साक्षात्कार बहुमुखी रचनाकार दीपा गोयल जी का
भूमिका
हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में समान अधिकार से लेखन करने वाली दीपा गोयल एक बहुमुखी रचनाकार हैं, जिनकी कलम से कविता, लघुकथा और आलेख सहज रूप से प्रवाहित होते हैं। विज्ञान और अर्थशास्त्र की छात्रा होते हुए भी उन्होंने साहित्य को अपनी आत्मा का विस्तार माना और लेखन व चित्रकारी को जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लिया। 'दीप रत्न' जैसे एकल संग्रह और अनेक प्रतिष्ठित साझा संकलनों में उनकी उपस्थिति, आकाशवाणी से प्रसारण तथा 'प्रेम सागर' की सह-संपादिका की भूमिका उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को विशेष आयाम देती है। संवेदनाओं और अभिव्यक्ति की यह यात्रा उनके शब्दों को पाठकों के मन से जोड़ती है और उन्हें समकालीन रचनाकारों की अग्रिम पंक्ति में स्थान दिलाती है।
साक्षात्कार : दीपा गोयल जी
प्रश्न १. दीपा जी, सबसे पहले हम यह जानना चाहेंगे कि आपको लेखन की ओर प्रेरणा कहाँ से मिली?
उत्तर: "लेखन मेरे लिए अभिव्यक्ति का सबसे सुंदर माध्यम है। बचपन से ही मुझे पढ़ने का शौक था और धीरे-धीरे शब्दों ने अपने आप ही मेरे मन से कागज़ पर जगह बनानी शुरू कर दी। मेरे माता-पिता का संस्कार और परिवार का सहयोग इसमें मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा रहा है।"
प्रश्न २. आपकी शिक्षा विज्ञान और अर्थशास्त्र में है। फिर भी साहित्य की ओर आपका झुकाव कैसे हुआ?
उत्तर: "शिक्षा ने मेरे सोचने और समझने की क्षमता को गहराई दी, लेकिन भावनाओं को शब्दों में ढालने का अवसर साहित्य ने दिया। विज्ञान ने मुझे तार्किक बनाया और अर्थशास्त्र ने सामाजिक संवेदनाओं को देखने की दृष्टि दी, इन दोनों का मेल ही मेरे लेखन की आधारशिला बना।"
प्रश्न ३. आपको हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में लेखन का अनुभव है। दोनों में लिखने का अनुभव किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर: "हिंदी मेरे हृदय की भाषा है, जबकि अंग्रेज़ी मेरे विचारों को वैश्विक आयाम देती है। हिंदी में लिखते समय भावनाएँ सहज प्रवाह में उतरती हैं, वहीं अंग्रेज़ी में अभिव्यक्ति का स्वर अधिक गूढ़ और वैचारिक हो जाता है। दोनों भाषाओं का संगम मेरे लिए बहुत समृद्ध अनुभव है।"
प्रश्न ४. आपका एकल हिंदी संग्रह 'दीप रत्न' प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह की विशेषता क्या है?
उत्तर: " 'दीप रत्न' मेरी आत्मा के बहुत करीब है। इसमें जीवन के विविध पहलुओं को उजागर करने का प्रयास किया है। भावनाओं, रिश्तों और समाज के अनुभवों को सजीव रूप में पाठकों तक पहुँचाना ही इसकी विशेषता है।"
प्रश्न ५. आपने अनेक साझा संग्रहों में भी योगदान दिया है। इस अनुभव को आप कैसे देखती हैं?
उत्तर: "साझा संग्रहों में काम करना अपने आप में एक सीख है। इसमें अलग-अलग लेखकों की दृष्टि और शैली देखने को मिलती है। इससे न केवल साहित्यिक विविधता मिलती है बल्कि सामूहिकता की भावना भी प्रबल होती है।"
प्रश्न ६. आप 'प्रेम सागर' की सह संपादिका भी रही हैं। संपादन के अनुभव ने आपके लेखन को किस तरह प्रभावित किया?
उत्तर: "संपादन ने मुझे दृष्टि दी कि एक रचना को पाठक किस दृष्टिकोण से देखेगा। शब्दों की कसावट, विषय की स्पष्टता और भावों की संतुलित अभिव्यक्ति—इन सबका महत्व मैंने संपादन कार्य के दौरान गहराई से समझा।"
प्रश्न ७. आपकी रचनाएँ आकाशवाणी से भी प्रसारित हुई हैं। श्रोताओं से मिले इस अनुभव को आप कैसा मानती हैं?
उत्तर: "आकाशवाणी पर रचनाओं का प्रसारण मेरे लिए अत्यंत सम्मानजनक और प्रेरणादायी अनुभव रहा। जब शब्द हवा की तरंगों पर सवार होकर अनगिनत श्रोताओं तक पहुँचते हैं, तो लगता है कि रचना सच में जीवंत हो उठी है।"
प्रश्न ८. लेखन के अलावा आपको चित्रकारी में भी रुचि है। क्या आपको लगता है कि चित्र और शब्द एक-दूसरे के पूरक हैं?
उत्तर: "बिल्कुल। जहाँ शब्द भावनाओं को रेखांकित करते हैं, वहीं चित्र उन्हें रंगों और आकारों में जीवित कर देते हैं। मेरे लिए लेखन और चित्रकारी, दोनों आत्म-अभिव्यक्ति की दो अलग लेकिन पूरक धाराएँ हैं।"
प्रश्न ९. आज के समय में साहित्यकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती आप क्या मानती हैं?
उत्तर: "सबसे बड़ी चुनौती है पाठकों की रुचि बनाए रखना। डिजिटल युग में जहाँ त्वरित और सतही मनोरंजन उपलब्ध है, वहाँ गहन और सार्थक साहित्य तक लोगों को आकर्षित करना कठिन कार्य है। लेकिन यदि लेखन ईमानदारी और संवेदना से किया जाए तो उसका असर अवश्य होता है।"
प्रश्न १०. अंत में, युवा रचनाकारों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
उत्तर: "मैं यही कहना चाहूँगी कि लेखन केवल प्रसिद्धि पाने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मा की साधना है। यदि आप सच्चे मन से लिखेंगे, तो शब्द आपके अपने मार्ग बना देंगे। पढ़ें, समझें, और अपने अनुभवों को निर्भीकता से लिखें—यही सफलता की कुंजी है।"
सूचना स्रोत




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