संघर्ष, संस्कृत और सफलता का संगम

संघर्ष, संस्कृत और सफलता का संगम

व्याख्याता हंसराज गुर्जर से विशेष संवाद

परिचय

हंसराज गुर्जर का जीवन इस बात का सशक्त उदाहरण है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, परिश्रम  निरंतर हो और आत्मविश्वास अडिग हो, तो साधारण परिस्थितियों से निकलकर भी असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। संस्कृत भाषा एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति समर्पित हंसराज जी वर्तमान में राजस्थान सरकार में संस्कृत विषय के व्याख्याता हैं। इससे पूर्व वे राजस्थान सरकार में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत रहे, किंतु मात्र आठ माह बाद ही उच्च पद पर चयनित होकर व्याख्याता बने। वर्तमान में वे राजस्थान लोक सेवा आयोग की वर्ष 2023 की सहायक आचार्य (Assistant Professor – Sanskrit) भर्ती प्रक्रिया के साक्षात्कार चरण में भी हैं। उन्होंने शास्त्री, शिक्षा शास्त्री एवं आचार्य की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। कोटा विश्वविद्यालय से पीएच.डी. तथा वर्ष जून 2019 में जेएनयू, नई दिल्ली में भी शोध-अध्ययन से जुड़े। छात्र जीवन में  सत्र 2013 में ABVP से सेठ सीताराम मोदी राजकीय संस्कृत कॉलेज, नीमकाथाना (सीकर) के छात्रसंघ अध्यक्ष प्रतिनिधि  भी रहे।

बातचीत

प्रश्न १. सबसे पहले अपने पारिवारिक परिचय के बारे में बताइए।

उत्तर: "मेरा जन्म एक सामान्य किसान  परिवार में हुआ। मेरे पिता श्री कैलाश चंद गुर्जर और माता श्रीमती लीला देवी ने मुझे ईमानदारी, अनुशासन और शिक्षा का महत्व सिखाया। परिवार के संस्कार ही मेरी सबसे बड़ी पूँजी रहे हैं। जो भी उपलब्धियाँ मिली हैं, उनमें मेरे माता  का त्याग और आशीर्वाद सबसे बड़ा योगदान है।"

प्रश्न २. आपकी शिक्षा यात्रा कैसी रही?

उत्तर: "संस्कृत विषय के प्रति मेरा लगाव प्रारम्भ से ही था। इसी रुचि ने मुझे शास्त्री, शिक्षा शास्त्री और नव्याव्याकरणाचार्य , साहित्याचार्य जैसी उपाधियाँ प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद मैंने कोटा विश्वविद्यालय से पीएच.डी. तथा शोध कार्य को आगे बढ़ाने के लिए वर्ष जून 2019 में जेएनयू, नई दिल्ली में भी अध्ययन और अकादमिक गतिविधियों से जुड़ने का अवसर मिला। मेरा मानना है कि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की निरंतर प्रक्रिया है।"

प्रश्न ३. सरकारी सेवा की शुरुआत कैसे हुई?

उत्तर: "मेरी पहली नियुक्ति RPSC की वर्ष 2018 की भर्ती में राजस्थान सरकार में प्रधानाध्यापक के रूप में हुई। यह मेरे लिए गौरव का क्षण था। हालांकि केवल आठ महीने बाद ही मेरा चयन उच्च पद पर हो गया और मैं संस्कृत विषय का व्याख्याता बन गया। यह मेरे लिए इस बात का प्रमाण था कि निरंतर तैयारी और आत्मविश्वास कभी व्यर्थ नहीं जाते।"

प्रश्न ४. वर्तमान में आपकी क्या जिम्मेदारियाँ हैं?

उत्तर: "मैं राजस्थान सरकार में संस्कृत विषय का व्याख्याता हूँ। मेरा प्रयास रहता है कि विद्यार्थियों में केवल परीक्षा उतीर्ण करने की भावना न हो, बल्कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत साहित्य और जीवन मूल्यों को भी समझें। शिक्षक का कार्य केवल पढ़ाना नहीं, बल्कि प्रेरित करना भी है।"

प्रश्न ५. वर्तमान में सहायक आचार्य (Assistant Professor) भर्ती प्रक्रिया में आपकी स्थिति क्या है?

उत्तर: "राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित वर्ष 2023 की सहायक आचार्य (संस्कृत) भर्ती प्रक्रिया में मैं साक्षात्कार चरण तक पहुँचा हूँ। यह मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक अवसर है। मैं इसे अपनी वर्षों की मेहनत का परिणाम मानता हूँ और आगे भी शिक्षा एवं शोध के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने का प्रयास करूँगा।"

प्रश्न ६. छात्र राजनीति के अनुभव ने आपके व्यक्तित्व को किस प्रकार प्रभावित किया?

उत्तर: "सेठ सीताराम मोदी राजकीय  संस्कृत कॉलेज, नीमकाथाना में छात्रसंघ अध्यक्ष प्रतिनिधि के रूप में   मेरे जीवन का महत्वपूर्ण अनुभव रहा। इससे नेतृत्व क्षमता, संवाद कौशल, संगठन निर्माण और विद्यार्थियों की समस्याओं को समझने की दृष्टि विकसित हुई। आज भी प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्यों में वह अनुभव मेरे लिए उपयोगी सिद्ध होता है।"

प्रश्न ७. संस्कृत भाषा को लेकर आपकी क्या सोच है?

उत्तर: "संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान-विज्ञान की मूल धारा है। आज आवश्यकता है कि संस्कृत को आधुनिक तकनीक, शोध और रोजगार के अवसरों से जोड़ा जाए। जब संस्कृत आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत होगी, तब युवाओं का आकर्षण भी स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा।"

प्रश्न ८. शोध कार्य में आपकी रुचि किन विषयों में रही है?

उत्तर: "मेरा प्रयास रहा है कि पारंपरिक संस्कृत ज्ञान को समकालीन संदर्भों से जोड़ा जाए। शोध तभी सार्थक होता है जब वह समाज, शिक्षा और नई पीढ़ी के लिए उपयोगी सिद्ध हो। भविष्य में भी मैं इसी दिशा में कार्य करना चाहता हूँ।"

प्रश्न ९. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं को क्या संदेश देंगे?

उत्तर: "सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। लक्ष्य स्पष्ट रखें, नियमित अध्ययन करें, धैर्य बनाए रखें और स्वयं पर विश्वास रखें। असफलता केवल अगली सफलता की तैयारी होती है। यदि परिश्रम निरंतर रहेगा तो परिणाम अवश्य मिलेगा।"

प्रश्न १०. आपका जीवन-दर्शन क्या है?

उत्तर: "मेरा विश्वास है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज को बेहतर बनाना है। ज्ञान तभी सार्थक है जब वह विनम्रता, सेवा और राष्ट्र निर्माण के भाव के साथ जुड़ा हो। मैं जीवनभर विद्यार्थी बने रहने और शिक्षा के माध्यम से समाज को कुछ लौटाने में विश्वास रखता हूँ।"

समापन

हंसराज गुर्जर का जीवन निरंतर अध्ययन, संघर्ष, अनुशासन और आत्मविश्वास की प्रेरक कहानी है। एक सामान्य परिवार से निकलकर छात्र नेतृत्व, शोध, अध्यापन और उच्च शैक्षणिक उपलब्धियों तक की उनकी यात्रा यह संदेश देती है कि दृढ़ संकल्प और सतत प्रयास व्यक्ति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकते हैं। संस्कृत भाषा के प्रति उनकी निष्ठा और शिक्षा के प्रति समर्पण उन्हें युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणास्रोत बनाता है।

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