Dr. अनुराधा प्रसाद का विशेष साक्षात्कार
बहुआयामी व्यक्तित्व से संवाद
चिकित्सा से साहित्य तक, शिक्षा से समाजसेवा तक—एक सतत सृजन-यात्रा
डॉ. अनुराधा प्रसाद से विशेष साक्षात्कार
बातचीत
प्रश्न १. डॉ. अनुराधा जी, आपके व्यक्तित्व के अनेक आयाम हैं—चिकित्सक, शिक्षाविद्, प्राचार्या, साहित्यकार, कवयित्री, प्रकाशक और समाजसेवी। यदि आपको अपने व्यक्तित्व का परिचय इन सभी भूमिकाओं से अलग केवल एक वाक्य में देना हो, तो आप स्वयं को किस रूप में देखना पसंद करेंगी?
उत्तर: "मैं स्वयं को मूलतः एक संवेदनशील और सतत सीखने वाले व्यक्ति के रूप में देखती हूँ। मेरे लिए चिकित्सा हो, शिक्षा हो, साहित्य हो या समाजसेवा—इन सबका अंतिम उद्देश्य मनुष्य को बेहतर बनाना है। अलग-अलग क्षेत्रों में मेरी भूमिकाएँ भले अलग दिखाई देती हों, लेकिन उनके केंद्र में मनुष्य, उसकी संवेदना और उसके विकास की चिंता ही है।"
प्रश्न २. चिकित्सा और साहित्य पहली दृष्टि में दो अलग-अलग संसार दिखाई देते हैं। एक शरीर की पीड़ा समझता है और दूसरा मन की। आपके जीवन में इन दोनों का आपस में क्या संबंध है?
उत्तर: "मेरे लिए दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अलग नहीं हैं। चिकित्सा ने मुझे मनुष्य की पीड़ा को करीब से देखने का अवसर दिया और साहित्य ने उस पीड़ा को समझने तथा अभिव्यक्त करने की संवेदना दी। चिकित्सक के रूप में हम बीमारी देखते हैं, लेकिन साहित्यकार के रूप में हम उस बीमारी के पीछे छिपे व्यक्ति को देखते हैं। मेरा विश्वास है कि स्वस्थ समाज के लिए शरीर के साथ मन का उपचार भी आवश्यक है।"
प्रश्न ३. होम्योपैथिक चिकित्सा से जुड़े आपके अनुभवों ने आपके व्यक्तित्व और आपकी दृष्टि को किस प्रकार प्रभावित किया?
उत्तर: "चिकित्सा ने मुझे धैर्यपूर्वक सुनना सिखाया। हर व्यक्ति की समस्या केवल उसके लक्षणों में नहीं होती, उसके पीछे उसकी जीवन-स्थितियाँ, भावनाएँ और अनुभव भी होते हैं। चिकित्सा ने मेरे भीतर मनुष्य को समग्रता में देखने की दृष्टि विकसित की। शायद इसी कारण शिक्षा और साहित्य में भी मैं केवल उपलब्धि नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर के विकास को अधिक महत्व देती हूँ।"
प्रश्न ४. आप वर्तमान में एक सीबीएसई विद्यालय की प्राचार्या हैं। आज के समय में विद्यालय के प्रधानाचार्य की भूमिका केवल प्रशासनिक प्रमुख की रह गई है या उससे कहीं अधिक है?
उत्तर: "मेरे विचार से प्रधानाचार्य केवल संस्था का प्रशासक नहीं, बल्कि उसके शैक्षिक और मानवीय वातावरण का निर्माणकर्ता होता है। विद्यालय में बच्चे केवल विषय नहीं पढ़ते, वे व्यवहार, संस्कार, अनुशासन, संवेदनशीलता और जीवन-दृष्टि भी सीखते हैं। इसलिए प्रधानाचार्य की भूमिका शिक्षक, मार्गदर्शक, प्रशासक और कभी-कभी अभिभावक—इन सभी भूमिकाओं का समन्वय है।"
प्रश्न ५. आज शिक्षा में अंक और प्रतियोगिता का दबाव बहुत बढ़ गया है। ऐसे वातावरण में रचनात्मकता और मानवीय मूल्यों को बचाए रखने के लिए विद्यालयों को क्या करना चाहिए?
उत्तर: बच्चों को केवल यह सिखाना पर्याप्त नहीं कि वे परीक्षा में कितने अंक लाएँ; उन्हें यह भी समझाना आवश्यक है कि वे जीवन में किस प्रकार के मनुष्य बनें। कला, साहित्य, विज्ञान, खेल, संवाद और सामाजिक गतिविधियों को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। बच्चे को प्रश्न पूछने, असफल होने, फिर प्रयास करने और अपनी मौलिक प्रतिभा व्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए। शिक्षा तभी सार्थक होगी जब वह ज्ञान के साथ विवेक और संवेदना भी दे।
प्रश्न ६. आपने हिंदी में एम.ए. किया और साहित्य को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। हिंदी भाषा से आपका संबंध केवल अकादमिक है या भावनात्मक भी?
उत्तर: "हिंदी मेरे लिए केवल भाषा नहीं, मेरी संवेदना की भाषा है। इसी भाषा में मैंने जीवन को महसूस किया, अपने विचारों को शब्द दिए और अपनी रचनात्मकता को अभिव्यक्ति दी। भाषा हमारी संस्कृति और हमारी स्मृतियों से भी जुड़ी होती है। इसलिए हिंदी के प्रति मेरा लगाव स्वाभाविक और आत्मीय है।"
प्रश्न ७. आपकी रचनाओं में प्रेरणा, धर्म-संस्कृति, देशभक्ति, सामाजिक चेतना, कला और विज्ञान जैसे विविध विषय दिखाई देते हैं। आपके लेखन का मूल उद्देश्य क्या है?
उत्तर: "मैं साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं मानती। मेरे लिए साहित्य मन को छूने, सोच को जगाने और भीतर कोई सकारात्मक हलचल पैदा करने का माध्यम है। यदि मेरी कोई कविता या लेख किसी व्यक्ति को निराशा से आशा की ओर ले जाए, किसी प्रश्न पर सोचने को विवश करे या किसी अच्छे कार्य के लिए प्रेरित करे, तो मैं अपने लेखन को सार्थक मानूँगी।"
प्रश्न 8. प्रेरणात्मक लेखन करना आसान भी माना जाता है और कठिन भी। आपके लिए प्रेरणा लिखना अधिक महत्वपूर्ण है या स्वयं प्रेरणा का अनुभव करना?
उत्तर: "स्वयं प्रेरित हुए बिना स्थायी प्रेरणा देना संभव नहीं है। प्रेरणात्मक लेखन केवल सुंदर शब्दों से नहीं बनता; उसके पीछे जीवन का अनुभव और आंतरिक विश्वास होना चाहिए। मैं जो लिखती हूँ, उसमें मेरे अनुभव, मेरे आसपास के लोग और जीवन से मिले छोटे-बड़े सबक कहीं न कहीं उपस्थित रहते हैं।"
प्रश्न ९. एक कवयित्री के रूप में आपके भीतर कविता कब जन्म लेती है—जब जीवन बहुत सुख देता है या तब, जब कोई अनुभूति भीतर गहराई तक उतर जाती है?
उत्तर: "कविता का कोई निश्चित समय नहीं होता। कभी कोई सुखद अनुभव कविता बन जाता है, कभी कोई पीड़ा, कभी कोई सामाजिक घटना और कभी प्रकृति का कोई सामान्य-सा दृश्य। कविता तब जन्म लेती है जब कोई अनुभूति भीतर इतनी गहराई तक पहुँच जाए कि उसे शब्दों के बिना व्यक्त करना संभव न रहे।"
प्रश्न १०. आपने रांची और दिल्ली के रेडियो तथा दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रमों में भी सहभागिता की है। मंचीय और प्रसारण माध्यम से साहित्य को प्रस्तुत करने का अनुभव कैसा रहा?
उत्तर: "लेखन एकांत की साधना है, जबकि मंच और प्रसारण संवाद का माध्यम हैं। जब अपनी रचना सामने बैठे या सुन रहे लोगों तक पहुँचती है, तो लेखक को अपनी रचना की एक नई प्रतिक्रिया मिलती है। इससे अभिव्यक्ति में आत्मविश्वास भी बढ़ता है और यह समझ भी विकसित होती है कि पाठक या श्रोता शब्दों को किस प्रकार ग्रहण करता है।"
प्रश्न ११. आप जयराज पब्लिकेशन की संस्थापिका हैं और लगभग एक दशक से प्रकाशन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। लेखन से प्रकाशन तक आने का विचार कैसे आया?
उत्तर: "मैंने महसूस किया कि अनेक अच्छे रचनाकार लिखते तो हैं, लेकिन उनकी रचनाओं को उचित मंच और पाठकों तक पहुँचने का अवसर नहीं मिल पाता। प्रकाशन मेरे लिए केवल व्यवसायिक गतिविधि नहीं, बल्कि रचनात्मक प्रतिभाओं को मंच देने का माध्यम रहा है। अच्छी पुस्तक का प्रकाशन लेखक और पाठक के बीच एक सार्थक सेतु बनाता है।"
प्रश्न १२. आज डिजिटल माध्यम के दौर में पुस्तक प्रकाशन के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
उत्तर: "डिजिटल माध्यम ने अवसर भी बढ़ाए हैं और चुनौतियाँ भी। आज सामग्री बहुत है, लेकिन अच्छी सामग्री को पहचानना और पाठक तक पहुँचाना कठिन हो गया है। पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति उसकी स्थायित्वपूर्ण उपस्थिति है। हमें आधुनिक तकनीक को अपनाते हुए पुस्तक की गंभीरता, गुणवत्ता और विश्वसनीयता को बनाए रखना होगा।"
प्रश्न १३. एक प्रकाशक के रूप में किसी पुस्तक को प्रकाशित करने से पहले आप किन बातों को सबसे अधिक महत्व देती हैं?
उत्तर: "विषय की मौलिकता, भाषा की गुणवत्ता, रचना का उद्देश्य और पाठक के लिए उसकी उपयोगिता मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं। केवल पुस्तक प्रकाशित कर देना पर्याप्त नहीं है; यह भी देखना चाहिए कि वह पाठक के भीतर क्या छोड़कर जाएगी। एक अच्छी पुस्तक पाठक को कुछ देती है—विचार, संवेदना, ज्ञान या जीवन को देखने की कोई नई दृष्टि।"
प्रश्न 14. 'साहित्य सुमन मंच' की स्थापना के पीछे आपकी मूल प्रेरणा क्या थी?
उत्तर: "मेरे सामने अनेक प्रतिभाशाली रचनाकारों की रचनाएँ आती थीं, लेकिन हर रचनाकार को अपना मंच नहीं मिल पाता था। मैंने सोचा कि ऐसा साझा मंच क्यों न बनाया जाए जहाँ रचनाकार अपनी बात कह सकें और पाठकों तक पहुँच सकें। साहित्य सुमन मंच उसी विचार का परिणाम है।"
प्रश्न १५. आज सोशल मीडिया को अक्सर सतही सामग्री के लिए आलोचना का सामना करना पड़ता है। आपने इसी माध्यम का उपयोग साहित्यिक प्रतिभाओं को व्यापक पाठकों तक पहुँचाने के लिए किया है। आप इसे किस रूप में देखती हैं?
उत्तर: "माध्यम कभी अच्छा या बुरा नहीं होता, उसका उपयोग उसे सार्थक या निरर्थक बनाता है। यदि सोशल मीडिया पर केवल मनोरंजन हो सकता है तो साहित्य, ज्ञान और सकारात्मक विचार भी पहुँच सकते हैं। मेरा प्रयास यही है कि डिजिटल माध्यम को साहित्य और रचनात्मकता के प्रसार का माध्यम बनाया जाए।"
प्रश्न १६. इतने रचनाकारों को जोड़ना, उनकी रचनाओं को देखना और उन्हें पाठकों तक पहुँचाना—क्या यह अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य नहीं है?
उत्तर: "निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण है। लेकिन जब किसी नए रचनाकार को अपनी रचना प्रकाशित होते देखकर खुशी मिलती है, तो वह सारी मेहनत सार्थक लगती है। मेरा मानना है कि प्रतिभा को केवल पहचानना पर्याप्त नहीं, उसे प्रोत्साहन देना भी हमारी जिम्मेदारी है।"
प्रश्न १७. शिक्षा, साहित्य, चिकित्सा, प्रकाशन और समाजसेवा—इतनी भूमिकाओं के बीच समय का संतुलन कैसे बनाती हैं?
उत्तर: "समय सभी के पास समान होता है; अंतर हमारी प्राथमिकताओं में होता है। मैं हर भूमिका को अपने जीवन का अलग-अलग हिस्सा मानकर नहीं चलती। ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। शिक्षा मुझे अनुभव देती है, चिकित्सा मुझे संवेदना देती है, साहित्य अभिव्यक्ति देता है और प्रकाशन दूसरों की प्रतिभा को मंच देता है। इस दृष्टि से मेरे कार्य अलग नहीं, एक ही यात्रा के अलग पड़ाव हैं।"
प्रश्न १८. समाजसेवा के क्षेत्र में आपका विशेष ध्यान बच्चों और युवाओं पर है। आपको क्यों लगता है कि सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत इन्हीं से होनी चाहिए?
उत्तर: "क्योंकि आज का बच्चा ही कल का समाज बनाता है। यदि हम बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवेदनशीलता, संस्कार, रचनात्मकता और सामाजिक जिम्मेदारी विकसित कर पाए, तो आने वाला समाज अधिक संतुलित होगा। बच्चों को केवल भविष्य की शक्ति कहना पर्याप्त नहीं है; हमें उनके वर्तमान को भी सार्थक बनाना होगा।"
प्रश्न १९. कला, साहित्य, विज्ञान और संस्कृति—इन चारों को आप बच्चों की शिक्षा से जोड़ना चाहती हैं। इनका एक साथ होना क्यों जरूरी है?
उत्तर: "विज्ञान बच्चे को प्रश्न करना और तर्क करना सिखाता है, साहित्य संवेदना देता है, कला कल्पना को विस्तार देती है और संस्कृति उसे अपनी जड़ों से जोड़ती है। इन चारों का संतुलन एक ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करता है जो आधुनिक भी हो और अपनी मानवीय जड़ों से जुड़ा हुआ भी।"
प्रश्न २०. आज के युवाओं में पढ़ने की आदत कम होने की चर्चा होती है। आप साहित्य से युवाओं का रिश्ता कैसे मजबूत करना चाहेंगी?
उत्तर: "हमें युवाओं को यह नहीं कहना चाहिए कि “पढ़ो क्योंकि पढ़ना अच्छा है।” हमें उन्हें ऐसी सामग्री देनी होगी जो उनके प्रश्नों, सपनों और वर्तमान जीवन से जुड़ती हो। जब साहित्य उन्हें अपने जीवन का आईना दिखाई देने लगेगा, तो पढ़ने की आदत स्वयं विकसित होगी। पुस्तक को उपदेश नहीं, संवाद बनाना होगा।"
प्रश्न २१. आपके जीवन में शिक्षक, चिकित्सक, साहित्यकार और समाजसेवी—इनमें से कौन-सी भूमिका आपको सबसे अधिक आत्मसंतोष देती है?
उत्तर: "किसी एक को चुनना मेरे लिए कठिन है, क्योंकि प्रत्येक भूमिका ने मुझे कुछ अलग दिया है। लेकिन यदि इन सभी को जोड़कर देखें तो सबसे अधिक संतोष तब मिलता है जब मेरे किसी प्रयास से किसी व्यक्ति को आगे बढ़ने, सीखने, स्वस्थ होने, अपनी प्रतिभा व्यक्त करने या जीवन को सकारात्मक दृष्टि से देखने में मदद मिलती है।"
प्रश्न २२. क्या कभी ऐसा क्षण आया जब आपको लगा हो कि इतने सारे क्षेत्रों में सक्रिय रहने के बजाय किसी एक क्षेत्र को चुन लेना चाहिए था?
उत्तर: "ऐसे विचार कभी-कभी स्वाभाविक रूप से आते हैं, लेकिन मेरे लिए विविधता ही ऊर्जा का स्रोत रही है। यदि मैं केवल एक ही क्षेत्र में सीमित रहती, तो शायद मेरे व्यक्तित्व के कुछ आयाम विकसित ही नहीं होते। मेरा मानना है कि जीवन हमें कई संभावनाएँ देता है; आवश्यकता उन्हें सार्थक दिशा देने की है।"
प्रश्न २३. आपकी दृष्टि में एक सफल व्यक्ति और एक सार्थक व्यक्ति में क्या अंतर है?
उत्तर: "सफलता अक्सर इस बात से मापी जाती है कि हमने क्या हासिल किया, जबकि सार्थकता इस बात से कि हमने दूसरों के जीवन में क्या जोड़ा। मेरे लिए उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनसे अधिक महत्वपूर्ण है कि हमारी यात्रा से कितने लोगों को प्रेरणा, सहयोग या अवसर मिला।"
प्रश्न २४. यदि आपको समाज के लिए अपनी सबसे बड़ी चिंता और सबसे बड़ी आशा—दोनों को एक-एक वाक्य में व्यक्त करना हो, तो वे क्या होंगी?
उत्तर: "मेरी सबसे बड़ी चिंता यह है कि ज्ञान और सूचना बढ़ने के बावजूद कहीं हम संवेदना और संवाद न खो दें। मेरी सबसे बड़ी आशा युवा पीढ़ी है—यदि उसे सही दिशा, अवसर और विश्वास मिले तो वह समाज को बहुत सकारात्मक दिशा दे सकती है।"
प्रश्न २५. अंत में, एक चिकित्सक के रूप में शरीर के लिए, एक शिक्षाविद् के रूप में विद्यार्थियों के लिए, एक साहित्यकार के रूप में समाज के लिए और एक समाजसेवी के रूप में आने वाली पीढ़ी के लिए आपका एक-एक संदेश क्या होगा?
उत्तर: " 'चिकित्सा के लिए'—स्वास्थ्य को केवल बीमारी की अनुपस्थिति न मानें, जीवनशैली और मानसिक संतुलन को भी महत्व दें।
'शिक्षा के लिए'—बच्चों को केवल सफल नहीं, संवेदनशील और विवेकशील बनाइए।
'साहित्य के लिए'—ऐसा लिखिए जो समय बीत जाने के बाद भी मनुष्य के भीतर कुछ जीवित रखे।
'समाज के लिए'—अपने हिस्से की जिम्मेदारी किसी दूसरे के आने की प्रतीक्षा किए बिना निभाइए।
और 'आने वाली पीढ़ी के लिए'—अपने सपनों को बड़ा रखिए, लेकिन अपने भीतर मनुष्यता के लिए उससे भी बड़ा स्थान रखिए।"
समापन
डॉ. अनुराधा प्रसाद से संवाद करते हुए यह स्पष्ट होता है कि उनके जीवन की विविध भूमिकाएँ अलग-अलग दिशाओं में जाती हुई दिखाई अवश्य देती हैं, लेकिन उनकी मूल धारा एक ही है—मनुष्य और समाज को बेहतर बनाने की सतत कोशिश।
चिकित्सा ने उन्हें संवेदना दी, शिक्षा ने दृष्टि, साहित्य ने अभिव्यक्ति, प्रकाशन ने दूसरों की प्रतिभा को मंच और समाजसेवा ने इन सभी को उद्देश्य।
शायद यही किसी बहुआयामी व्यक्तित्व की वास्तविक पहचान है—वह स्वयं आगे बढ़ते हुए अपने साथ दूसरों के लिए भी आगे बढ़ने की राह बनाता चले।
सूचना स्रोत
प्रस्तुति








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