नहीं रहा वो जो साथ-साथ आया था जहाँ में

नहीं रहा वो जो साथ-साथ आया था जहाँ में

— राजीव


कुछ लोग जीवन में केवल साथ नहीं चलते, वे अपने साथ चलने वालों की स्मृतियों में एक ऐसी जगह बना लेते हैं, जहाँ समय बीतने के बाद भी उनकी उपस्थिति महसूस होती रहती है। यतेंद्रवीर सिंह भी ऐसी ही शख्सियत थे।

कुछ माह के अंतर से इस जीवन से साक्षात्कार हुआ था—यतेंद्र, सुनील और राजीव का। उम्र लगभग साथ-साथ बढ़ी, जीवन की अनेक अवस्थाएँ समान समय में देखीं और अपने-अपने ढंग से जीवन के ध्येय को साधने का प्रयास किया। दिलचस्प संयोग यह भी रहा कि ये तीनों केवल सम-वय ही नहीं थे, बल्कि एक ही कुनबे की अलग-अलग शाखाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए जीवन की यात्रा में एक-दूसरे से जुड़े रहे।

इन तीनों में यतेंद्रवीर सबसे अधिक नवाचारी थे। उनकी सोच में एक अलग तरह की गति थी। उन्होंने बुद्धि-कौशल से आयुर्वेद की शिक्षा अर्जित की, लेकिन उनकी प्रतिभा ने अपनी असली उड़ान बीमा क्षेत्र में भरी। जिस क्षेत्र में सामान्यतः लोग निर्धारित प्रक्रियाओं और परंपरागत तरीकों के सहारे आगे बढ़ते हैं, वहाँ यतेंद्रवीर अपनी कल्पना, व्यवहार-कौशल और परिस्थितियों को अपने पक्ष में ढाल लेने की क्षमता के कारण अलग दिखाई देते थे।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी—असंभव दिखाई देने वाले लक्ष्य को संभव मानकर उसके लिए रास्ता तलाशना।

उनके काम करने का अंदाज भी कम दिलचस्प नहीं था। सामान्य व्यक्ति किसी गंतव्य तक पहुँचने के लिए पहले यातायात का साधन तय करता है और फिर दूरी तथा समय का हिसाब लगाता है। यतेंद्रवीर का गणित कुछ अलग था। वे कई बार पूरे दिन के लिए साधन पहले तय कर लेते थे। दूरी उनके लिए उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जाती थी, जब मनचाही शर्तों और पारिश्रमिक पर सहमति बन जाती थी।

यह केवल उनके काम करने का तरीका नहीं था, बल्कि उनके व्यक्तित्व की सोच को भी प्रकट करता था—समस्या को देखकर रुकना नहीं, बल्कि समाधान की दिशा में विकल्प तलाशना।

बीमा क्षेत्र में भी उन्होंने इसी सोच को अपनाया। क्लाइंट के सामने आकर्षक प्रस्ताव रखना, उसकी आवश्यकता को समझना, उसे सहजता से अपनी बात समझाना और फिर अपने मृदुल व्यवहार से सहमति का वातावरण बना देना—यह उनका अपना कौशल था। वे केवल काम नहीं करते थे, काम करने के नए तरीके खोजते थे।

शायद यही कारण था कि उनके लिए लक्ष्य केवल लक्ष्य नहीं रहता था; वह एक चुनौती बन जाता था। और चुनौती उनके भीतर की रचनात्मकता को सक्रिय कर देती थी।

उनके जीवन की ऐसी न जाने कितनी घटनाएँ होंगी, जिन्हें उनके साथ काम करने वालों, मित्रों और परिचितों ने अपने-अपने अनुभव के रूप में संजो रखा होगा। किसी के लिए वे कुशल व्यवसायी रहे होंगे, किसी के लिए सहज मित्र, किसी के लिए आत्मीय संबंधी और किसी के लिए ऐसे व्यक्ति, जिनसे बात करने भर से कोई नया रास्ता सूझ जाता था।

उनका मृदुल स्वभाव उनके नवाचार को और प्रभावी बना देता था। प्रतिभा यदि व्यवहार में कठोरता ले आए तो वह दूरी पैदा करती है; लेकिन यतेंद्रवीर की प्रतिभा के साथ सहजता और आत्मीयता जुड़ी हुई थी। इसलिए वे लोगों को अपने विचार से जोड़ पाते थे।

जीवन को यदि एक यात्रा माना जाए तो हममें से प्रत्येक अपने-अपने साधन और अपनी-अपनी दिशा के साथ आगे बढ़ता है। यतेंद्रवीर ने भी इस यात्रा में अपनी राह बनाई। उन्होंने यह दिखाया कि उपलब्ध संसाधन सीमित हो सकते हैं, परिस्थितियाँ अनुकूल न हों, लेकिन सोच में नवीनता हो तो रास्ते निकाले जा सकते हैं।

और फिर जीवन ने अचानक करवट ली।

कुछ माह पूर्व यह ज्ञात हुआ कि यतेंद्रवीर के मस्तिष्क में ट्यूमर है। जिस व्यक्ति ने जीवनभर कठिन परिस्थितियों के लिए नए रास्ते तलाशे, उसके सामने इस बार ऐसी चुनौती खड़ी थी, जिसके समाधान का निर्णय मनुष्य के हाथ में नहीं था।

हम बहुत कुछ कर सकते हैं—प्रयास कर सकते हैं, उपचार करा सकते हैं, आशा रख सकते हैं, साथ खड़े रह सकते हैं। लेकिन जीवन और मृत्यु की अंतिम सीमा पर पहुँचकर मनुष्य की सारी योजनाएँ मौन हो जाती हैं।

आज यतेंद्रवीर हमारे बीच नहीं हैं।

यह स्वीकार करना सहज नहीं है कि जो व्यक्ति हमारे साथ लगभग समान समय में इस संसार में आया था, जिसने साथ-साथ जीवन के अनेक पड़ाव देखे, जिसके साथ स्मृतियों का एक लंबा सिलसिला जुड़ा था—वह अब अचानक उस यात्रा का हिस्सा नहीं रहा, जिसे हम आगे भी साथ चलने की कल्पना करते रहे थे।

नहीं रहा वो, जो साथ-साथ आया था जहाँ में।

लेकिन क्या सचमुच वह चला गया?

शरीर चला जाता है, आवाज मौन हो जाती है, मिलने-जुलने का क्रम रुक जाता है; पर व्यक्ति का जीवन, उसका व्यवहार, उसकी सोच और उसके द्वारा छोड़ी गई स्मृतियाँ पीछे रह जाती हैं। यतेंद्रवीर की सबसे बड़ी स्मृति शायद उनकी नवाचारी सोच ही होगी—वह सोच जो साधारण परिस्थितियों में भी असाधारण रास्ता खोज लेती थी।

आज जब हम उन्हें याद करते हैं तो दुख के साथ-साथ यह एहसास भी होता है कि जीवन की लंबाई हमारे हाथ में नहीं, लेकिन जीवन को किस तरह जिया जाए, यह काफी हद तक हमारे हाथ में होता है।

यतेंद्रवीर ने अपनी उपलब्ध आयु में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने अपनी शिक्षा को अपने कर्म से जोड़ा, अपनी प्रतिभा को प्रयोग में लगाया और अपने कार्यक्षेत्र में ऐसे प्रयोग किए, जिन्हें देखने वाले आज भी याद कर सकते हैं।

सुनील, यतेंद्र और राजीव की यह लगभग समानांतर यात्रा अब एक स्थान पर आकर बदल गई है। तीन में से एक साथी स्मृतियों का हिस्सा हो गया है। शेष दो के लिए यह केवल एक मित्र को खोना नहीं, बल्कि अपने जीवन के उस हिस्से को खोना भी है, जिसमें तीनों की उपस्थिति थी।

समय आगे बढ़ेगा। जीवन अपनी गति से चलता रहेगा। काम होंगे, मुलाकातें होंगी, नई पीढ़ियाँ आएँगी। लेकिन कभी किसी प्रसंग में यतेंद्रवीर की कोई बात याद आएगी, कोई पुराना अनुभव सामने आएगा, कोई उनका अपनापन महसूस होगा—और तब लगेगा कि कुछ लोग मृत्यु के बाद भी पूरी तरह विदा नहीं होते।

वे हमारी स्मृतियों में जीवित रहते हैं।

यतेंद्रवीर, आपकी यात्रा भले ही यहाँ थम गई हो, पर आपके साथ बिताए समय की यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है। वह उन सभी लोगों की स्मृतियों में चलती रहेगी, जिन्हें आपने अपने जीवन में किसी न किसी रूप में छुआ।

ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे और परिवार, मित्रों तथा सभी आत्मीयजनों को इस वियोग को सहने की शक्ति दे।

॥ ॐ शांति ॥





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