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कहाँ गया वो स्पर्श?

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कहाँ गया वो स्पर्श? भूमिका कभी-कभी जीवन में बहुत बड़ी चीज़ों की कमी नहीं खलती, बल्कि उन छोटी-छोटी चीज़ों का अभाव भीतर तक छू जाता है, जिनकी कीमत हम तब नहीं समझ पाए थे। बचपन का वह समय भी कुछ ऐसा ही था—जब सिरदर्द की दवा से पहले माँ का हाथ माथे पर पहुँचता था, सर्दी की दवा से पहले ताई का स्नेह छाती पर विक्स मलता था, चोट पर मरहम से पहले दादी की फूँक मिलती थी और पेटदर्द में किसी बड़ी बुआ के हाथों की गरमाहट अपना असर दिखाती थी। शायद उन घरेलू उपचारों में औषधीय प्रभाव जितना था, उससे कहीं अधिक रिश्तों का विश्वास और स्पर्श की ऊष्मा थी। दर्द कहाँ समाप्त होता था—शरीर का या मन का, कहना कठिन है। एक हाथ सिर पर फिरता था और मन आश्वस्त हो जाता था कि कोई अपना है, जो मेरे दर्द को महसूस कर रहा है। एक माथे पर रखा चुम्बन जैसे यह कह देता था कि तकलीफ चाहे जितनी हो, हम अकेले नहीं हैं। आज हमारे पास पहले से अधिक साधन हैं, अधिक सुविधाएँ हैं और उपचार के अधिक विकल्प हैं। डिजिटल युग ने हमारी पहुँच को अभूतपूर्व रूप से आसान बना दिया है। छोटी-सी तकलीफ के लिए भी समाधान हमारी उँगलियों के स्पर्श मात्र से मोबाइल स्क्रीन पर उपल...

संवाद है रिश्तों में संतुलन की राह

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संवाद है रिश्तों में संतुलन की राह  अपर्णा शर्मा से विशेष बातचीत भूमिका आज की तेज़ रफ़्तार जीवनशैली में रिश्तों पर बढ़ता तनाव, संवादहीनता, अपेक्षाओं का टकराव और कामकाजी जीवन का दबाव वैवाहिक जीवन को प्रभावित कर रहा है। ऐसे समय में एक कुशल काउंसलर केवल समस्याओं को सुनने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह व्यक्ति को स्वयं को समझने, परिस्थितियों को संतुलित दृष्टि से देखने और रिश्तों को बेहतर दिशा देने में सहयोग करता है। श्रीमती अपर्णा शर्मा मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर हैं। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएशन तथा दिल्ली से काउंसलिंग एवं गाइडेंस में डिप्लोमा किया है। पिछले 12 वर्षों से वे काउंसलिंग के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने एकल विद्यालय के साथ काउंसलर के रूप में कार्य किया और वर्तमान में ऑनलाइन मैरिज काउंसलर के रूप में लोगों को परामर्श दे रही हैं। उनके लंबे अनुभव और पेशेवर सफलता को समझने के लिए प्रस्तुत है एक विशेष संवाद— बातचीत प्रश्न १. अपर्णा जी, मनोविज्ञान से काउंसलिंग के क्षेत्र में आने की आपकी यात्रा कैसे शुरू हुई? उत्तर:"मनोविज्ञान मेरे लिए केवल एक विषय नहीं, बल...

मुश्किल मोड़ों पर हौसले का हाथ

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मुश्किल मोड़ों पर हौसले का हाथ जीवन की राह में हर मोड़ आसान हो, यह जरूरी नहीं। कभी रास्ते सहज मिलते हैं, तो कभी परिस्थितियाँ ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करती हैं, जहाँ आगे बढ़ना कठिन लगने लगता है। ऐसे समय में सबसे जरूरी होता है—अपने हौसले का हाथ न छोड़ना। हर स्त्री के जीवन में ऐसे अवसर आते हैं, जब उसे लगता है कि परिस्थितियाँ उसकी इच्छाओं के अनुरूप नहीं हैं। जिम्मेदारियाँ बढ़ जाती हैं, सपने पीछे छूटते दिखाई देते हैं और कभी-कभी अपने ही निर्णयों पर संदेह होने लगता है। लेकिन यही वह समय होता है, जब उसे अपने भीतर झाँककर अपनी शक्ति को पहचानना चाहिए। परिस्थितियाँ चाहे जितनी बदल जाएँ, यदि वह स्वयं पर विश्वास बनाए रखती है, तो वह अपनी मंज़िल का रास्ता खोज सकती है। आत्मविश्वास उसे कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति देता है और धैर्य उसे सही दिशा में आगे बढ़ने का विवेक देता है। कई बार स्त्री अपनी असफलताओं को अपनी कमी मान लेती है। किसी प्रयास का सफल न होना यह प्रमाण नहीं कि वह सक्षम नहीं है। असफलता केवल यह बताती है कि उस रास्ते पर अभी कुछ और सीखना बाकी है। उसे रुककर अपनी कमियों को समझना चाहिए, उनसे सीखना चाहिए और न...

रक्षाबंधन के बहाने रिश्तों की एक नई डोर — श्री अशोक चौधरी के जज़्बात

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  रक्षाबंधन के बहाने रिश्तों की एक नई डोर   श्री अशोक चौधरी के जज़्बात 15 अगस्त 2026 का दिन मेरे लिए केवल स्वतंत्रता दिवस का पर्व नहीं था, बल्कि सामाजिक एकता, भाईचारे और आपसी विश्वास की अनुभूति कराने वाला एक यादगार अवसर भी रहा। ‘हमारे पुरखे न्यास’ के तत्वावधान में मेरठ जिले के चार गांवों—सारंगपुर, कोठरा, नंगला चांद और बस्तौरा—में रक्षाबंधन कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन कार्यक्रमों में मुस्लिम गुर्जर समाज की बहनों ने हिंदू गुर्जर भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर यह संदेश दिया कि रिश्तों की मजबूती धर्म की सीमाओं से नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और अपनत्व से होती है। सारंगपुर — आत्मीयता से हुई शुरुआत सबसे पहला कार्यक्रम सारंगपुर गांव में सखावत गुर्जर के आवास पर दोपहर 12 बजे से 1:30 बजे तक हुआ। मुस्लिम गुर्जर समाज की 25 बहनों ने 9 हिंदू गुर्जर भाइयों को राखियां बांधीं। कार्यक्रम को सफल बनाने में मोमीन गुर्जर, प्रधान अकबर चौहान और इमरान गुर्जर का विशेष सहयोग रहा। डॉ. अशोक कुमार चौधरी, राजबल सिंह, दिनेश गुर्जर भडौली और धर्मेन्द्र खटाना सहित अन्य साथियों की उपस्थिति ने आयोजन को गरिमा प्रदान ...

एक उद्यमी की डायरी से

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एक उद्यमी की डायरी से देसी स्वाद, ताजगी और विरासत केक का चलन आज हमारी जीवन शैली का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। जन्मदिन हो या कोई विशेष अवसर, केक काटना अब केवल पाश्चात्य परंपरा नहीं रहा, बल्कि खुशी मनाने का एक लोकप्रिय अंदाज़ बन गया है। एक दिन मेरे मन में विचार आया—जब केक हमारी खुशियों का हिस्सा बन ही गया है, तो क्यों न इसमें अपने देशी स्वाद की मिठास भी घोली जाए? क्यों न विदेशी अंदाज़ के इस केक को भारतीय स्वाद और हमारी पारंपरिक मिठाइयों का देसी तड़का दिया जाए? इसी सोच के साथ मैंने पहली बार रसमलाई को केक के साथ आज़माने का प्रयोग किया। घर पर तैयार की गई केसर, बादाम और पिस्ते वाली रसमलाई को केक के स्पंज पर सजाया और उसे खूबसूरती से प्रस्तुत किया। मन में थोड़ा संशय भी था—पता नहीं लोगों को यह नया स्वाद पसंद आएगा या वे कहेंगे, “यह आपने क्या कर दिया?” लेकिन परिणाम मेरी उम्मीद से कहीं अधिक सुखद था। रसमलाई केक ने बाकी सभी केक की माँग को पीछे छोड़ दिया। यह मेरे लिए केवल एक स्वादिष्ट प्रयोग की सफलता नहीं थी, बल्कि इस बात का विश्वास भी था कि हमारी पारंपरिक मिठाइयों में आधुनिक रूप लेने की अद्भुत क्ष...