आत्मकथ्य — डॉ. अशोक कुमार चौधरी

आत्मकथ्य 

डॉ. अशोक कुमार चौधरी

शब्दों से मेरा संबंध केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मा की उस धारा का प्रवाह है, जो जीवन के अनुभवों, संवेदनाओं और समाज के प्रति उत्तरदायित्व से निरंतर सिंचित होती रही है। साहित्य मेरे लिए साधना है—एक ऐसी साधना, जो व्यक्ति को स्वयं से जोड़ते हुए समाज के व्यापक सरोकारों तक ले जाती है।

हस्तिनापुर साहित्य उत्सव जैसे विराट और गरिमामय आयोजन में मेरी पुस्तक का लोकार्पण होना मेरे लिए केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि यह मेरे साहित्यिक जीवन की एक भावपूर्ण और स्मरणीय साधना-पूर्ति का क्षण है। उस ऐतिहासिक धरा पर, जहाँ महाभारत की गूंज आज भी संस्कृति के कण-कण में जीवित है, अपने शब्दों को प्रतिष्ठा मिलना मेरे लिए अत्यंत विनम्रता और गर्व का विषय है।

इस अवसर पर मैं विशेष रूप से इस आयोजन के जनक, दूरदर्शी व्यक्तित्व और प्रेरणास्रोत आयोजकों के साथ श्री यतीन्द्र कटारिया के प्रति अपनी हृदय से कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। उनकी कल्पना, प्रतिबद्धता और साहित्य के प्रति समर्पण ने इस आयोजन को केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया। उनके प्रयासों ने हम जैसे साहित्य साधकों को एक ऐसा मंच दिया, जहाँ शब्द केवल पढ़े नहीं जाते, बल्कि जिए जाते हैं।

मैं आयोजन से जुड़े सभी आयोजकों, साहित्यकारों, विद्वानों और उपस्थित जनों का भी आभार व्यक्त करता हूँ, जिनकी उपस्थिति और स्नेह ने इस क्षण को और अधिक सार्थक बना दिया। यह सम्मान और यह अवसर मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा, जिससे मैं आगे भी समाज और साहित्य के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन और अधिक निष्ठा से कर सकूँ।

 


अंततः, मैं अपने पाठकों और शुभचिंतकों का भी आभारी हूँ, जिनके विश्वास और स्नेह ने मुझे निरंतर लिखने और स्वयं को अभिव्यक्त करने की शक्ति दी है।

सादर

सूचना स्रोत 

डॉ. अशोक कुमार चौधरी

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 






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