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वृत्तांत (दुर्लभ संयोग)

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  दुर्लभ संयोग आज का दिन अपने भीतर कई अप्रत्याशित संयोगों और आत्मीय मुलाकातों को समेटे हुए था। नंबरदार परिवार की किशोरी नाती नमो को उसके घर छोड़ने का दिन था। प्रातः लगभग साढ़े सात बजे नमो के नाना राजीव उसे लेकर रवाना हुए। सफर का माध्यम आधुनिक और सुविधाजनक रैपिड रेल रहा। यात्रा के दौरान नमो की मासूम चंचलता और उसके नाना का स्नेहिल संरक्षण पूरे सफर को आनंदमय बनाते रहे। अंतिम स्टेशन तक पहुंचने के बाद आगे की दूरी थ्री-व्हीलर के माध्यम से पूरी की गई। घर पहुंचते ही नमो के दादा श्री ओम प्रकाश जी की खुशी देखते ही बनती थी। जैसे ही उन्होंने अपनी प्यारी पोती को देखा, उनके चेहरे पर प्रसन्नता सहज ही झलक उठी। परिवार के इस आत्मीय मिलन का वातावरण अभी बना ही था कि इसी दौरान नमो के दादा जी के एक मिमित्र प्रकाश जी, जो रिश्तेदारी से भी जुड़े हुए थे, वहां आ पहुंचे। फिर क्या था—तीनों सज्जनों के मध्य सामयिक विषयों, सामाजिक परिस्थितियों और पारिवारिक संदर्भों को लेकर लंबी और रोचक वार्ता प्रारंभ हो गई। संवाद का वातावरण इतना आत्मीय था कि समय का आभास ही नहीं हुआ। इसी बीच नमो के नाना ने घर की आत्मीयता में चाय औ...

संघर्ष, सेवा और समर्पण की मिसाल: डॉ. लोकेंद्र दवे से विशेष बातचीत

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संघर्ष, सेवा और समर्पण की मिसाल डॉ. लोकेंद्र दवे से विशेष बातचीत भूमिका चिकित्सा केवल एक पेशा नहीं, बल्कि सेवा, संवेदना और विश्वास का ऐसा दायित्व है जिसमें एक चिकित्सक मरीजों के जीवन में आशा का संचार करता है। ऐसे ही समर्पित चिकित्सकों में एक नाम है डॉ. लोकेंद्र दवे, जिन्होंने अपने पच्चीस वर्षों के चिकित्सा जीवन में अनेक उतार-चढ़ावों का सामना करते हुए चिकित्सा सेवा को जनसेवा का माध्यम बनाया। राजस्थान के पाली जिले के सुगालिया गांव से निकलकर जोधपुर, अजमेर, पुणे और फिर भोपाल तक का उनका सफर केवल व्यावसायिक उपलब्धियों का नहीं, बल्कि संघर्ष, अनुशासन, पारिवारिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का भी प्रेरक उदाहरण है। एमबीबीएस और रेस्पिरेट्री मेडिसिन में एमडी की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने क्रिटिकल केयर में विशेष प्रशिक्षण लिया और आज भोपाल में रहकर हजारों मरीजों के जीवन में भरोसे और उपचार का आधार बने हुए हैं। प्रस्तुत है डॉ. लोकेंद्र दवे से एक विशेष बातचीत— बातचीत   प्रश्न १. सबसे पहले अपने प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में बताइए। उत्तर : "मेरा मूल निवास राजस्थान के पाल...

आत्म-विश्लेषण

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आत्म-विश्लेषण स्वयं को समझने की सुगम यात्रा  आत्म-विश्लेषण का मतलब सिर्फ अपनी गलतियाँ गिनना नहीं है। इसका असली अर्थ है—स्वयं के अंदर झाँकना और अपने मन की बातों को समझना। हम रोज़मर्रा की भागदौड़ में अपने भीतर की आवाज़ को अक्सर अनसुना कर देते हैं। आत्म-विश्लेषण हमें उसी आवाज़ को सुनना सिखाता है। सत्य का सामना करना सीखें हम दर्पण में अपना चेहरा देखते हैं, लेकिन क्या हम अपने मन को भी देखते हैं? दूसरों की गलतियाँ देखना आसान होता है, पर अपनी गलतियाँ मानना कठिन। अक्सर हम बहाने बनाकर अपनी कमियों को छुपा लेते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि इंसान का पूर्ण होना जरूरी नहीं, बल्कि अपनी कमी को स्वीकार करना जरूरी है। यही सुधार की पहली सीढ़ी है। मौन की ताकत को समझें आज हर कोई बोलना चाहता है, पर आत्म-विश्लेषण हमें चुप रहकर खुद को सुनना सिखाता है। जब हम अकेले में अपने बारे में सोचते हैं, तब हमें अपनी असफलताओं और कमजोरियों का सही एहसास होता है। मेहनत और योग्यता का संतुलन हम जीवन में बहुत कुछ पाना चाहते हैं और उसके लिए मेहनत भी करते हैं। लेकिन एक सवाल जरूरी है—क्या हम उस चीज़ के योग्य भी हैं? आत्म-विश्लेष...

हिन्दी साहित्य, संवेदनाओं और सृजन की साधिका राखी पलोड से विशेष बातचीत**

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एक विशेष साक्षात्कार हिन्दी साहित्य, संवेदनाओं और सृजन की साधिका  राखी पलोड से विशेष बातचीत भूमिका जब कोई व्यक्ति अपनी मातृभाषा से दूर रहकर भी किसी अन्य भाषा को केवल सीखता ही नहीं, बल्कि उसे अपने हृदय की धड़कन बना लेता है, तब वह रिश्ता केवल भाषा का नहीं, संवेदना का बन जाता है। तेलंगाना जैसे अहिन्दी भाषी प्रदेश में रहते हुए हिन्दी भाषा के प्रति गहरा अनुराग रखना और उसे अपनी अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम बनाना अपने आप में एक प्रेरक यात्रा है। आज हम आपको ऐसी ही एक संवेदनशील, सृजनशील और साहित्य-समर्पित व्यक्तित्व से रूबरू कराने जा रहे हैं, जिनकी लेखनी भावनाओं को शब्दों में ढालकर पाठकों के हृदय तक पहुंचने का सामर्थ्य रखती है। जिनकी कविताएँ केवल पढ़ी नहीं जातीं, बल्कि महसूस की जाती हैं। हैदराबाद से प्रकाशित प्रतिष्ठित समाचार पत्र डेली हिन्दी मिलाप में अनेक बार प्रकाशित और पुरस्कृत हो चुकीं, तथा हाल ही में काव्य रसिक संस्थान की तेलंगाना इकाई में मंत्री पद की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालने वाली राखी पलोड आज हिन्दी साहित्य जगत में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना रही हैं। आखिर हिन्दी के प्रति उनका य...

श्री बद्रीनाथ धाम यात्रा संस्मरण

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श्री बद्रीनाथ धाम यात्रा संस्मरण मानव एक सामाजिक प्राणी है। समाज में ही इसका विकास संभव है। सामाजिक संस्कार, मान्यताएं, रीति-रिवाज, धार्मिक तीर्थ यात्राएं, मेले, उत्सव व त्यौहार आदि कार्यों से ही मानव का सामाजिक मान सम्मान समाज में बढ़ता है। इसी कड़ी में श्री बद्रीनारायण विशाल तीर्थ धाम की यात्रा करने का पिछले दिनों मेरा भी संयोग बना। पूर्व में कोई तैयारी नहीं थी बस मन में दृढ़ इच्छा और विश्वास था कि जीवन में एक बार बद्रीनाथ धाम की यात्रा जरूर करेंगे। इस विश्वास व ईश्वर कृपा की बदौलत अचानक 11 मई 2026 को बड़ी बहन जो जिला हेडक्वार्टर टोंक रहती है। उसका फोन आया कि भैया 15 तारीख से बद्री विशाल धाम की यात्रा के लिए मैं जा रही हूं। तुम्हारे भी सरकारी विद्यालयों की छुट्टियां लग गई है। आप और भाभी भी मेरे साथ चले तो मुझे अच्छा लगेगा। मोबाइल फोन पर बद्रीनाथ धाम की यात्रा के समाचार सुनकर मन में दबी इच्छा के पूर्ण होने की खुशी से मैंने हाथों हाथ ही बहन को हां करके उससे आवश्यक सामग्री की जानकारी लेकर तैयारी करने लगा। 15/05/2026 वार शुक्रवार इस दिन ठीक सांयकाल 5:30 बजे एक छोटी यात्री बस से हम बाईस य...

मैं ना भूलूँगी...!

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 मैं ना भूलूँगी...! भूमिका   यादों की भाप में उबलती चाय की कहानी कभी-कभी जीवन के सबसे बड़े प्रेम का प्रमाण बड़े उपहारों या भारी-भरकम शब्दों में नहीं, बल्कि छोटी-छोटी संवेदनाओं में छिपा होता है—एक कप चाय में, एक चिंता भरे प्रश्न में, या दर्द के क्षणों में किसी अपने की निस्वार्थ परवाह में। क्या कोई स्मृति इतनी गहरी हो सकती है कि वर्षों बाद भी उसकी गर्माहट मन को उसी तरह छू जाए, जैसे सर्द सुबह में हाथों में थमा चाय का प्याला? वरिष्ठ साहित्यकार विजया डालमिया की यह भावपूर्ण संस्मरणात्मक रचना केवल दांपत्य प्रेम की कहानी नहीं, बल्कि उन अनकहे एहसासों की अभिव्यक्ति है जो रिश्तों को उम्र भर जीवित रखते हैं। आइए पढ़ते हैं—एक ऐसी स्मृति, जिसे समय भी धुंधला नहीं कर पाया। संस्मरण दिसंबर की सुबह कुछ ठंडी-ठंडी हवाओं का पैगाम लेकर आती है। उस दिन भी मैं सुस्ती में यूँ ही बिस्तर में लेटी थी। तभी इन्होंने आवाज लगाई— “उठो… चाय पी लो।” चाय पीते-पीते मैंने इनकी तरफ देखा। कितने ही वर्षों से सुबह की चाय हमेशा यही मुझे बनाकर पिलाते हैं। चाय की चुस्कियों के साथ मैं यादों के पन्ने पलटने लगी। हमारा जीवन याद...