साहित्य, शिक्षा और समाज सेवा की त्रिवेणी के रूप में है डॉ. ज्योति श्रीवास्तव की पहचान।

 परिचय

साहित्य, शिक्षा और समाज सेवा की त्रिवेणी—यही है डॉ. ज्योति श्रीवास्तव की पहचान। डॉ. सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से संस्कृत विषय में डॉक्टरेट और आचार्य में स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाली डॉ. ज्योति ने अपने जीवन को केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखा। 2007 में बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए देहरादून आने के बाद उन्होंने स्कॉलर्स’ होम स्कूल में शिक्षण कार्य आरंभ किया, लेकिन उनका मन समाज की बेहतरी में अधिक रमा। अपनी आय का 75% सामाजिक कार्यों में दान करना, वंचित बच्चों को शिक्षा देना, बेटियों को आत्मरक्षा प्रशिक्षण देना, कोविड-19 के दौरान नव-विहान ट्रस्ट के माध्यम से भोजन और राशन वितरण करना, तथा मात्र आठ महीनों में झुग्गी बस्ती को 100% साक्षर बनाना—ये सब उनकी प्रतिबद्धता के प्रमाण हैं।

कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय संगठनों में शीर्ष पदों पर रहते हुए भी उन्होंने सांस्कृतिक संरक्षण हेतु चित्रगुप्त सभा की सह-स्थापना की। अपनी व्यक्तिगत खुशियों में वह दिन सबसे विशेष रहा जब उन्होंने स्वयं और बाद में अपनी बेटी को स्वर्ण पदक प्राप्त करते देखा।

इस संवाद में, हम डॉ. ज्योति श्रीवास्तव के जीवन, मूल्यों और प्रेरणाओं को और निकट से जानेंगे।

डॉ. ज्योति श्रीवास्तव से विशेष बातचीत

प्रश्न १. डॉ. ज्योति जी, आपने डॉ. सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से संस्कृत विषय में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की और आचार्य (स्नातकोत्तर) में स्वर्ण पदक भी जीता। संस्कृत को अपने जीवन का केंद्र बनाने की प्रेरणा कहाँ से मिली?

उत्तर: "संस्कृत हमारी सांस्कृतिक और बौद्धिक धरोहर की आत्मा है। मेरे पिताजी ने बचपन से ही अपने मूल से जुड़े रहने का संस्कार दिया। यह विषय मेरे लिए केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि एक दायित्व था। आचार्य में स्वर्ण पदक जीतना मेरे माता-पिता के लिए वह उपहार था, जिसकी चमक आज भी उनके और मेरे हृदय में है।"

प्रश्न २. 2007 में आप बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए देहरादून आईं। इस परिवर्तन ने आपके जीवन की दिशा कैसे बदली?

उत्तर: "देहरादून आना मेरे जीवन का निर्णायक मोड़ था। यहाँ स्कॉलर्स’ होम स्कूल में शिक्षण कार्य शुरू किया और तीन वर्षों तक बच्चों को पढ़ाया। यही से मैंने शिक्षा और समाज सेवा को जोड़ने का रास्ता पाया।"

प्रश्न ३. आपने अपनी आय का 75% सामाजिक कार्यों के लिए दान किया, जो बहुत असाधारण बात है। इसके पीछे आपकी सोच क्या रही?

उत्तर: "मेरे लिए कमाई का असली मूल्य तब है जब वह किसी ज़रूरतमंद के काम आए। इसलिए मैंने अपनी आय का बड़ा हिस्सा वंचित बच्चों की शिक्षा और बेटियों को आत्मरक्षा प्रशिक्षण देने में लगाया। मेरा मानना है कि सशक्तिकरण ही सबसे स्थायी उपहार है।"

प्रश्न ४. आप कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय संगठनों में नेतृत्व की भूमिका निभा रही हैं। इतने दायित्वों के बीच संतुलन कैसे बना पाती हैं?

उत्तर: "नेतृत्व का सार है—टीम वर्क और स्पष्ट दृष्टि। चाहे वह राष्ट्रीय महिला अध्यक्ष का पद हो या राज्य अध्यक्ष का, मैंने हमेशा संगठित योजना और सामूहिक प्रयास को प्राथमिकता दी है। परिवार का समर्थन इस संतुलन की सबसे बड़ी ताकत है।"

प्रश्न ५. आपने कोविड-19 के दौरान "नव-विहान ट्रस्ट" की स्थापना की। यह यात्रा कैसी रही?

उत्तर: "2020 में महामारी के समय मैंने देखा कि मजदूर और गरीब परिवार भोजन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। "कोई भूखा न रहे" इस मंत्र के साथ नव-विहान ट्रस्ट ने देहरादून प्रशासन के सहयोग से भोजन और राशन पहुँचाने का कार्य शुरू किया। यह मानवता की परीक्षा थी, जिसे हमने मिलकर पास किया।"

प्रश्न ६. आपने मात्र आठ महीनों में एक झुग्गी बस्ती में 100% साक्षरता का लक्ष्य हासिल किया। यह कैसे संभव हुआ?

उत्तर: "उस समय के जिलाधिकारी देहरादून आदरणीय आशीष श्रीवास्तव जी इस अभियान के प्रेरणास्रोत बने।

कुंजी थी—निरंतरता और व्यक्तिगत जुड़ाव। हमने सर्व शिक्षा अभियान के ढाँचे का उपयोग किया, लेकिन सीखने की विधियाँ बच्चों और बड़ों की जरूरत के अनुसार बदलीं। सम्मान और प्रोत्साहन के साथ शिक्षा सहज बन जाती है।"

प्रश्न ७. आपने देहरादून में "चित्रगुप्त सभा" की सह-स्थापना भी की है। इसका उद्देश्य क्या है?

उत्तर: "चित्रगुप्त भगवान की महिमा से आज भी लोग अनभिज्ञ हैं। ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न श्री चित्रगुप्त भगवान को सभी देवताओं का आह्वान था जब धरती का संतुलन बिगड़ रहा था। ब्रह्मा जी के आदेश से श्री चित्रगुप्त भगवान ने प्राणियों के कर्मों का लेखा-जोखा रखना आरंभ किया जिसके आधार पर स्वर्ग और नरक के द्वार खुलते हैं। श्री चित्रगुप्त भगवान कलम के देव हैं आज छात्रों को इनकी आराधना की आवश्यकता है। इस क्रम में ही देहरादून में श्री चित्रगुप्त भगवान की तीन मूर्तियाँ भी स्थापित कराई जिसके साथ देवभूमि उत्तराखंड में भगवान का प्रथम पदार्पण हुआ।"

प्रश्न ८. आपकी सबसे प्रिय स्मृतियों में अपने और अपनी बेटी के स्वर्ण पदक शामिल हैं। शिक्षा को आप परिवार के मूल्यों से कैसे जोड़ती हैं?

उत्तर: "शिक्षा आत्मविश्वास, अनुशासन और संवेदनशीलता की नींव है। जब मैंने अपने पिता की आँखों में मेरा स्वर्ण पदक जीतने पर गर्व देखा और बाद में अपनी बेटी के बी.टेक में स्वर्ण पदक जीतने पर वही गर्व महसूस किया, तो समझ आया कि मूल्य बिना कहे भी पीढ़ियों में उतरते हैं।"

प्रश्न ९. बेटियों को आत्मरक्षा प्रशिक्षण देने की पहल आपने क्यों शुरू की?

उत्तर: "मेरा मन कहता है 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना' में ही 'बेटी आत्मरक्षा' का विषय भी सरकार रखे तो सरकारी विद्यालयों में अनिवार्य रूप से स्वत: ही हमारी बेटियाँ सुरक्षित हो जाएँगी।"

प्रश्न १०. अंत में, आप उन युवतियों को क्या संदेश देना चाहेंगी जो व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में बदलाव लाना चाहती हैं?

उत्तर: "अपनी क्षमता को कभी कम मत आँकिए। साहस और संतुलन के साथ आगे बढ़िए। सफलता का असली सुख तब है जब वह दूसरों के जीवन में भी रोशनी फैलाए। शिक्षा, सेवा या नेतृत्व—आपकी यात्रा सार्थक होनी चाहिए।"

प्रश्न ११. ज्योति जी, हमको यकीन है कि आप शिक्षा के क्षेत्र में निर्लोभ भाव से हैं। कृपा कर अवगत कराएं यदि आपका मान कभी पारितोषिक से किया गया हो तो?

उत्तर : "पारितोषिक के रूप में सरकार, प्रशासन और समाज की अनेक संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मान सूचक अवार्ड प्राप्त किए। जिनमें 'सबला रत्न', 'हिमालयी नारी शक्ति सम्मान', 'वंडर वुमेन' सम्मान, 'कायस्थ रत्न' 'सम्मान सिटी एक्सीलेंस' अवार्ड, 'डॉ राधाकृष्णन सर्वपल्ली श्रेष्ठ शिक्षक' सम्मान, 'इंडिया इंस्पिरेशन' सम्मान और अंत में 'उत्तराखंड रत्न' सम्मान मेरे लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा। हाल ही में IIMT मैनेजमेंट कॉलेज नोएडा में वक्ता के रूप में गौरवपूर्ण अवसर मिला।"

आइडिया 💡 

रूपाली वशिष्ठ

स्थानीय सम्पादिका,

उलझन सुलझन (लेडीज विंग), उत्तराखंड

सूचना स्रोत

डॉ. ज्योति श्रीवास्तव

पाठ्य विस्तार

 
प्रस्तुति





टिप्पणियाँ

  1. बहुत बढ़िया साक्षात्कार, ज्योति जी के प्रेरणादायक व्यक्तित्व को प्रणाम।

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  2. बहुत ही सुंदर साक्षात्कार दिया आपने , आपके प्रभावशाली व्यक्तित्व को प्रणाम। ईश्वर आपको ऐसे ही सफलता देते रहे और आप अपने कार्य मे आगे बढ़ते रहे।।।

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  3. सशक्तिकरण ही सबसे स्थायी उपहार है। ये सबसे स्ट्रांग प्वाइंट रहा मेरे लिए इस पूरे साक्षात्कार में। बहुत अच्छी विजनरी सोच देखने मिलती है

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