बुद्ध होना आसान है, स्त्री होना नहीं
बुद्ध होना आसान है, स्त्री होना नहीं
एक अंतर्संबंध की पड़ताल
भूमिका
मानव सभ्यता के इतिहास में त्याग और सत्य की खोज को हमेशा एक उच्चतम आदर्श के रूप में स्थापित किया गया है। जब कोई पुरुष, जैसे गौतम बुद्ध, रात के अंधेरे में अपने घर-परिवार को छोड़कर ज्ञान की तलाश में निकलता है, तो समाज उसे महान कहता है, उसके इस निर्णय को विरक्ति और उत्कर्ष का नाम देता है। वहीं, यही कार्य यदि एक स्त्री करे, तो वही समाज उसे कठघरे में खड़ा कर देता है। यही विरोधाभास इस काव्यांश का मूल भाव है—जहाँ बुद्ध होना एक उपलब्धि है, पर स्त्री होना एक निरंतर परीक्षा।
यह रचना केवल एक तुलना नहीं करती, बल्कि एक गहरे सामाजिक और भावनात्मक अंतर्संबंध को उजागर करती है—कर्तव्य बनाम स्वतंत्रता, त्याग बनाम अपेक्षा, और व्यक्ति बनाम समाज। पुरुष के लिए त्याग व्यक्तिगत मुक्ति का मार्ग बन जाता है, जबकि स्त्री के लिए त्याग स्वयं को मिटाकर दूसरों में जीने की प्रक्रिया बन जाता है।
यहाँ स्त्री की स्थिति केवल सामाजिक बंधनों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने भीतर भी बंधी हुई है—ममता, जिम्मेदारियों और भावनाओं के अदृश्य धागों से। यही कारण है कि जहाँ गौतम बुद्ध का प्रस्थान इतिहास बन जाता है, वहीं एक स्त्री का संभावित प्रस्थान अपराध बन जाता है।
इसी अंतर्विरोध को स्पष्ट करने के लिए रचना राधा और कृष्ण के संबंध को सामने लाती है—जहाँ कृष्ण आगे बढ़ जाते हैं, पर राधा वहीं ठहर जाती हैं, प्रेम में, समर्पण में। इसी प्रकार मीरा बाई का जीवन भी दर्शाता है कि स्त्री खोज तो करती है, पर वह किसी को छोड़कर नहीं, बल्कि किसी में समाकर करती है।
इस प्रकार, यह काव्यांश एक गहन प्रश्न खड़ा करता है—
क्या मुक्ति का मार्ग सभी के लिए समान है?
या फिर समाज ने स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग मापदंड गढ़ दिए हैं?
बुद्ध होना आसान है, स्त्री होना नहीं—यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि उस असमानता का सजीव बिंब है, जहाँ पुरुष का त्याग पूजनीय है और स्त्री का त्याग अपेक्षित।
यह भूमिका इसी अंतर्संबंध को समझने और संवेदनशीलता के साथ देखने का एक प्रयास है—जहाँ स्त्री की मौन साधना भी उतनी ही गहरी है, जितनी किसी बुद्ध की निर्वाणी यात्रा।
कविता
स्त्री
एक रात, चुपके से,
घर-द्वार, स्त्री-बच्चे को
छोड़ कर,
सत्य की खोज में
निकल जाना..
आसान है।
क्योंकि
कोई उंगली
उठती नही आप पर
न ही ज्यादा सवाल
पूछे जाते हैं..
कोई लांछन नहीं लगाता।
शब्दों के बाणों से
तन मन छलनी नहीं किया जाता।
लेकिन,
कभी सोचा है..
उनकी जगह एक स्त्री होती, और
वो अगर चुपके से निकल जाती
एक रात,
घर-द्वार, पति, नवजात शिशु
को छोड़ कर
सत्य की खोज मे…
क्या कोई विश्वास करता
उसकी इस बात पर
तोहमतें लगायी जातीं..
उसके स्त्रीत्व को
लाँछित किया जाता
पूरे का पूरा समाज
खड़ा हो जाता
उसके विरुद्ध …
और
ये होती; उसकी सत्य की खोज।
बुद्ध होना आसान है
पर स्त्री होना कठिन है
बहुत।
बुद्ध छोड़ सकते हैं
सब कुछ
स्त्री कुछ भी नहीं छोड़ सकती…
जो अपना ग़म नहीं
छोड़ सकती।
फिर खुशी उस
अकेले की तो होती नहीं..
फिर कैसे छोड़े उसे।
वह कभी ना छोड़ पाती
अपने सोए पुत्र और
पति को
भाग नही सकती उनसे
बस खुद की प्राप्ति को !!
केवल शरीर ही नही
मन से भी भिन्न है स्त्री..
जाने कैसे सब
समेटे हुए खुद में,
रह लेती है सब के साथ,
पर बुद्ध नही हो पाती।
मैंने नही देखा किसी स्त्री को
सब कुछ छोड़ कर
खुद को पाते हुए…..
कभी बुद्ध बन जाते हुए…..
कृष्ण ने छोड़ा राधा को।
राधा छोड़ ही नहीं पायी
कभी कृष्ण को।
राधा कृष्ण की ही रही
पर बुद्ध न बन पाई।
मीरा ने भी कहाँ
छोड़ा कृष्ण को।
ता उम्र उनके संग ही
बिता दिया पर
छोड़ा नहीं उन्हें।
खुद को ढूंढने की
खातिर कहाँ कृष्ण
से भाग पाई,
कभी बुद्ध न हो पाई……
#बुद्ध_होना_आसान_है
# स्त्री_होना_नहीं
रचयिता
प्रमिला त्रिवेदी जी
स्थानीय सम्पादिका
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
हैदराबाद (तेलंगाना)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति





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