"मैं और मेरा सफ़र"
भूमिका
"संघर्ष की मिट्टी से आकार लेती है जो शख्सियत, वह इतिहास में जगह नहीं माँगती… वह लोगों के दिलों में बस जाती है।"
यह आत्म-चित्रण किसी एक व्यक्ति की जीवनी नहीं, बल्कि स्वप्न, संघर्ष और सतत सेवा की वह गाथा है, जिसे दूरदर्शन के लोकप्रिय कार्यक्रम कृषि दर्शन के सृजक रघुनाथ सिंह ने जिया, रचा और जन-जन तक पहुँचाया।
एक गाँव से शुरू हुई यह यात्रा, एक साधारण साइकिल की मद्धिम गति से आगे बढ़ते हुए, रेडियो की आवाज़ और दूरदर्शन की दृष्टि बन गई। वे न केवल एक सजग संप्रेषक बने, बल्कि सच्चे लोक संवादक के रूप में उभरे — जिन्होंने सूचना को सिर्फ प्रसारित नहीं किया, बल्कि उसे जन-जीवन के संस्कार में बदला।
उनकी विशेषता यह नहीं थी कि वे रेडियो में थे या दूरदर्शन में, बल्कि यह थी कि वह जहाँ भी थे, वहाँ गाँव था, किसान था, संस्कृति थी, संगीत था, और जीवन था।
रघुनाथ सिंह जी का संघर्ष महज़ सरकारी सेवा का नहीं था, वह सामाजिक पुनर्रचना की एक सतत प्रक्रिया का हिस्सा था।
गाँव की गलियों से लेकर राष्ट्रीय स्तर के मंच तक, उन्होंने हर स्थान को एक जीवंत संवाद-स्थल बना दिया।
उनकी सोच में विचार था, विचार में संवेदना, और संवेदना में संघर्ष से हासिल की गई स्पष्टता। वे जानते थे कि किसान की बात खेत से उठकर नीति-निर्माण तक कैसे पहुँचे और यह भी जानते थे कि गीतों, नृत्यों और लोकधुनों में सूचना को कैसे संवेदनाओं के साथ जोड़ा जाए। पर उनका व्यक्तित्व केवल जनसंचार तक सीमित नहीं रहा —उन्होंने हर उस कलाकार, लोकगायक, कैमरामैन, लेखक और किसान के साथ एक आत्मीय संबंध जोड़ा जो अपने कार्य में ईमानदार था। वे सूचना और संवेदना, परंपरा और प्रयोग, अनुभव और नवाचार के सेतु बन गए।
प्रस्तुत आत्म-चित्रण उसी सेतु की एक झलक है —जहाँ शब्दों से चित्र बनते हैं, जहाँ मिट्टी से ईंट और ईंट से चेतना की इमारत खड़ी होती है।
यह सिर्फ रघुनाथ सिंह की यात्रा नहीं है, बल्कि यह उस विचार की यात्रा है जो कहता है —
"हर हाथ में ज्ञान पहुँचे, हर मन में चेतना जगे।"
आत्म-चित्रण
"मैं और मेरा सफ़र"
– रघुनाथ सिंह
मेरा जन्म दिल्ली के गाँव खानपुर में हुआ — एक ऐसा गाँव जहाँ की गलियाँ मेरी स्मृतियों का पहला अध्याय हैं। यहीं से मेरी प्रारंभिक शिक्षा की नींव पड़ी और यहीं से मेरे स्वप्नों ने आकार लेना शुरू किया। गाँव का मैं पहला लड़का था जिसने कॉलेज की दहलीज़ पर कदम रखा — यह एक साधारण उपलब्धि नहीं थी, खासकर तब जब साधन मात्र एक पुरानी साइकिल थी और लक्ष्य ऊँचा।
सांकेतिक चित्रण (गूगल से अर्जित)
कॉलेज जीवन में मेरे लिए केवल पुस्तकें ही नहीं, बल्कि डिबेट और एथलेटिक्स जैसे मंच भी आत्म-अभिव्यक्ति के साधन बने। मैं दोनों क्षेत्रों में सर्वोत्तम रहा — शब्दों से मन जीतने और पैरों से मैदान।
यह आत्मिक और बौद्धिक यात्रा मुझे जामिया मिलिया इस्लामिया तक ले गई, जहाँ भारत सरकार द्वारा स्थापित ग्रामीण शिक्षा संस्थानों में से एक में मुझे ग्रामोत्थान की औपचारिक शिक्षा मिली। यहाँ जो सीखा, वह मैंने गाँव में उतारा — यूथ क्लब से लेकर गलियों की सफाई और तालाब की मिट्टी से ईंटों का निर्माण। इन कार्यों की प्रगति मैदान (1960) में हुई प्रदर्शनी में भी सराहना मिली।
सेवा का पहला पड़ाव और जनसंचार से संवाद
मेरी नौकरी की शुरुआत दिल्ली के कम्यूनिटी डेवलपमेंट ब्लॉक में हुई। और यहीं से जनसंचार के क्षेत्र में मेरी भूमिका का आरंभ हुआ — पहले रेडियो में (1966) और फिर दूरदर्शन में (1973)। ग्राम सेवकों के समर्पण, किसानों से संवाद, सरकार की योजनाओं को सरल भाषा में प्रस्तुत करना — ये सब मेरे कार्य का हिस्सा बने।
सांकेतिक कार्योपयोगी उपागम (गूगल से अर्जित)रेडियो ने जब खेतों का रास्ता पकड़ा तो बदलाव स्पष्ट दिखने लगा। खेतों में वैज्ञानिकों और किसानों के बीच संवाद, समस्याओं का समाधान वहीं मौके पर — और यह सब रेडियो की आवाज़ के सहारे। हरित क्रांति के युग में रेडियो की भूमिका इतनी प्रभावी रही कि धान की एक किस्म को ही 'रेडियो किस्म' कहा जाने लगा।
नये कृषि गीत और लोकधुनें कार्यक्रमों के साथ जुड़ गईं। श्रोता इतने प्रभावित हुए कि रेडियो की प्रतीक्षा करने लगे। श्रोताओं की चिट्ठियाँ आने लगीं, उनमें उनकी भावनाएँ थीं — विश्वास, उम्मीद, और जुड़ाव।
जीवन के कुछ खट्टे-मीठे पल
बनारस में खटिया टूटी, मगर हौसले नहीं — कैमरा लुढ़का पर कोई घायल नहीं हुआ।
पलवल में कैमरा था, बैटरी नहीं — शूटिंग छूट गई पर शांति बनी रही। अनुभव ने सिखाया कि संकट में भी समाधान छिपा होता है।
हिमाचल में क्रोधित किसान — संवाद और धैर्य ने स्थिति को बदला और अंत में वही किसान टीम की सेवा में तत्पर हो गया।
'वृन्दावन की गूंज गली' — बिना प्रशिक्षण और अनुभव के बनी डाक्यूमेंट्री मारीशस में सराही गई। यह विश्वास और टीम वर्क का कमाल था।
सांकेतिक कार्योपयोगी उपागम (गूगल से अर्जित)एक बार फिल्म ब्लैंक रह गई, दर्शकों ने हंगामा किया लेकिन पूर्व चेतावनी के कारण आलोचना से बचाव हुआ। यह सिखाता है कि तैयारी ही बचाव का सबसे सशक्त अस्त्र है।
सुझाव: भविष्य के लिए दृष्टिकोण
चार दशकों से अधिक का अनुभव मुझे यह कहने की अनुमति देता है कि जब तक सेवा क्षेत्र (Service Sector) मजबूत नहीं होगा, तब तक कृषि सशक्त नहीं हो सकती। बीज और तकनीक होने पर भी यदि समय पर खाद, ऋण, बिजली, पानी न मिले तो फसल अधूरी रह जाती है।
"Everything can wait, but not agriculture."
यह मेरी भावना है कि यदि D.M., C.M. और P.M. अपने-अपने स्तर पर कृषि से जुड़ी नीतियों की समय पर समीक्षा करें, तो अन्न और उपज की कोई कमी नहीं रह जाएगी। 'कृषि दर्शन' जैसे कार्यक्रमों में इनकी सक्रिय भागीदारी नीतियों को ज़मीनी धरातल पर लाने का सशक्त माध्यम बन सकती है।
सीखा, समझा और जिया
रेडियो और दूरदर्शन के भीतर और बाहर रहकर मैंने सीखा कि कड़ी मेहनत, सच्ची लगन, सकारात्मक सोच और टीम वर्क ही सच्ची पूँजी है। कास्टिंग से लेकर पटकथा तक, संवाद से लेकर समाधान तक — हर पहलू ने मुझे निखारा। और सबसे बड़ी उपलब्धि रही — विश्वास, आत्मीयता और सैंकड़ों मित्र।
– रघुनाथ सिंह
📞 9811109619



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