हस्तिनापुर साहित्य उत्सव २०२६ का आरंभिक संबोधन

स्वागत संबोधन

भूमिका

हस्तिनापुर साहित्य उत्सव २०२६ के प्रथम आयोजन का यह आरंभिक स्वागत संबोधन केवल शब्दों का संयोजन नहीं, अपितु एक दूरदर्शी संकल्प, सांस्कृतिक पुनर्जागरण की भावना और साहित्य के माध्यम से समाज को दिशा देने के प्रयास का सशक्त उद्घोष है। इस भूमिका में सृजक आदर्श जी की वह चेतना स्पष्ट झलकती है, जो परंपरा और आधुनिकता के मध्य सेतु बनाकर भारतीय मूल्यों को पुनः प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न करती है। उनके शब्दों में न केवल अपने पूर्वजों के संस्कारों का सम्मान है, बल्कि भविष्य के लिए एक सुदृढ़ वैचारिक आधार भी है। यह संबोधन आयोजन की गरिमा, उद्देश्य और व्यापकता को स्थापित करते हुए उपस्थित जनसमूह को एक ऐसे साहित्यिक एवं सांस्कृतिक प्रवाह से जोड़ता है, जो आत्म-बोध से विश्व-बोध की ओर अग्रसर है।

मूल संबोधन


पूजूँ मात सरस्वती, सिमरूँ सिद्ध गणेश,

जिनके सिमरन मात्र से, जड़ता रहे न शेष ॥

आज के इस हस्तिनापुर साहित्य उत्सव के प्रथम संस्करण के आयोजन के अध्यक्ष योगनिष्ठ पूज्यपाद स्वामी कर्मवीर जी, महामहिम श्री आरिफ़ मोहम्मद ख़ान जी, आदरणीय श्री वीरेंद्र सिंह जी, श्री अशोक कटारिया जी, डा॰ पुष्कर मिश्रा जी, श्री पवन कुमार जी, डा॰ महेश पाण्डेय बजरंग जी, श्रीमती वैदेही तामण जी, डा॰ यतीन्द्र कटारिया जी, अखिल भारतीय साहित्य परिषद के सम्मानित सदस्यगण, मूर्धन्य विद्वान, देश के प्रसिद्ध कविवर, विशिष्ट अतिथि गण, हँसापुर परिवार, मीडिया बंधुओ, देवियो और सज्जनो..!

मनुष्य व समाज की जीवन-यात्रा में कुछ निर्णायक व ऐतिहासिक पल आते हैं । ऐसे क्षण, जब कोई अद्भुत घटना घटित हो , कोई नया सृजन हो , कोई रचनात्मक अन्वेषण हो, विशेष विचार का कोई प्रतिपादन हो, कोई ऐसा बीजारोपण हो जो एक नई फ़सल की शुरुआत हो ।

आज का यह आयोजन एक ऐसा ही अवसर है जब अतीत की स्वर्णिम धरोहर पर पड़ी धूल को वर्तमान के पुरुषार्थ से साफ़ कर, एक नए गौरवशाली व वैभवशाली भविष्य का शिलान्यास किया जा रहा है ।

यह मात्र एक आयोजन नहीं है अपितु यह एक प्रयोजन है जो भारत की सांस्कृतिक धरोहर को पुनर्जीवित व पुनर्स्थापित करने का कार्य करेगा । और हम सब परम सौभाग्यशाली हैं जो इस पुनीत अवसर के साक्षी बन रहे हैं ।

साहित्य समाज का दर्पण होता है । किसी भी समाज का साहित्यिक विमर्श उसकी आत्मा होती है । आज का यह साहित्य उत्सव उस दर्पण में अपने अतीत, वर्तमान व भविष्य को देखने का एक प्रयास है। यह उस भारतीय चिंतन का प्रस्फुटन है जो यह कहता है कि-

विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।

पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम्॥

विद्या से विनयशीलता आती है, विनय से पात्रता/योग्यता, योग्यता से धन की प्राप्ति होती है, धन से धर्म का निर्वाह होता है और जहाँ धर्म है वहीं सुख है ।

और! हम सब मनुष्य सुख की कामना ही तो करते हैं तथा जीवन भर उस सुख के पीछे भागते हैं। परन्तु इन सब की नींव तो विद्या ही है और साहित्य विद्या का कोष है, इसलिए साहित्य का पोषण, प्रचार, प्रसार, अन्वेषण, अनुपालन-सब कुछ मनुष्य के जीवन को सार देता है, विस्तार देता है, सार्थक बनाता है ।

इस विचार व चेतना ने आज से १२६ वर्ष पूर्व इस गाँव में हमारे दादाजी स्वर्गीय श्री नैन सिंह व श्री तेज सिंह जी के रूप में जन्म लिया जिन्होंने शिक्षा के मर्म को जाना। उस समय उनके पास लाहौर से डाक द्वारा मिलाप अख़बार आता था, जो उनकी शिक्षा में रुचि व जागरूकता का प्रमाण है।

विद्या के महत्त्व को जानते व मानते हुए हमारे दिवंगत पूज्य पिताजी श्री जयकरण सिंह जी व माता श्रीमती अत्रि देवी जी ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और ऐसा लालन-पालन, संस्कार इस परिवार को दिए जिसकी परिणति आज आप सबके सामने है । जयत्री पुरस्कार उन दोनों दिव्य आत्माओं के उस अतुलनीय व अविस्मरणीय योगदान को दर्शाता है ।

एक स्वस्थ, सबल, समृद्ध, सुसंस्कृत, सुव्यवस्थित समाज व राष्ट्र का निर्माण उस साहित्य के माध्यम से ही संभव है जो श्रेष्ठ मानव मूल्यों को स्थापित करने वाला हो । जिसमें धर्म का मर्म हो, आधार जिसका सत्कर्म हो, जो मनुष्य चेतना को जागृत कर उसे देवत्व की ओर अग्रसर करे, उसके जीवन में सुख, शान्ति, समृद्धि व आनन्द का सृजन करे ।

यह हस्तिनापुर साहित्य उत्सव - एक ऐसे ही बीज का रोपण है जो न केवल हमारे गाँव, हमारे क्षेत्र, हमारे प्रदेश बल्कि सारे देश व सम्पूर्ण विश्व में मानवता के विमर्श को समर्पित रहेगा। आज का विचार- आत्म-बोध से विश्व बोध इसी बात का प्रमाण है। यह विश्व-बन्धुत्व की भागीरथी अनंतकाल तक यूँ ही अनवरत बहती रहे, मानव सभ्यता को भारतीयता के जीवनदायनी श्रेष्ठतम जीवन-मूल्यों से प्लावित करती रहे, इसी भावना, कामना विश्वास व प्रार्थना के साथ आज के इस आयोजन में आप सभी का हार्दिक स्वागत है ।

एक शेर के साथ मैं अपने मनोभावों को समेटता हूँ:-

ए खुदा दे हमको ऐसे आदमी,

जिनके सर में मगज़ हो, मगज़ में ताबंदगी।

जिनकी रग-रग में हज़ारों बिजलियाँ हों बेक़रार,

जिनके दिल मज़बूत हों और उमंगें शोलाबार।

महामहिम के सान्निध्य व आप सभी विशिष्ट विभूतियाँ के आगमन व उपस्थिति के लिए मैं पुनः आप सभी का, अपनी ओर से, अपने परिवार की ओर से हार्दिक स्वागत करता हूँ। आशा करता हूँ आप सब यहाँ से मधुर स्मृतियाँ संजोकर जाएँगे।

धन्यवाद..!


सूचना प्रेषक

                         श्री आदर्श कुमार जैनर

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 





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