पूर्वोत्तर भारत की ‘सात बहनों’ की यात्रा
पूर्वोत्तर भारत की
‘सात बहनों’ की यात्रा
किसी स्वप्निल लोक में विचरण करने से कम नहीं हैं ये यात्राएँ! प्राकृतिक सौंदर्य, अनूठी संस्कृतियों और पर्वत-श्रृंखलाओं के मध्य बिताए गए वे क्षण स्मृति-पटल पर एक अमिट छाप छोड़ जाते हैं। प्रस्तुत है इस यात्रा का एक संक्षिप्त, किंतु हृदयस्पर्शी संस्मरण।
पूर्वोत्तर के आँगन में
सात बहनों की एक झलक
प्राकृतिक वैभव और हरियाली
यात्रा की शुरुआत असम में ब्रह्मपुत्र के विशाल पाट और काजीरंगा के सघन वनों से हुई, जहाँ प्रकृति अपनी पूर्ण भव्यता के साथ मानो बाहें फैलाकर स्वागत करती है। मेघालय में बादलों का लुका-छिपी खेलना और चेरापूंजी की रिमझिम फुहारें ऐसा आभास कराती हैं, मानो धरती और आकाश का मधुर मिलन हो रहा हो। अरुणाचल प्रदेश की तवांग घाटी में बर्फ़ की श्वेत चादर और शांत मठों का वातावरण मन को एक अद्वितीय शांति से भर देता है।
क्षेत्रीय प्रवास के दौरान का छायांकन
सांस्कृतिक विविधता का संगम
प्रत्येक राज्य की अपनी विशिष्ट पहचान है। नगालैंड के जीवंत लोकगीत, मणिपुर का शास्त्रीय नृत्य, मिज़ोरम के बाँस के वनों की मधुर सरसराहट और त्रिपुरा के भव्य मंदिरों की उत्कृष्ट शिल्पकला—ये सभी भारत की सांस्कृतिक विविधता के सशक्त प्रतीक हैं। वहाँ के स्थानीय लोगों का सरल जीवन और उनकी आत्मीयता, आज के महानगरीय दिखावे के युग में, एक सुकून भरे अनुभव की तरह प्रतीत होती है।
चिंतन और आत्मीय बोध
इन शांत पहाड़ियों के बीच आत्म-विश्लेषण का पर्याप्त अवसर प्राप्त हुआ। जब हम प्रकृति के इतने समीप होते हैं, तब यह अनुभूति होती है कि जीवन की वास्तविक सार्थकता बाहरी चकाचौंध में नहीं, बल्कि इस मौन, इस विस्तार और इस सहजता को अनुभव करने में निहित है। यह यात्रा केवल भौगोलिक पर्यटन नहीं थी, बल्कि अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति के एक अनदेखे अध्याय को निकट से जानने का माध्यम भी बनी।
सात बहनों की यह पावन गोद हमें यह सिखाती है कि आधुनिकता की तीव्र दौड़ में भी परंपराओं और प्रकृति का संरक्षण किस प्रकार संभव है। मानस के गलियारों में इन स्मृतियों की सुगंध सदैव महकती रहेगी।
रचनाकार
डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’
स्थानीय संपादिका, उलझन सुलझन (लेडीज़ विंग)
अहमदाबाद (गुजरात)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति








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