खत: कागज़ पर उतरती हुई आत्मीयता
खत
कागज़ पर उतरती हुई आत्मीयता
कभी संवाद इतना धीमा भी होता था कि उसमें प्रतीक्षा की धड़कनें सुनाई देती थीं।
कभी शब्द इतने सजीव होते थे कि वे कागज़ पर नहीं, सीधे दिल पर लिखे जाते थे।
वह समय खतों का था—जहाँ हर पत्र केवल सूचना नहीं, बल्कि एक जीवित एहसास होता था।
खत…
सिर्फ अक्षरों का संयोजन नहीं,
बल्कि उन भावनाओं का विस्तार था,
जहाँ जुबां की सीमाएँ समाप्त हो जाती थीं
और आत्मा अपनी भाषा स्वयं चुन लेती थी।
जब बोलना कठिन होता,
तब लिखना सहज हो जाता।
और यही सहजता, खतों को जादुई बना देती थी।
खत पढ़ना—
मानो किसी अनुपस्थित व्यक्ति की उपस्थिति को महसूस करना।
शब्दों के बीच छिपी धड़कनों को सुनना,
और हर पंक्ति में एक चेहरा उभरते देखना।
कुछ पंक्तियाँ मुस्कान बनकर होठों पर ठहर जातीं,
तो कुछ अनायास ही आँखों को भिगो जातीं।
वह संवाद नहीं, संवेदनाओं का प्रवाह था—
जो दूरी को अर्थहीन कर देता था।
समय बीतता गया…
तकनीक ने संवाद को तेज़ तो किया,
पर उसकी आत्मीयता कहीं पीछे छूट गई।
आज जब वर्षों पुराने खत हाथों में आते हैं,
तो एक अनकहा प्रश्न मन में तैरता है—
*क्या सचमुच खतों की खुशबू खो जाती है?*
या वह हर बार उँगलियों के स्पर्श से
फिर जीवित हो उठती है—
किसी अपने की महक बनकर…
कविता
एक पुनः आमंत्रण
आज कुछ नया काम करते हैं,
चलो… आज हम फिर से खत लिखते हैं।
शब्दों को सांस बनने दो,
और भावों को स्पर्श—
संवादों के उस पुराने सेतु पर
फिर एक बार चलकर देखते हैं।
चलो… आज हम फिर से खत लिखते हैं।
तुम्हारी कलम की स्याही में,
तुम्हारे स्पर्श की गर्माहट हो,
हर अल्फाज़ पर ठहरी तुम्हारी नज़र—
जैसे कोई खामोश इकरार हो।
चलो… आज हम फिर से खत लिखते हैं।
पूछें—
मौसम कैसा है वहाँ?
आम के पेड़ों पर इस बार कितने फल आए हैं?
इन मामूली सवालों में ही
जीवन के असली रंग तलाशते हैं।
चलो… आज हम फिर से खत लिखते हैं।
कुछ छोटी शिकायतें,
कुछ अधूरे सवाल—
इन्हीं से तो बनती है
रिश्तों की सबसे सच्ची कहानी।
चलो… आज हम फिर से खत लिखते हैं।
लिफाफे पर अपना नाम देखकर,
भीतर ‘प्रिय’ का संबोधन पढ़कर,
और अंत में तुम्हारा नाम पाकर—
उस कागज़ को होंठों से छू लेते हैं।
क्योंकि…
वह केवल खत नहीं होता,
वह किसी अपने का स्पर्श होता है।
चलो… आज हम फिर से खत लिखते हैं।
संक्षिप्त संपादकीय धार
यह रचना केवल स्मृति नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्स्मरण है—जहाँ लेखक पाठक को केवल अतीत में नहीं ले जाता, बल्कि उसे वर्तमान में एक विकल्प भी देता है—
धीमे, गहरे और सच्चे संवाद का विकल्प।
रचनाकार
विजया डालमिया
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति





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