समर्पण व सृजनशीलता का पर्याय हैं सुमन जी
✍️ भूमिका
वरिष्ठ हिंदी अध्यापिका, साहित्यकार और पत्रकार—सुश्री सुमन शर्मा का नाम शिक्षा और साहित्य की दुनिया में समर्पण व सृजनशीलता का पर्याय है। दर्शनशास्त्र और हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अध्यापन, लेखन और पत्रकारिता—तीनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया है।
पिछले 26 वर्षों से शिक्षा-जगत में सक्रिय रहते हुए वे न केवल विद्यार्थियों को हिंदी का ज्ञान दे रही हैं, बल्कि उन्हें जीवन-दृष्टि भी प्रदान कर रही हैं। माहेश्वरी पब्लिक स्कूल, अजमेर में वे पिछले 24 वर्षों से वरिष्ठ हिंदी अध्यापिका के रूप में सेवाएँ दे रही हैं और वर्तमान में विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं।
साहित्य के क्षेत्र में उनके तीन काव्य-संग्रह—‘एहसास’, ‘महकते ख्वाब’ और ‘प्रेम-पयोधि’ प्रकाशित हो चुके हैं। प्रेम-पयोधि राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित हुआ है। साथ ही, वे अनेक साझा संकलनों का हिस्सा रही हैं, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन किया है तथा मंच-संचालन और काव्य-पाठ से श्रोताओं का दिल जीता है।
पत्रकारिता में 15 वर्षों का सक्रिय अनुभव रखने वाली सुमन जी को राष्ट्रीय अमृत कुंभ सम्मान तथा विशिष्ट योगदान पुरस्कार जैसे गौरवपूर्ण सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है। उनकी लेखनी भावनाओं का आईना है और उनकी शिक्षण शैली विद्यार्थियों में आत्मविश्वास और रचनात्मकता भरती है।
ऐसी बहुआयामी प्रतिभा की धनी सुमन जी से बातचीत स्वयं में एक प्रेरणा है। प्रस्तुत है उनके जीवन, साहित्य और शिक्षा से जुड़े अनुभवों पर आधारित यह साक्षात्कार—
प्रेरक साक्षात्कार : सुश्री सुमन शर्मा
(वरिष्ठ हिंदी अध्यापिका, साहित्यकार व पत्रकार)
प्रश्न 1. सुमन जी, दर्शनशास्त्र और हिंदी साहित्य दोनों ही आपके अध्ययन के क्षेत्र रहे हैं। इन दोनों का संगम आपके जीवन और अध्यापन में कैसे प्रकट होता है?
उत्तर: दर्शन ने मुझे गहराई से सोचना सिखाया और साहित्य ने उन विचारों को संवेदनाओं से जोड़ने की कला दी। जब मैं कक्षा में खड़ी होती हूँ तो केवल भाषा नहीं पढ़ाती, बल्कि जीवन का दृष्टिकोण भी बाँटती हूँ। यही संतुलन मेरी सबसे बड़ी पूँजी है।
प्रश्न 2. 26 वर्षों की शैक्षिक यात्रा में सबसे मूल्यवान अनुभव क्या रहा?
उत्तर: यह विश्वास कि हर विद्यार्थी अपने भीतर एक अनोखी क्षमता छुपाए बैठा है। शिक्षक का कार्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि उस क्षमता को पहचानकर उसे आत्मविश्वास देना है। यही अनुभव मुझे प्रतिदिन नई ऊर्जा देता है।
प्रश्न 3. हिंदी विभागाध्यक्ष के रूप में आपकी प्राथमिकताएँ क्या रहती हैं?
उत्तर: मेरी कोशिश यही रहती है कि हिंदी विद्यार्थियों को केवल परीक्षा की भाषा न लगे। मैं चाहती हूँ कि वे हिंदी को जीवन की भाषा, भावनाओं की भाषा और आत्म-अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम समझें।
प्रश्न 4. आपके तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। कविता आपके लिए क्या महत्व रखती है?
उत्तर: कविता मेरे लिए आत्मा की पुकार है। जब मन बोझिल होता है, तो शब्द चुपचाप कविताओं में ढल जाते हैं। मेरे लिए कविता संवेदनाओं का दर्पण और समाज से संवाद का सबसे सुंदर सेतु है।
प्रश्न 5. प्रेम-पयोधि (राजस्थान साहित्य अकादमी के सहयोग से) आपके जीवन की उपलब्धि रही। यह संग्रह आपके लिए किस प्रकार विशेष है?
उत्तर: प्रेम-पयोधि मेरे हृदय का वह गुलदस्ता है जिसमें प्रेम के विविध रंग समाहित हैं। यह संग्रह मेरे लेखन को एक गंभीर पहचान देता है और यह मेरे लिए साहित्यिक जीवन की संजीवनी है।
प्रश्न 6. आपने मंच-संचालन और काव्य-पाठ दोनों क्षेत्रों में योगदान दिया है। आपको किससे अधिक आत्मसंतोष मिलता है?
उत्तर: काव्य-पाठ आत्मा की आवाज़ है और मंच-संचालन समाज से जुड़ने का माध्यम। दोनों ही मेरे जीवन के दो पंख हैं—एक मुझे भीतर की ओर ले जाता है, दूसरा बाहर की दुनिया से जोड़ता है।
प्रश्न 7. हिंदी अध्यापन के क्षेत्र में आपके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला। यह उपलब्धि आपके लिए कितनी प्रेरणादायक रही?
उत्तर: यह सम्मान मेरे लिए किसी व्यक्तिगत उपलब्धि से अधिक, विद्यार्थियों और शिक्षा-जगत का आशीर्वाद है। यह मुझे याद दिलाता है कि यदि ईमानदारी और लगन से कार्य किया जाए तो उसका फल अवश्य मिलता है।
प्रश्न 8. आपने 15 वर्षों तक पत्रकारिता भी की। साहित्य, अध्यापन और पत्रकारिता—तीनों को आप किस दृष्टि से देखती हैं?
उत्तर: पत्रकारिता ने मुझे यथार्थ से जोड़ा, साहित्य ने संवेदनाओं को शब्द दिए और अध्यापन ने धैर्य व दिशा। इन तीनों ने मिलकर मुझे पूर्ण बनाया। मैं कह सकती हूँ कि यही त्रिवेणी मेरी पहचान है।
प्रश्न 9. आज की युवा पीढ़ी और हिंदी भाषा को आप किस नज़र से देखती हैं?
उत्तर: आज के युवा नए प्रयोग कर रहे हैं। वे संक्षिप्त और सारगर्भित अभिव्यक्ति पसंद करते हैं। यह बदलाव सकारात्मक है, क्योंकि यही हिंदी को आधुनिक बनाएगा। जरूरत बस इतनी है कि हम हिंदी को डिजिटल और वैश्विक मंचों से जोड़ सकें।
प्रश्न 10. आगे की साहित्यिक और शैक्षिक यात्रा के लिए आपकी क्या योजनाएँ हैं?
उत्तर: मेरी आकांक्षा है कि हिंदी को और भी सहज, आधुनिक और आकर्षक रूप में विद्यार्थियों के सामने प्रस्तुत करूँ। साथ ही, नए काव्य-संग्रह और रचनाएँ समाज को समर्पित करूँ, ताकि मेरी लेखनी संवेदनाओं को जीवित रखने का कार्य करती रहे।
🌷 सुश्री सुमन शर्मा का जीवन साहित्य, शिक्षा और पत्रकारिता की त्रिवेणी है। उनके शब्दों में संवेदना, उनके अध्यापन में दृष्टि और उनकी उपलब्धियों में प्रेरणा की झलक मिलती है। सचमुच, वे हिंदी जगत की गौरवशाली धरोहर हैं। 🌷
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