हिन्दी साहित्य, संवेदनाओं और सृजन की साधिका राखी पलोड से विशेष बातचीत**
एक विशेष साक्षात्कार
हिन्दी साहित्य, संवेदनाओं और सृजन की साधिका
राखी पलोड से विशेष बातचीत
भूमिका
जब कोई व्यक्ति अपनी मातृभाषा से दूर रहकर भी किसी अन्य भाषा को केवल सीखता ही नहीं, बल्कि उसे अपने हृदय की धड़कन बना लेता है, तब वह रिश्ता केवल भाषा का नहीं, संवेदना का बन जाता है। तेलंगाना जैसे अहिन्दी भाषी प्रदेश में रहते हुए हिन्दी भाषा के प्रति गहरा अनुराग रखना और उसे अपनी अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम बनाना अपने आप में एक प्रेरक यात्रा है।
आज हम आपको ऐसी ही एक संवेदनशील, सृजनशील और साहित्य-समर्पित व्यक्तित्व से रूबरू कराने जा रहे हैं, जिनकी लेखनी भावनाओं को शब्दों में ढालकर पाठकों के हृदय तक पहुंचने का सामर्थ्य रखती है। जिनकी कविताएँ केवल पढ़ी नहीं जातीं, बल्कि महसूस की जाती हैं। हैदराबाद से प्रकाशित प्रतिष्ठित समाचार पत्र डेली हिन्दी मिलाप में अनेक बार प्रकाशित और पुरस्कृत हो चुकीं, तथा हाल ही में काव्य रसिक संस्थान की तेलंगाना इकाई में मंत्री पद की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालने वाली राखी पलोड आज हिन्दी साहित्य जगत में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना रही हैं।
आखिर हिन्दी के प्रति उनका यह गहरा प्रेम कैसे विकसित हुआ? कविता उनके जीवन में कब और कैसे आई? उनकी लेखनी को प्रेरणा कहाँ से मिलती है? साहित्य, समाज और भाषा को लेकर उनके क्या विचार हैं? आइए, जानते हैं इन सभी पहलुओं को एक विशेष संवाद के माध्यम से, स्वयं राखी पलोड जी की जुबानी।
बातचीत
प्रश्न १. सबसे पहले अपने बारे में हमारे पाठकों को कुछ बताइए।
उत्तर: "मेरा नाम राखी पलोड है और मैं जहीराबाद, तेलंगाना की निवासी हूं। हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रति मेरा गहरा लगाव है। मुझे बचपन से ही भावनाओं को शब्दों में ढालने का शौक रहा, जो धीरे-धीरे कविता लेखन में परिवर्तित हो गया। साहित्य मेरे लिए केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आत्मिक संतोष का माध्यम भी है।"
प्रश्न २. हिन्दी भाषा के प्रति आपका यह गहरा लगाव कैसे विकसित हुआ?
उत्तर: "हिन्दी भाषा की सरलता, आत्मीयता और भावनात्मक गहराई ने मुझे हमेशा आकर्षित किया। यद्यपि मैं अहिन्दी भाषी क्षेत्र में रहती हूं, फिर भी हिन्दी मेरे मन की भाषा रही है। पढ़ने और लिखने की रुचि ने इस लगाव को और अधिक मजबूत बनाया।"
प्रश्न ३. कविता लेखन की शुरुआत कब और कैसे हुई?
उत्तर: "कविता लेखन की शुरुआत सहज रूप से हुई। जीवन के अनुभव, समाज की परिस्थितियाँ, रिश्तों की संवेदनाएँ और मन की भावनाएँ स्वतः ही शब्दों में उतरने लगीं। प्रारंभ में निजी लेखन था, लेकिन प्रोत्साहन मिलने के बाद इसे सार्वजनिक मंचों तक ले जाने का साहस मिला।"
प्रश्न ४. आपकी कविताओं के प्रमुख विषय क्या होते हैं?
उत्तर: "मेरी कविताओं में मानवीय संवेदनाएँ, रिश्तों की गरिमा, सामाजिक सरोकार, नारी चेतना, प्रकृति, प्रेम, जीवन संघर्ष और सकारात्मक सोच प्रमुख रूप से दिखाई देती है। मैं चाहती हूं कि मेरी रचनाएँ केवल पढ़ी ही न जाएँ, बल्कि पाठकों के मन में कोई सकारात्मक विचार भी जगाएँ।"
प्रश्न ५. आपकी रचनाएँ प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘डेली हिन्दी मिलाप’ में प्रकाशित हुई हैं। इस अनुभव को आप किस रूप में देखती हैं?
उत्तर: "यह मेरे लिए अत्यंत गर्व और प्रेरणा का विषय है। जब अपनी रचनाओं को एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में प्रकाशित देखती हूं, तो आत्मविश्वास बढ़ता है। पाठकों की सराहना और पुरस्कार मिलना मेरे लिए आगे बेहतर लिखने की प्रेरणा बनता है।"
प्रश्न ६. क्या आपको लगता है कि हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में आज नए रचनाकारों के लिए अवसर बढ़े हैं?
उत्तर: "निश्चय ही अवसर बढ़े हैं। सोशल मीडिया और साहित्यिक मंचों ने नए रचनाकारों को अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम दिया है। हालांकि, गुणवत्ता, अध्ययन और धैर्य आज भी सफलता की मूल कुंजी हैं।"
प्रश्न ७. हाल ही में आप ‘काव्य रसिक संस्थान’ की तेलंगाना इकाई में मंत्री बनी हैं। इस दायित्व को आप कैसे देखती हैं?
उत्तर: यह मेरे लिए सम्मान के साथ-साथ जिम्मेदारी भी है। मेरा प्रयास रहेगा कि साहित्यिक गतिविधियों को अधिक सशक्त बनाया जाए, नए रचनाकारों को मंच मिले और हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में सार्थक योगदान दिया जा सके।
प्रश्न ८. आज के समय में हिन्दी भाषा की स्थिति को आप किस प्रकार देखती हैं?
उत्तर: "हिन्दी निरंतर आगे बढ़ रही है और विश्व स्तर पर अपनी पहचान मजबूत कर रही है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम स्वयं अपनी भाषा पर गर्व करें और दैनिक जीवन में उसका सम्मानपूर्वक प्रयोग करें।"
प्रश्न ९. आपके अनुसार एक अच्छी कविता की सबसे बड़ी विशेषता क्या होती है?
उत्तर: "मेरे अनुसार अच्छी कविता वही है जो सीधे हृदय तक पहुंचे, सहज हो, संवेदनाओं से जुड़ी हो और पाठक को सोचने पर विवश करे। शब्दों का सौंदर्य तभी सार्थक है जब उसमें भावों की सच्चाई हो।"
प्रश्न १०. लेखन के दौरान आपको प्रेरणा कहाँ से मिलती है?
उत्तर: "जीवन स्वयं सबसे बड़ा शिक्षक और प्रेरणा स्रोत है। आसपास की घटनाएँ, लोगों की भावनाएँ, रिश्तों की मिठास और संघर्ष—सब कुछ लेखन को प्रेरित करता है।"
प्रश्न ११. क्या कभी लेखन में कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा?
उत्तर: "हर रचनाकार के जीवन में चुनौतियाँ आती हैं। समय निकालना, स्वयं को निरंतर बेहतर बनाना और आलोचनाओं को सकारात्मक रूप में स्वीकार करना—ये सभी सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं।"
प्रश्न १२. नई पीढ़ी जो कविता लेखन में रुचि रखती है, उन्हें आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
उत्तर: "मैं यही कहना चाहूंगी कि खूब पढ़ें, धैर्य रखें और मौलिकता को बनाए रखें। केवल लिखना पर्याप्त नहीं, संवेदनशील होना भी आवश्यक है। साहित्य समाज को दिशा देने का माध्यम है, इसलिए जिम्मेदारी के साथ लिखें।"
प्रश्न १३. आपकी दृष्टि में साहित्य का समाज में क्या महत्व है?
उत्तर: "साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, बल्कि दिशा देने वाला माध्यम भी है। यह संवेदनाओं को जीवित रखता है, मनुष्यता को मजबूत करता है और विचारों को नई दिशा देता है।"
प्रश्न १४. आपकी भविष्य की साहित्यिक योजनाएँ क्या हैं?
उत्तर: "मेरी इच्छा है कि मैं निरंतर लेखन करती रहूं, अपनी कविताओं को अधिक व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाऊं और हिन्दी भाषा व साहित्य के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभाऊं।"
प्रश्न 15. अंत में हमारे पाठकों के लिए आपका कोई संदेश?
उत्तर: "हिन्दी केवल भाषा नहीं, भावनाओं का सेतु है। पढ़ने और लिखने की आदत को जीवित रखें, साहित्य से जुड़े रहें और जीवन में संवेदनशीलता को कभी कम न होने दें।"
एक बानगी
शिकवे से शुक्र तक
भूमिका
शिकवे से शुक्र तक केवल एक काव्य रचना नहीं, बल्कि जीवन के प्रति बदलती हुई दृष्टि का भावपूर्ण आत्मसंवाद है। यह कविता उन अनुभूतियों को शब्द देती है, जिनसे लगभग हर व्यक्ति कभी न कभी गुजरता है—शिकायतें, पीड़ा, बिछड़न, संघर्ष, सीख और अंततः स्वीकार्यता।
राखी पलोड जी ने इन पंक्तियों में जीवन को एक ऐसे प्रिय संबंध के रूप में देखा है, जिससे शिकायत भी है और गहरा प्रेम भी। कविता यह संकेत देती है कि जीवन केवल सुखों का नाम नहीं, बल्कि संघर्षों और अनुभवों की वह पाठशाला है जो व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है। जब इंसान शिकायतों के पीछे छिपे सबक को समझने लगता है, तब वही शिकायतें धीरे-धीरे कृतज्ञता में बदल जाती हैं। यही भाव इस कविता का मूल स्वर है—शिकवे से शुक्र तक की यात्रा।
कविता
शिकवे से शुक्र तक
शिकवे तो बहुत हैं तुमसे, ऐ ज़िंदगी,
पर शिकवा उसी से होता है,
जिससे प्रेम अत्यधिक होता है।
रूठना और मनाना—
प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है।
तुमने जितना रुलाया,
उससे कहीं अधिक मुस्कुराना भी सिखाया।
अपनों से बिछड़ने का दर्द बताया,
तो मिलन की खुशी का मोल भी समझाया।
परिस्थितियों के अनुरूप
स्वयं को ढालना सिखाया,
ठोकर खाकर हर बार
और मज़बूत बनना सिखाया।
बस अब जिंदगी को गले लगाकर जीना चाहती हूँ
शिकवे छोड़कर खुद से फिर मिलना चाहती हूँ
हर पल जी भर कर जीना चाहती हूँ
लव यू जिंदगी बार-बार कहना चाहती हूँ
राखी पलोड
व्याख्या
कविता की शुरुआत में कवयित्री जीवन से अपने शिकवों को स्वीकार करती हैं, किंतु साथ ही यह भी कहती हैं कि शिकायत उसी से होती है जिससे प्रेम अत्यधिक हो। यहाँ जीवन को एक अपनेपन भरे रिश्ते के रूप में प्रस्तुत किया गया है। “रूठना और मनाना” प्रेम की स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो यह दर्शाता है कि जीवन के साथ भी हमारा संबंध भावनात्मक और आत्मीय है।
आगे कवयित्री जीवन की कठोरताओं और उपहारों का संतुलित चित्र प्रस्तुत करती हैं। जीवन ने उन्हें रुलाया भी, पर मुस्कुराना भी सिखाया। अपनों से बिछड़ने का दर्द दिया, तो मिलन की खुशी का महत्व भी समझाया। यह अनुभूति जीवन के द्वंद्वात्मक स्वरूप को दर्शाती है—जहाँ दुख और सुख दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
कविता के अगले चरण में परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने और ठोकरों से सीखकर मजबूत बनने का संदेश है। यह जीवन की व्यवहारिक शिक्षा है कि चुनौतियाँ व्यक्ति को तोड़ने नहीं, बल्कि गढ़ने आती हैं।
अंतिम पंक्तियों में कविता आशा, आत्मस्वीकृति और सकारात्मकता के चरम पर पहुँचती है। कवयित्री अब शिकायतों को पीछे छोड़कर जीवन को गले लगाना चाहती हैं, स्वयं से पुनः जुड़ना चाहती हैं और हर पल को भरपूर जीने का संकल्प व्यक्त करती हैं। “लव यू जिंदगी” कहना यहाँ केवल एक भाव नहीं, बल्कि जीवन के प्रति पूर्ण स्वीकार्यता और कृतज्ञता का प्रतीक बन जाता है।
कविता से शिक्षा
1. जीवन से शिकायतें होना स्वाभाविक है, परंतु उन शिकायतों के पीछे छिपे सबक को समझना अधिक महत्वपूर्ण है।
2. सुख और दुख दोनों जीवन के शिक्षक हैं—एक हमें संवेदनशील बनाता है, दूसरा मजबूत।
3. परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालना ही जीवन कौशल है।
4. हर ठोकर एक नई सीख देती है, इसलिए असफलताओं से घबराना नहीं चाहिए।
5. स्वयं से जुड़ना और जीवन को स्वीकार करना, मानसिक शांति और आनंद का आधार है।
6. कृतज्ञता (शुक्र) शिकायतों (शिकवे) से कहीं अधिक शक्तिशाली भावना है, क्योंकि वही जीवन को सुंदर बनाती है।
सार रूप में, यह कविता हमें सिखाती है कि यदि हम जीवन को शिकायतों के बजाय सीख और प्रेम की दृष्टि से देखें, तो हर परिस्थिति में मुस्कुराने का कारण मिल सकता है। **शिकवे जब समझ में बदलते हैं, तब जीवन सचमुच “शुक्र” बन जाता है।**
सूचना स्रोत
विजया डालमिया
राष्ट्रीय संयोजिका
उलझन सुलझन (महिला लेखिका प्रकोष्ठ)
हैदराबाद
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति







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