मैं ना भूलूँगी...!

 मैं ना भूलूँगी...!

भूमिका 

यादों की भाप में उबलती चाय की कहानी

कभी-कभी जीवन के सबसे बड़े प्रेम का प्रमाण बड़े उपहारों या भारी-भरकम शब्दों में नहीं, बल्कि छोटी-छोटी संवेदनाओं में छिपा होता है—एक कप चाय में, एक चिंता भरे प्रश्न में, या दर्द के क्षणों में किसी अपने की निस्वार्थ परवाह में। क्या कोई स्मृति इतनी गहरी हो सकती है कि वर्षों बाद भी उसकी गर्माहट मन को उसी तरह छू जाए, जैसे सर्द सुबह में हाथों में थमा चाय का प्याला?

वरिष्ठ साहित्यकार विजया डालमिया की यह भावपूर्ण संस्मरणात्मक रचना केवल दांपत्य प्रेम की कहानी नहीं, बल्कि उन अनकहे एहसासों की अभिव्यक्ति है जो रिश्तों को उम्र भर जीवित रखते हैं। आइए पढ़ते हैं—एक ऐसी स्मृति, जिसे समय भी धुंधला नहीं कर पाया।

संस्मरण

दिसंबर की सुबह कुछ ठंडी-ठंडी हवाओं का पैगाम लेकर आती है। उस दिन भी मैं सुस्ती में यूँ ही बिस्तर में लेटी थी। तभी इन्होंने आवाज लगाई—

“उठो… चाय पी लो।”

चाय पीते-पीते मैंने इनकी तरफ देखा। कितने ही वर्षों से सुबह की चाय हमेशा यही मुझे बनाकर पिलाते हैं। चाय की चुस्कियों के साथ मैं यादों के पन्ने पलटने लगी।

हमारा जीवन यादों की डायरी ही तो है, जिसके पन्ने पलटने पर हर पन्ने में कोई स्मृति मिल ही जाती है—कभी मुस्कुराती, कभी गुनगुनाती, कभी खिलखिलाती, तो कभी आँखों में आँसू भर जाती है। वे बीते पल, जब हम साथ रोए थे, यादों में आकर अक्सर हमें हँसा जाते हैं; और जिन पलों में हम साथ-साथ हँसे थे, वही कई बार आँखें नम कर जाते हैं।

कभी रूठना, कभी मनाना। कभी खुद मान जाना, तो कभी झूठ-मूठ सताना—यादें ही तो हैं, जो दस्तक देते ही समय को इधर से उधर कर देती हैं। यादों की सड़क बहुत लंबी होते हुए भी मिनटों में सफर तय कर लेती है। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। बीते हुए पल मेरे साथ चलने लगे।

सन् 1998 में अचानक इन्हें किडनी स्टोन की समस्या हुई। कई डॉक्टरों को दिखाने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ऑपरेशन ही करना पड़ेगा, क्योंकि स्टोन का आकार बड़ा था। उस समय सिरपुर कागजनगर में हमारा संयुक्त परिवार था, जहाँ मेडिकल सुविधाएँ बहुत अच्छी नहीं थीं।

इनके जीजाजी हैदराबाद में रहते थे। उनका इनके प्रति स्नेह अत्यधिक था। उन्होंने वहाँ महावीर हॉस्पिटल में **डॉ. सहारिया** से इनका चेकअप करवाया। डॉक्टर सहारिया किडनी ट्रांसप्लांट के विशेषज्ञ थे, किंतु जीजाजी से अच्छे संबंध होने के कारण उन्होंने उनकी बात मान ली और ऑपरेशन के लिए सहमति दे दी।

जिस दिन ऑपरेशन होना था, अस्पताल में बाकी सब लोग मौजूद थे। किंतु मेरे सास-ससुर, जेठ-जेठानी और बच्चे कागजनगर में ही थे। अस्पताल पहुँचने के बाद मैंने पहली बार इनसे मिलने वालों का इतना बड़ा हुजूम देखा। काम के सिलसिले में ये अक्सर हैदराबाद आते थे और सबसे इनके मधुर संबंध थे। वही लोग वहाँ उपस्थित थे।

हमें बताया गया था कि ऑपरेशन लगभग दो घंटे का होगा, किंतु उसे पाँच घंटे लग गए। ऑपरेशन थिएटर के पास किसी को जाने नहीं दिया जाता था। जो भी डॉक्टर या नर्स बाहर आतीं, पूछने पर बस इतना कहतीं—

“ऑपरेशन चल रहा है।”

सब लोग बहुत घबरा रहे थे। मैं शांति से आँखें मूँदकर रामरक्षा स्तोत्र का जाप कर रही थी। तभी लोगों के शोर मचाने पर एक डॉक्टर ने बताया—

“स्टोन निकालने के बाद वह हाथ से फिसलकर यूरिनरी ट्रैक्ट में फँस गया है, इसलिए समय लग रहा है। पर घबराने की कोई बात नहीं है। आप लोग शांति रखें।”

जैसे-तैसे ऑपरेशन सफल होने के बाद इन्हें आईसीयू में शिफ्ट किया गया। कागजनगर से लगातार फोन आ रहे थे। ऑपरेशन के बाद जब मैंने अपने सास-ससुर की आवाज सुनी, तो अपने आपको रोक नहीं पाई और फूट-फूटकर रो पड़ी। बस इतना ही कह सकी—

“अब सब ठीक है…”

उस पूरी रात मैं आईसीयू में इन्हें देखते और सहलाते हुए बैठी रही। एनेस्थीसिया की वजह से ये गहरी नींद में थे। दिनभर की थकान से मुझे भी हल्की-सी झपकी लग गई।

सुबह लगभग छह बजे जैसे ही मेरी आँख खुली, मैंने देखा—ये मेरे सिर पर हाथ फेर रहे थे। मैं कुछ पूछती, उससे पहले ही इनके मुँह से निकले पहले शब्द थे—

“तुमने चाय पी…?”

बस, इतना सुनते ही मेरी आँखों में आँसू आ गए। मैंने कहा—

“इतनी तकलीफ में भी आप मेरी चिंता कर रहे हो?”

तो इन्होंने मुस्कुराकर कहा—

“मुझे पता है, तुम्हें सुबह-सुबह चाय चाहिए होती है। चलो, उठो… चाय पीकर आ जाओ।”

यह बात औरों के लिए शायद बहुत छोटी हो सकती है, किंतु मेरे लिए वह एक ऐसा एहसास था, जिसके लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं थे। जब शब्द साथ छोड़ देते हैं, तब आँखें बरसने लगती हैं—और वही मेरे साथ हुआ।

तभी इनकी आवाज ने मुझे फिर वर्तमान में लौटा दिया—

“क्या हुआ? क्या सोचने लगी?”

मैंने मुस्कुराकर कहा—

“कुछ नहीं…”

सच ही है, यादें एक एहसास की तरह दिलों को जोड़कर रखती हैं। यादों का कोई तोड़ नहीं होता। यादें एक ऐसी तस्वीर हैं, जो दिल के कैमरे से खींची जाती हैं, ताकि उस पल को हमेशा के लिए सहेजकर रखा जा सके। आँखों में उमड़ता प्रेम और एहसासों का समंदर, जिसमें हम जब-जब डूबते हैं, तब मन कह उठता है—

> विचारों की प्याली में, तुम्हारे हाथों की चाय का साथ मिल जाता है रोज,

> क्या कहूँ, मेरा दिल खुशी से खिल जाता है रोज।

> धन्यवाद मेरे बागबान, मुझे महक भरी सुबह देने के लिए,

> फिर मायने नहीं रखती—अदरक की हो या इलायची की महकती सुबह।

> चाय के लिए तो चायपत्ती और तुम्हारे हाथों का स्पर्श ही काफी है…

अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस : महत्ता

अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस केवल एक पेय का उत्सव नहीं, बल्कि उन रिश्तों, संवादों और आत्मीय पलों का सम्मान भी है, जो एक प्याली चाय के साथ और अधिक मधुर बन जाते हैं।

चाय केवल स्वाद नहीं, बल्कि संवेदनाओं, अपनत्व और जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को सहेजने का माध्यम भी है।



सूचना स्रोत 

विजया डालमिया
राष्ट्रीय संयोजिका
उलझन सुलझन, महिला लेखिका प्रकोष्ठ 
हैदराबाद
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 





 




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