कहाँ गया वो स्पर्श?
कहाँ गया वो स्पर्श?
भूमिका
कभी-कभी जीवन में बहुत बड़ी चीज़ों की कमी नहीं खलती, बल्कि उन छोटी-छोटी चीज़ों का अभाव भीतर तक छू जाता है, जिनकी कीमत हम तब नहीं समझ पाए थे। बचपन का वह समय भी कुछ ऐसा ही था—जब सिरदर्द की दवा से पहले माँ का हाथ माथे पर पहुँचता था, सर्दी की दवा से पहले ताई का स्नेह छाती पर विक्स मलता था, चोट पर मरहम से पहले दादी की फूँक मिलती थी और पेटदर्द में किसी बड़ी बुआ के हाथों की गरमाहट अपना असर दिखाती थी।
शायद उन घरेलू उपचारों में औषधीय प्रभाव जितना था, उससे कहीं अधिक रिश्तों का विश्वास और स्पर्श की ऊष्मा थी। दर्द कहाँ समाप्त होता था—शरीर का या मन का, कहना कठिन है। एक हाथ सिर पर फिरता था और मन आश्वस्त हो जाता था कि कोई अपना है, जो मेरे दर्द को महसूस कर रहा है। एक माथे पर रखा चुम्बन जैसे यह कह देता था कि तकलीफ चाहे जितनी हो, हम अकेले नहीं हैं।
आज हमारे पास पहले से अधिक साधन हैं, अधिक सुविधाएँ हैं और उपचार के अधिक विकल्प हैं। डिजिटल युग ने हमारी पहुँच को अभूतपूर्व रूप से आसान बना दिया है। छोटी-सी तकलीफ के लिए भी समाधान हमारी उँगलियों के स्पर्श मात्र से मोबाइल स्क्रीन पर उपलब्ध है। लेकिन इसी विडंबना पर ठहरकर सोचने की आवश्यकता है—जिस उँगली के स्पर्श से आज हम स्क्रीन पर समाधान खोजते हैं, क्या उसी उँगली का आत्मीय स्पर्श हमने अपने अपनों के सिर पर रखना कम कर दिया है?
आधुनिक चिकित्सा और सुविधाओं का विरोध इस रचना का उद्देश्य नहीं है। प्रश्न कहीं अधिक गहरा है। प्रश्न यह है कि कहीं सुविधा की इस दौड़ में संवेदना, संवाद और आत्मीयता पीछे तो नहीं छूट रही? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने दर्द का उपचार तो सीख लिया, लेकिन दर्द में साथ बैठने की कला भूलते जा रहे हैं?
“कहाँ गया वो स्पर्श” इसी खोती हुई आत्मीयता की तलाश है। यह उन हाथों को याद करने का प्रयास है, जिनमें दवा से अधिक दुलार था; उन रिश्तों को याद करने का प्रयास है, जिनकी उपस्थिति ही आधी तकलीफ हर लेती थी; और उस समय को याद करने का प्रयास है, जब उपचार केवल शरीर का नहीं, मन का भी हुआ करता था।
यह रचना हमें अतीत में लौटने के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान में कुछ बचाए रखने के लिए प्रेरित करती है—रिश्तों की गरमाहट, अपनों का स्पर्श और वह विश्वास कि मनुष्य की सबसे बड़ी औषधि कई बार कोई दवा नहीं, बल्कि किसी अपने का स्नेहिल हाथ होता है।
शायद इसी प्रश्न के साथ हमें स्वयं से पूछना चाहिए—
साधन तो बहुत बढ़ गए, पर क्या स्पर्श कम हो गया?
रिश्ते तो बहुत हैं, पर क्या उनकी ऊष्मा घट गई?
और यदि सचमुच ऐसा है, तो फिर कहाँ गया वो स्पर्श?
आलेख
कहाँ गया वो स्पर्श
सिर दुख रहा है..
मां ने थोड़े बाम के साथ जो प्यार भरा हाथ फेरा तो दर्द गायब!!
बह रही है नाक, है कुछ सर्दी..
ताई ने जो मला थोड़ा सा विक्स छाती पर और चूमा जो माथा तो उड़नछू हुई सर्दी!!
खेलते-खेलते गिर पड़े..
दादी ने घुटने में मारी फूंक और जो मला हल्दी-चूना तो चोट के साथ कलेजे तक को मिला आराम!!
पेट में दर्द हो रहा है..
बड़ी बुआ ने गरम कर जो थोड़ा हींग और सरसों का तेल मला तो दर्द हुआ गायब!!
ये है मां, चाची, ताई, बुआ, मौसी, बड़ी बहन, नानी, दादी आदि के हाथों का प्यार व सुकून भरा स्पर्श जो करता है जादुई असर!!
ये सब ऐसे स्पर्श हुआ करते थे जो दुखती चोट के साथ-साथ "दुखते मन को भी" सहारा दिए करते थे!
आज के ग्लोबलाइजेशन के जमाने में सोशल मीडिया और डिज़िटल क्रांति के परिणाम स्वरूप तथाकथित सो-कॉल्ड नये जमाने के कारण हमारी नयी पीढ़ी इस जादुई स्पर्श सुख से वंचित होती जा रही है!!
तमाम तरह के नेज़ल स्प्रे, पेन किलर स्प्रे, हैडेक गाॅन रोल-ऑन, बैंडेज आदि छोटे बच्चे से लेकर गली-कूचों तक के हर घर में टीवी, मोबाइल व सोशल मीडिया के माध्यम से उपलब्ध हैं। लोग धड़ल्ले से बगैर सोचे-समझे इनका उपयोग भी कर रहे हैं।
यदि ये कहा जाए कि इनके अत्यधिक उपयोग के कारण ही हमारे चिरकालीन मानवीय रिश्तों, भावनात्मक संबंधों और बाउंडिंग में दूरियां पैदा हो रही हैं तो अतिशयोक्ति ना होगी!!
सो-कॉल्ड नये जमाने में इस तरह के अनेक उदाहरणों को प्रत्यक्ष देख और अनुभव कर कुछ इस तरह के विचार दिल-दिमाग में उथल-पुथल मचा रहे थे! सोचा क्यों ना आपसे भी साझा किया जाए??
रचनाकार के अन्य प्रयास



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