साहित्यिक मंचों की शोभा हैं लता जी

 ✨ परिचय

बहुआयामी प्रतिभा की धनी सुश्री लता शर्मा 'निहान' साहित्य, कला, रंगमंच और सामाजिक सरोकारों की दुनिया में सक्रिय एक सशक्त व्यक्तित्व हैं। कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक और मंच संचालन से लेकर नृत्य, गायन व चित्रकारी तक उनकी रुचियां विविधता का आभास कराती हैं। साहित्यिक मंचों पर सम्मानित और सामाजिक कार्यों में संलग्न, वे न केवल एक लेखिका और रंगकर्मी हैं, बल्कि संवेदनशील उद्घोषिका और कथावाचक भी हैं। प्रस्तुत है उनसे एक संवाद—




🌸 साक्षात्कार

प्रश्न १. लता जी, आपके व्यक्तित्व में साहित्य, कला और सामाजिक सरोकार एक साथ दिखाई देते हैं। आपको इस दिशा में आने की प्रेरणा कहाँ से मिली?

उत्तर: "बचपन से ही किताबों और मंचीय कार्यक्रमों का वातावरण मिला। संवेदनशील मन हमेशा कुछ रचने और समाज से जुड़ने की ओर खिंचता रहा। यही प्रेरणा मुझे आज तक ऊर्जा देती है।"

प्रश्न २. आप कविता, कहानी, लघुकथा और नाटक लिखती हैं। इनमें से किस माध्यम को अपनी सबसे प्रिय अभिव्यक्ति मानती हैं?

उत्तर: "कविता मेरे हृदय की सबसे निकट है, क्योंकि भाव तुरंत कविता का रूप ले लेते हैं। लेकिन कहानियां और नाटक मुझे समाज के गहरे पक्षों को चित्रित करने का अवसर देते हैं।"

प्रश्न ३. आपकी रचनाएँ प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई हैं। क्या आपको लगता है कि इससे समाज में संवेदनशीलता फैलती है?

उत्तर: "निस्संदेह। जब पाठक मेरी कविता या लघुकथा पढ़कर अपने जीवन से जुड़ाव महसूस करते हैं, तो यह लेखन का सबसे बड़ा पुरस्कार होता है।"

प्रश्न ४. आपने ऑनलाइन प्रतियोगिताओं और संस्थाओं से कई सम्मान पाए हैं। आपके लिए पुरस्कार का क्या महत्व है?

उत्तर: "पुरस्कार मुझे आत्मविश्वास और प्रोत्साहन देते हैं। लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है—पाठकों और श्रोताओं का प्रेम।"

प्रश्न ५. रंगमंच और मंच संचालन के क्षेत्र में आपका अनुभव कैसा रहा है?

उत्तर: "मंच संचालन मुझे शब्द और स्वर से जोड़ता है, जबकि रंगमंच अभिनय के माध्यम से संवेदना को जीने का अवसर देता है। दोनों ने मेरी अभिव्यक्ति को और धारदार बनाया।"

प्रश्न ६. आप कथावाचिका और उद्घोषिका के रूप में भी सक्रिय हैं। क्या आपको लगता है कि बोलने की कला साहित्यकार के लिए आवश्यक है?

उत्तर: "हाँ, बिल्कुल। लेखन भावनाओं को लिखित रूप देता है, जबकि कथावाचन उन्हें जीवंत करता है। दोनों एक-दूसरे को पूर्ण करते हैं।"

प्रश्न ७. साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ाव ने आपकी रचनात्मक यात्रा में क्या बदलाव लाए?

उत्तर: "संस्थाएँ आपस में संवाद और साझा मंच देती हैं। "कला अंकुर" और "लेखिका मंच" जैसे संगठनों से जुड़कर मुझे विविध दृष्टिकोण मिले।"

प्रश्न ८. सामाजिक कार्यों—जैसे अनाथालय या वृद्धाश्रम में समय देना—को आप अपनी लेखन-यात्रा से कैसे जोड़ती हैं?

उत्तर: "समाज के इन हिस्सों से मिलने वाला अनुभव मेरी संवेदनशीलता को गहरा करता है। मेरी रचनाओं में मानवीय करुणा और सहानुभूति इन्हीं अनुभवों से जन्म लेती है।"

प्रश्न ९. कला और मंच सज्जा, गायन, नृत्य, चित्रकारी जैसी आपकी रुचियाँ आपकी लेखन शैली को कैसे प्रभावित करती हैं?

उत्तर: "ये सभी कलाएँ मुझे सौंदर्यबोध और अभिव्यक्ति का विस्तार देती हैं। मंच सज्जा ने दृश्यात्मकता सिखाई, गायन ने लय दी, नृत्य ने भावभंगिमा और चित्रकारी ने रंगों की संवेदना। सब मिलकर लेखन को गहराई देते हैं।"

प्रश्न १०. आगे आपकी साहित्यिक और कलात्मक यात्रा की क्या योजनाएँ हैं?

उत्तर: "मैं व्यक्तिगत संग्रह प्रकाशित करना चाहती हूँ, और समाज के लिए प्रेरक नाट्य मंचन करना चाहती हूँ। साथ ही, नई पीढ़ी को साहित्य और कला से जोड़ने का प्रयास जारी रहेगा।"

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