समाज बोध से राष्ट्र निर्माण तक श्री सोमदत्त जी
प्रेरक साक्षात्कार
समाज बोध से राष्ट्र निर्माण तक श्री सोमदत्त जी
संक्षिप्त परिचय
श्री सोमदत्त सिंह जी का जन्म ग्राम–चक बारसपुर, जनपद अमरोहा में हुआ। आपने एम.ए. (हिन्दी, अर्थशास्त्र) एवं बी.एड. की शिक्षा अर्जित की।
आपने वर्ष 1983 से 2019 तक राजकीय सेवा में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।
आपकी सेवाओं का विस्तार इस प्रकार रहा—
सहायक अध्यापक (माध्यमिक शिक्षा विभाग) – कृषक उपकारक इंटर कॉलेज, सदरपुर–मतलबपुर, मुरादाबाद
परियोजना अधिकारी – साक्षरता/शैक्षिक योजनाएँ (जनपद बदायूँ एवं रामपुर)
परियोजना अधिकारी (राजपत्रित) – प्रौढ़ शिक्षा विभाग, जनपद रामपुर
सहायक अध्यापक – राजकीय इंटर कॉलेज (जनपद मुरादाबाद/अमरोहा)
जिला समन्वयक (राजपत्रित) – मुरादाबाद/सम्भल
प्रधानाचार्य (राजपत्रित) – राजकीय इंटर कॉलेज, अमरोहा
बातचीत
प्रश्न १. सोमदत्त जी, आपके जीवन की शुरुआत एक साधारण ग्रामीण परिवेश से हुई। इस पृष्ठभूमि ने आपके व्यक्तित्व को कैसे गढ़ा?
उत्तर: "गाँव का जीवन ही मेरा पहला विद्यालय रहा। वहीं मैंने समाज की वास्तविकता को समझा। अभावों ने मुझे संवेदनशील बनाया और लोगों के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित किया। यही भावना आगे चलकर मेरे शिक्षण का आधार बनी।"
प्रश्न २. आपने सोशल स्टडीज जैसे विषय को अपने जीवन का केंद्र क्यों बनाया?
उत्तर: "सोशल स्टडीज समाज का दर्पण है। यह विषय हमें इतिहास से सीखने, वर्तमान को समझने और भविष्य को संवारने की दृष्टि देता है। मेरा उद्देश्य था कि विद्यार्थी सिर्फ पढ़ें नहीं, बल्कि समाज को महसूस करें।"
प्रश्न ३. एक सहायक अध्यापक से लेकर प्रधानाचार्य तक की आपकी यात्रा कैसी रही?
उत्तर: "यह यात्रा निरंतर सीखने और जिम्मेदारियों को स्वीकार करने की रही। सहायक अध्यापक के रूप में मैंने कक्षा में विद्यार्थियों को समझा, और जब प्रधानाचार्य बना, तो पूरे संस्थान को एक परिवार की तरह संचालित करने का प्रयास किया।"
प्रश्न ४. आपने परियोजना अधिकारी के रूप में भी कार्य किया। उस अनुभव ने आपको क्या सिखाया?
उत्तर: "बदायूँ और रामपुर में साक्षरता एवं प्रौढ़ शिक्षा से जुड़ी योजनाओं पर काम करते हुए मैंने महसूस किया कि शिक्षा केवल बच्चों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जब एक वयस्क पढ़ना सीखता है, तो पूरा परिवार जागरूक होता है।"
प्रश्न ५. एक शिक्षक के रूप में आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही?
उत्तर: "मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि मेरे विद्यार्थी हैं। जब वे समाज में अच्छे नागरिक बनकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं, तो वही मेरी सच्ची सफलता है।"
प्रश्न ६. आज के शिक्षकों के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर: "शिक्षक को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे विद्यार्थियों के भीतर सोचने, प्रश्न करने और संवेदनशील बनने की क्षमता विकसित करनी चाहिए।"
प्रश्न ७. वर्तमान पीढ़ी के विद्यार्थियों में आप क्या कमी और क्या संभावना देखते हैं?
उत्तर: "आज के विद्यार्थियों में ज्ञान की पहुँच बहुत आसान हो गई है, लेकिन धैर्य और गहराई की कमी दिखती है। यदि वे अपने ज्ञान को सही दिशा में लगाएँ, तो वे समाज में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।"
प्रश्न ८. अंत में, आप अपने जीवन-दर्शन को कैसे व्यक्त करेंगे?
उत्तर: "मेरा मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण है। यदि हम अच्छे इंसान तैयार कर पाए, तो समाज अपने आप बेहतर बन जाएगा।"
समापन
श्री सोमदत्त जी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि एक शिक्षक यदि अपने दायित्व को सेवा के रूप में निभाए, तो वह न केवल विद्यार्थियों का, बल्कि पूरे समाज का भविष्य बदल सकता है। उनका अनुभव, उनकी संवेदना और उनकी सादगी आज के शिक्षकों और युवाओं के लिए एक सशक्त प्रेरणा है।
सूचना स्रोत
श्री सोमदत्त सिंह जी
अमरोहा
पाठ्य उन्नयन और विस्तार
प्रस्तुति






टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें