया। मास्टर्स के स्तर पर मैंने बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में ह्यूमन रिसोर्सेज (HR) को अपनी विशेषज्ञता के रूप में चुना...

Dr. अनुराधा प्रसाद का विशेष साक्षात्कार

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  बहुआयामी व्यक्तित्व से संवाद चिकित्सा से साहित्य तक, शिक्षा से समाजसेवा तक—एक सतत सृजन-यात्रा डॉ. अनुराधा प्रसाद से विशेष साक्षात्कार बातचीत प्रश्न १. डॉ. अनुराधा जी, आपके व्यक्तित्व के अनेक आयाम हैं—चिकित्सक, शिक्षाविद्, प्राचार्या, साहित्यकार, कवयित्री, प्रकाशक और समाजसेवी। यदि आपको अपने व्यक्तित्व का परिचय इन सभी भूमिकाओं से अलग केवल एक वाक्य में देना हो, तो आप स्वयं को किस रूप में देखना पसंद करेंगी? उत्तर: "मैं स्वयं को मूलतः एक संवेदनशील और सतत सीखने वाले व्यक्ति के रूप में देखती हूँ। मेरे लिए चिकित्सा हो, शिक्षा हो, साहित्य हो या समाजसेवा—इन सबका अंतिम उद्देश्य मनुष्य को बेहतर बनाना है। अलग-अलग क्षेत्रों में मेरी भूमिकाएँ भले अलग दिखाई देती हों, लेकिन उनके केंद्र में मनुष्य, उसकी संवेदना और उसके विकास की चिंता ही है।" प्रश्न २. चिकित्सा और साहित्य पहली दृष्टि में दो अलग-अलग संसार दिखाई देते हैं। एक शरीर की पीड़ा समझता है और दूसरा मन की। आपके जीवन में इन दोनों का आपस में क्या संबंध है? उत्तर: "मेरे लिए दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अलग नहीं हैं। चिकित्सा ने मुझे मनुष्...

सृजन के अनेक रंगों में रंगी जया सूद

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सृजन के अनेक रंगों में रंगी जया सूद कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनकी पहचान किसी एक परिचय या एक विधा तक सीमित नहीं की जा सकती। जया सूद भी ऐसा ही बहुआयामी रचनात्मक व्यक्तित्व हैं—एक समर्पित शिक्षिका, संवेदनशील कवयित्री, कहानीकार, बाल-साहित्यकार, उपन्यासकार और नाटककार। अंग्रेजी, हिंदी और पंजाबी—तीनों भाषाओं में उनकी सृजनात्मक अभिव्यक्ति उनकी व्यापक संवेदना और बहुरंगी प्रतिभा का परिचय देती है। दसवीं कक्षा में माँ के प्रति उमड़े सहज भावों से पहली कविता लिखने से शुरू हुई उनकी लेखकीय यात्रा आज कविता-संग्रह के प्रकाशन, विविध साहित्यिक मंचों पर सहभागिता, अनेक सम्मानों और रंगमंचीय अनुभवों तक पहुँच चुकी है। लेखन के साथ कला एवं शिल्प, रंगोली, ग्लास पेंटिंग और हास्य में उनकी रुचियाँ उनके व्यक्तित्व में रचनात्मकता के और भी सुंदर रंग भरती हैं। लंबे अंतराल के बाद 2023 से निरंतर सक्रिय हुई उनकी कलम यह संदेश भी देती है कि सृजन के लिए न कोई उम्र बाधा है, न कोई विराम अंतिम—यदि भीतर अभिव्यक्ति की लौ जीवित हो तो शब्द अपना रास्ता स्वयं बना लेते हैं। परिवार का स्नेह, माता-पिता का प्रोत्साहन और जीवनसाथी का सह...