कवि और कविता
कवि और कविता
भूमिका
कविता केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि वह संवेदना की वह धारा है जो हृदय से फूटकर मानवता तक पहुँचती है। प्रस्तुत दोनों काव्य— कवि और कविता— इसी संवेदनात्मक प्रवाह के दो सशक्त आयाम हैं, जिनमें सृजनकर्ता और सृजन, दोनों का गहन और आत्मीय चित्र उभरता है।
कवि शीर्षक से कविता में रचनाकार ने यह अत्यंत सूक्ष्म सत्य उद्घाटित किया है कि कवि कविता नहीं रचता, बल्कि कविता स्वयं कवि के भीतर जन्म लेती है। कवि का हृदय एक दर्पण है, जिसमें समाज का हर सुख-दुःख, हर पीड़ा और हर उल्लास प्रतिबिंबित होता है। वह स्वयं को भुलाकर जन-जन की वेदना को स्वर देता है। उसकी संवेदनशीलता ही उसे विशिष्ट बनाती है—वह रोते हुए को हँसा सकता है और हँसते हुए को विचारों में डुबो सकता है। राष्ट्रप्रेम, भक्ति और मानवीय करुणा का ऐसा समन्वय इस कविता को एक व्यापक सामाजिक दृष्टि प्रदान करता है।
वहीं कविता शीर्षक वाली रचना में कवि ने कविता को एक जीवंत सत्ता के रूप में प्रस्तुत किया है—एक ऐसी बेटी, जो कवि के हृदय में जन्म लेकर समय, परिस्थिति और भावनाओं के साथ नृत्य करती रहती है। यहाँ कविता केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि संस्कृति, अध्यात्म और इतिहास की वाहक बन जाती है। श्रीकृष्ण की गीता से लेकर संतों की वाणी और आधुनिक काव्यधारा तक—कविता की निरंतरता और उसकी अनश्वरता को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उकेरा गया है।
इन दोनों रचनाओं के माध्यम से कवि कृष्ण दत्त शर्मा ‘कृष्ण’ ने यह सिद्ध किया है कि कविता किसी एक भाव या विषय की सीमाओं में बंधी नहीं रहती, बल्कि वह जीवन के समस्त रंगों—विरह, मिलन, भक्ति, राष्ट्रप्रेम और मानवीय करुणा—को समेटे हुए एक व्यापक आकाश है। कवि की यह सोच न केवल उसकी रचनात्मक गहराई को दर्शाती है, बल्कि यह भी प्रमाणित करती है कि सच्चा कवि अपने युग का साक्षी, समाज का संवेदनशील द्रष्टा और मानवता का सच्चा प्रतिनिधि होता है।
यह भूमिका पाठकों को इन कविताओं के भावलोक में प्रवेश करने का आमंत्रण देती है, जहाँ शब्द केवल पढ़े नहीं जाते, बल्कि महसूस किए जाते हैं।
कवि
कवि नहीं कविता करता है स्वतः ही होती कविताई।
विरह, मिलन व देश प्रेम की गाथा मात्र कवि ने गाई।
क ख ग से शब्द बनाना कवि के रोम-रोम में बसता।
कवि मात्र के शब्दों से ही रोता भी देखा है हंसता।
कवि हृदय कोमल होता है पर पीड़ा ना देख सके है।
देख किसी पीडित मानव को नीर नयन ना रोक सके है।
इसीलिए तो पीड़ा उसने हर पीड़ित मानव की गाई।
विरह, मिलन व देश प्रेम की गाथा मात्र कवि ने गाई।।१।।
नूतन साजों की झंकारें बिन गीतों के रहें अधूरी।
साजों द्वारा सृजित धुन को कवि गीत से करता पूरी।
धुन मोहक है कंठ सुरीला बिना गीत के कौन मोल है?
कंठ और धुन को मनुहारी केवल करता कवि बोल है।
नाम मगर गायक का होता अथवा जिसने धुनें बनाईं।
विरह, मिलन व देश प्रेम की गाथा मात्र कवि ने गाई।।२।।
स्वयं कवि भगवान कृष्ण हैं जिनके मुख से गीता निकली।
श्लोकों में कविता भर दी जिससे भक्ति धारा निकली।
वेद, पुराण व धर्म ग्रन्थों में ऋषि कवियों ने धर्म सिखाया।
करके अपनी रचना पावन जीने का एक ढंग बताया।
कवियों ने रच भजन मनोहर भक्ति जन-जन तक पहुंचाई।
विरह, मिलन व देश प्रेम की गाथा मात्र कवि ने गाई।।३।।
राष्ट्र प्रेम की त्याग भावना कवि बोलों ने ही भर डाली।
राष्ट्र गीत और राष्ट्र गान की गाथा अजर अमर कर डाली।
गीतों में भर भक्ति शक्ति कवि झुका दे ईश्वर को भी।
गीतों में भर करुणाई वो मोम बना दे पत्थर को भी।
कोई क्षेत्र नहीं ऐसा जग में जहाँ पहुंच न कवि की पाई।
विरह, मिलन व देश प्रेम की गाथा मात्र कवि ने गाई।।४।।
कविता
कविता कवि हृदय की बेटी कवि हृदय में पलती है।
कभी दौड़ती कभी मचलती कभी मटक कर चलती है।
कविता में गुण भरे अनेकों सभी गुणों का भण्डारा।
इसमें करुणा इससे भक्ति निश्छल भाव भरा सारा।
ये चाहे तो सूखे नयनों से भी वर्षा करवा दे।
चाहे तो मुस्कान उदासी चेहरे पर ला दिखला दे।
सभी रसों में पारंगत ये सभी रसों में ढलती है।
कभी दौड़ती कभी मचलती कभी मटक कर चलती है।।१।।
ये ही श्रीकृष्ण की गीता वेदव्यास का महाभारत।
पुराण और ग्रन्थों की गरिमा, देती है मन को राहत।
दोहा संत कबिरा का और सूर पदों की भक्ति है।
मीरा का इसमें गिरिधर और भरी निराला शक्ति है।
तुलसी रामचरित मानस और सभी स्वरों की धरती है।
कभी दौड़ती कभी मचलती कभी मटक कर चलती है।।२।।
ये ही बच्चन की मधुशाला दुनिया नीरज गीतों की।
कालीदास की यही शकुन्तला श्रृंगार भावना मीतों की।
रोला छन्द चौपाई सोरठा और कुण्डलिया गिरिधर की।
कविता ही है सुलभ रास्ता करने भक्ति ईश्वर की।
कविता है पहचान कवि की कविता कभी न मरती है।
कभी दौड़ती कभी मचलती कभी मटक कर चलती है।।३।।
कविता आल्हा कविता ऊदल कविता राग रागिनी है।
कविता है सागर से गहरी नभ का रूप धारणी है।
कविता का जो मान करे ना कोई नहीं ऐसा जग में।
हँसी-खुशी के साथ-साथ ये आंसू ला सकती दृग में।
कविता है अनमोल खजाना हुई कभी ना सस्ती है।
कभी दौड़ती कभी मचलती कभी मटक कर चलती है।।४।।
रचयिता
कवि कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' अपने सुपुत्र के साथ





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