संघर्ष, सेवा और समर्पण की मिसाल: डॉ. लोकेंद्र दवे से विशेष बातचीत
संघर्ष, सेवा और समर्पण की मिसाल
डॉ. लोकेंद्र दवे से विशेष बातचीत
भूमिका
चिकित्सा केवल एक पेशा नहीं, बल्कि सेवा, संवेदना और विश्वास का ऐसा दायित्व है जिसमें एक चिकित्सक मरीजों के जीवन में आशा का संचार करता है। ऐसे ही समर्पित चिकित्सकों में एक नाम है डॉ. लोकेंद्र दवे, जिन्होंने अपने पच्चीस वर्षों के चिकित्सा जीवन में अनेक उतार-चढ़ावों का सामना करते हुए चिकित्सा सेवा को जनसेवा का माध्यम बनाया।
राजस्थान के पाली जिले के सुगालिया गांव से निकलकर जोधपुर, अजमेर, पुणे और फिर भोपाल तक का उनका सफर केवल व्यावसायिक उपलब्धियों का नहीं, बल्कि संघर्ष, अनुशासन, पारिवारिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का भी प्रेरक उदाहरण है। एमबीबीएस और रेस्पिरेट्री मेडिसिन में एमडी की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने क्रिटिकल केयर में विशेष प्रशिक्षण लिया और आज भोपाल में रहकर हजारों मरीजों के जीवन में भरोसे और उपचार का आधार बने हुए हैं।
प्रस्तुत है डॉ. लोकेंद्र दवे से एक विशेष बातचीत—
बातचीत
प्रश्न १. सबसे पहले अपने प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में बताइए।
उत्तर : "मेरा मूल निवास राजस्थान के पाली जिले के सुगालिया गांव में है। हालांकि मेरी स्कूली शिक्षा का अधिकांश भाग जोधपुर में हुआ, जबकि प्राथमिक शिक्षा सुमेरपुर में प्राप्त की। परिवार ने हमेशा शिक्षा और संस्कारों को महत्व दिया, जिसका प्रभाव मेरे व्यक्तित्व और सोच पर स्पष्ट रूप से पड़ा।"
प्रश्न २. चिकित्सा क्षेत्र को ही अपने करियर के रूप में चुनने की प्रेरणा आपको कैसे मिली?
उत्तर : "मुझे शुरू से ही चिकित्सा क्षेत्र में रुचि थी। मैंने प्री-मेडिकल टेस्ट (PMT) पहले ही प्रयास में उत्तीर्ण किया और अपनी पसंद से मेडिकल फील्ड का चयन किया। मेरे लिए यह केवल एक पेशा नहीं बल्कि लोगों की सेवा का माध्यम था।"
प्रश्न ३. आपकी मेडिकल शिक्षा का सफर कैसा रहा?
उत्तर : "मैंने वर्ष 1999 में राजस्थान के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, जोधपुर से MBBS किया। इसके बाद वर्ष 2002 में गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, अजमेर से रेस्पिरेट्री मेडिसिन में MD की डिग्री प्राप्त की। यह समय सीखने, मेहनत और आत्मविश्वास निर्माण का महत्वपूर्ण दौर था।"
प्रश्न ४. एमडी के बाद आपने क्रिटिकल केयर में प्रशिक्षण लेने का निर्णय क्यों लिया?
उत्तर : "चिकित्सा क्षेत्र में निरंतर सीखना आवश्यक होता है। इसी सोच के साथ मैंने पुणे के रूबी हॉल हॉस्पिटल में क्रिटिकल केयर की विशेष ट्रेनिंग ली। इससे गंभीर मरीजों के उपचार और आपातकालीन चिकित्सा को बेहतर ढंग से समझने और संभालने का अवसर मिला।"
प्रश्न ५. प्रशिक्षण के बाद आपके व्यावसायिक जीवन की शुरुआत कैसे हुई?
उत्तर : "ट्रेनिंग के बाद पारिवारिक कारणों से मैंने लगभग दो वर्ष तक जोधपुर में निजी प्रैक्टिस की। इसके बाद भोपाल गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में फैकल्टी पोजीशन मिलने का अवसर मिला और मैं भोपाल आ गया। तब से यहीं रहकर लोगों की सेवा कर रहा हूँ।"
प्रश्न ६. एक नए शहर में जाकर स्वयं को स्थापित करना कितना चुनौतीपूर्ण रहा?
उत्तर : "प्रारंभिक चुनौतियाँ हर नए स्थान पर होती हैं, लेकिन भोपाल ने मुझे बहुत अपनापन दिया। आज मुझे यह शहर अजनबी नहीं लगता। लोगों का विश्वास और स्नेह मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है।"
प्रश्न ७. पच्चीस वर्षों के चिकित्सा करियर में आपने किन महत्वपूर्ण अनुभवों और संघर्षों का सामना किया?
उत्तर : "हर पेशे की तरह चिकित्सा क्षेत्र में भी अनेक उतार-चढ़ाव आते हैं। कई कठिन परिस्थितियाँ, गंभीर मरीजों का दबाव, भावनात्मक चुनौतियाँ और निर्णय लेने की जिम्मेदारियाँ इस यात्रा का हिस्सा रहीं। लेकिन हर अनुभव ने मुझे और मजबूत बनाया तथा मरीजों की सेवा के प्रति अधिक संवेदनशील किया।"
प्रश्न ८. आपके जीवन और सफलता का श्रेय आप किसे देना चाहेंगे?
उत्तर : "मेरी उपलब्धियों का सबसे बड़ा श्रेय मेरे परिवार, माता-पिता और मित्रों को जाता है, जिन्होंने हर परिस्थिति में मेरा साथ दिया। साथ ही, मैं अपने उन मरीजों का भी आभारी हूँ जो कठिन समय में मुझ पर विश्वास करके इलाज के लिए आते हैं। उनका विश्वास मेरे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है।"
प्रश्न ९. चिकित्सा सेवा में आपको सबसे अधिक संतुष्टि किस बात से मिलती है?
उत्तर : "जब किसी मरीज की स्थिति बेहतर होती है और उसके चेहरे पर राहत दिखाई देती है, तो वह संतोष शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह एहसास ही मुझे निरंतर बेहतर कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।"
प्रश्न १०. संघर्ष, सेवा और सफलता को जो मान्यता मिली तथा आपको जो पारितोषिक प्राप्त हुए, उन्हें आप किस दृष्टि से देखते हैं?
उत्तर : "किसी भी सम्मान या पारितोषिक को मैं व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं मानता। यह उस सेवा, विश्वास और सामूहिक सहयोग की पहचान है, जो वर्षों की मेहनत से बनी। ये सम्मान मुझे और अधिक जिम्मेदारी के साथ कार्य करने की प्रेरणा देते हैं।"
प्रश्न ११. युवा पीढ़ी, विशेषकर चिकित्सा क्षेत्र में आने वाले विद्यार्थियों के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर : "यदि आप चिकित्सा क्षेत्र में आना चाहते हैं तो इसे केवल करियर के रूप में न देखें, बल्कि सेवा और जिम्मेदारी के भाव से अपनाएँ। मेहनत, धैर्य, निरंतर अध्ययन और संवेदनशीलता—ये चार बातें आपको एक बेहतर डॉक्टर बना सकती हैं।"
समापन
डॉ. लोकेंद्र दवे का जीवन यह सिखाता है कि सच्ची सफलता केवल पद और प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि लोगों के विश्वास, सेवा और अपनत्व में निहित होती है। गांव की मिट्टी से निकलकर चिकित्सा जगत में अपनी पहचान बनाने वाले डॉ. दवे आज केवल एक चिकित्सक नहीं, बल्कि भरोसे और मानवीय संवेदनाओं का प्रतीक बन चुके हैं।
बुआ की प्रतिक्रिया
लोकेन्द्र, हमें तुम पर बहुत नाज़ है। तुमने केवल अपने माता-पिता ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार का नाम रोशन किया है। एक डॉक्टर के रूप में तुम्हारी पहचान जितनी प्रेरणादायक है, उससे कहीं अधिक तुम्हारा सेवा-भाव मन को सुकून देता है। बचपन में तुम्हारे पापा अक्सर कहा करते थे कि तुम्हें डॉक्टर बनकर लोगों की सेवा करनी है, और कोरोना काल में हमने उस सपने को साकार होते देखा—जब तुमने दिन-रात एक कर मरीजों की सेवा को अपना धर्म बना लिया।
वास्तव में, एक सैनिक और एक डॉक्टर में बहुत अधिक अंतर नहीं होता। सैनिक देश की सीमाओं पर दुश्मनों से लड़ता है, जबकि डॉक्टर रोगों से संघर्ष कर रोगियों को नया जीवन देता है। दोनों ही अपने कर्तव्य और समर्पण से समाज की रक्षा करते हैं।
लोकेन्द्र, तुम हमारे परिवार का गर्व और अभिमान हो। ईश्वर करे तुम यूँ ही दिन दूनी, रात चौगुनी सफलता प्राप्त करते रहो और अपनी सेवा से अनगिनत लोगों के जीवन में आशा का प्रकाश फैलाते रहो।
तुम्हारे जीवन का सफर आसान नहीं रहा। बहुत कम उम्र में पापा का साया सिर से उठ गया, लेकिन तुम्हारी मम्मी ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने संघर्षों का डटकर सामना किया और हर परिस्थिति में तुम्हें प्रेरणा देती रहीं। यही कारण है कि कठिनाइयाँ भी तुम्हारे संकल्प के सामने छोटी पड़ गईं।
सच है—जीवन में संघर्ष हो या सफलता, यदि परिवार का साथ और विश्वास साथ हो, तो हर सफर आसान लगने लगता है। हम सभी जीवन में बहुत कुछ पाना चाहते हैं और उसके लिए मेहनत भी करते हैं, परंतु सफलता का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होता है जब उसमें परिवार के संस्कार, त्याग और सहयोग की छाप जुड़ी हो। लोकेन्द्र की सफलता इसी प्रेरणा का सुंदर उदाहरण है।
सूचना स्रोत
श्रीमती प्रमिला त्रिवेदी
स्थानीय संपादिका
उलझन सुलझन, महिला प्रकोष्ठ
बेंगलुरु
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति







टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें