कहाँ गया वो स्पर्श?
कहाँ गया वो स्पर्श? भूमिका कभी-कभी जीवन में बहुत बड़ी चीज़ों की कमी नहीं खलती, बल्कि उन छोटी-छोटी चीज़ों का अभाव भीतर तक छू जाता है, जिनकी कीमत हम तब नहीं समझ पाए थे। बचपन का वह समय भी कुछ ऐसा ही था—जब सिरदर्द की दवा से पहले माँ का हाथ माथे पर पहुँचता था, सर्दी की दवा से पहले ताई का स्नेह छाती पर विक्स मलता था, चोट पर मरहम से पहले दादी की फूँक मिलती थी और पेटदर्द में किसी बड़ी बुआ के हाथों की गरमाहट अपना असर दिखाती थी। शायद उन घरेलू उपचारों में औषधीय प्रभाव जितना था, उससे कहीं अधिक रिश्तों का विश्वास और स्पर्श की ऊष्मा थी। दर्द कहाँ समाप्त होता था—शरीर का या मन का, कहना कठिन है। एक हाथ सिर पर फिरता था और मन आश्वस्त हो जाता था कि कोई अपना है, जो मेरे दर्द को महसूस कर रहा है। एक माथे पर रखा चुम्बन जैसे यह कह देता था कि तकलीफ चाहे जितनी हो, हम अकेले नहीं हैं। आज हमारे पास पहले से अधिक साधन हैं, अधिक सुविधाएँ हैं और उपचार के अधिक विकल्प हैं। डिजिटल युग ने हमारी पहुँच को अभूतपूर्व रूप से आसान बना दिया है। छोटी-सी तकलीफ के लिए भी समाधान हमारी उँगलियों के स्पर्श मात्र से मोबाइल स्क्रीन पर उपल...