डॉ. सुधा मित्तल का सेवा और जीवन दर्शन पर विशेष साक्षात्कार
समझें
यह कि आखिर इस साक्षात्कार का अध्ययन करने की जरूरत आखिर क्या और क्यों है?
तो साथियो, किसी भी साक्षात्कार का अध्ययन इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह केवल जानकारी देने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यक्ति के अनुभव, विचार और दृष्टिकोण के पीछे की सोच को उजागर करता है। इससे हमें विषय की गहरी समझ, विश्लेषण करने की क्षमता और व्यवहारिक जीवन में उसके अनुप्रयोग के तरीके मिलते हैं। साक्षात्कार को ध्यानपूर्वक पढ़ना हमें न केवल प्रेरित करता है, बल्कि हमारी सोच को व्यापक बनाकर सही निर्णय लेने में भी सहायक होता है।
डॉ. सुधा मित्तल का सेवा और
जीवन दर्शन पर विशेष साक्षात्कार
प्रश्न १. आपका बचपन और शिक्षा का सफर कैसा रहा?
उत्तर: "मेरा जन्म 27 मई 1965 को सोजत रोड में हुआ। बचपन में ही शिक्षा के प्रति गहरी रुचि थी। एम.कॉम. और पीएच.डी. की डिग्री ने मुझे वाणिज्य क्षेत्र में गहराई से काम करने का अवसर दिया।"
प्रश्न २. शिक्षण क्षेत्र में आने की प्रेरणा कैसे मिली?
उत्तर: "मेरे माता-पिता श्री बालगोविंद अग्रवाल और श्रीमती रामज्योति ने हमेशा शिक्षा का महत्व समझाया। ज्ञान बाँटना और विद्यार्थियों को सशक्त बनाना ही मुझे इस दिशा में ले आया।"
प्रश्न ३. तैंतीस वर्षों की सेवा यात्रा में सबसे यादगार पल कौन सा रहा?
उत्तर: "प्रत्येक कॉलेज में बिताया समय मेरे लिए यादगार है, लेकिन NSS के प्रोग्राम ऑफिसर के रूप में युवाओं को समाजसेवा से जोड़ना और खेलों में स्मारिका प्रकाशित करना मेरे लिए विशेष रहा।"
प्रश्न ४. आपने विभिन्न कॉलेजों में काम किया। यह अनुभव कितना अलग रहा?
उत्तर: "सावित्री कन्या महाविद्यालय, मांडलगढ़, नसीराबाद और सांभरलेक—हर जगह का वातावरण अलग था। अलग-अलग चुनौतियाँ और अनुभवों ने मुझे एक बेहतर शिक्षिका और प्रशासक बनाया।"
प्रश्न ५. आपके शोध और पुस्तकों पर भी काम हुआ है, कुछ बताएँगी?
उत्तर: "मैंने 'Management and Accounting' नामक पुस्तक लिखी, UGC स्पॉन्सर्ड रिसर्च प्रोजेक्ट पर कार्य किया और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में शोधपत्र प्रस्तुत किए। ये मेरे अकादमिक सफर के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।"
प्रश्न ६. खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों में आपकी भूमिका क्या रही?
उत्तर: "दस वर्षों तक खेल प्रभारी रही और ‘पांच वर्ष की उपलब्धियां’ स्मारिका प्रकाशित की। साथ ही महिला प्रकोष्ठ, वाणिज्य परिषद और साहित्यिक मंचों के संयोजन से विद्यार्थियों में सर्वांगीण विकास को बढ़ावा दिया।"
प्रश्न ७. संपादकीय कार्य और पत्रिकाओं से आपका जुड़ाव कैसे रहा?
उत्तर: "मैंने सावित्री कॉलेज की ‘मृणालिनी’, नसीराबाद कॉलेज की ‘सुवर्णा’ पत्रिका का संपादन किया और ‘अनमोल रत्न’ सुविचार संग्रह भी तैयार किया। यह मेरे लिए रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम रहा।"
प्रश्न ८. विभिन्न साहित्यिक संस्थानों से सम्मानित होना आपके लिए कितना खास है?
उत्तर: "यह मेरे लिए आभार व्यक्त करने का क्षण होता है। यह सिर्फ मेरे प्रयासों की पहचान नहीं बल्कि शिक्षा और साहित्य के प्रति मेरी निष्ठा का सम्मान है।"
प्रश्न ९. आपकी रुचियों ने आपके जीवन को कैसे प्रभावित किया?
उत्तर: "लेखन, संगीत, आध्यात्मिकता और साहित्यिक पुस्तकों का अध्ययन ने मुझे संतुलित और संवेदनशील बनाया। यह मेरी शिक्षण शैली और व्यक्तित्व में भी परिलक्षित होता है।"
प्रश्न १०. ३१ मई २०२५ को सेवानिवृत्ति के बाद आपकी आगे की क्या योजनाएँ हैं?
उत्तर: "मैं सेवानिवृत्ति के बाद भी लेखन, शोध और सामाजिक योगदान जारी रखना चाहती हूँ। मेरा जीवन संदेश है – 'तय है जो दिया वो लौटकर आयेगा, तो क्यों ना सिर्फ दुआएं ही दी जायें...' – इसी विचार को आगे बढ़ाना चाहती हूँ।"
विदाई भाषण प्राचार्य
डॉ. सुधा मित्तल
आदरणीय उपस्थित जन,
आज का यह अवसर हमारे लिए भावनाओं का संगम है—जहाँ हम एक ओर तैंतीस वर्षों तक शिक्षा के क्षेत्र में निष्ठा, अनुशासन और समर्पण का अद्भुत उदाहरण रही डॉ. सुधा मित्तल जी की सेवाओं का सम्मान कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके सक्रिय शिक्षकीय जीवन से विदा लेते हुए मन थोड़ा भावुक भी हो रहा है।
डॉ. मित्तल जी का जन्म २७ मई १९६५ को सोजत रोड में हुआ। बचपन से ही शिक्षा के प्रति गहरी लगन उन्हें आगे बढ़ाती रही। एम.कॉम., पीएच.डी. की उच्च शिक्षा ने उनके व्यक्तित्व को निखारा और १९९२ में सावित्री कन्या महाविद्यालय, अजमेर से शिक्षण सेवा का आरंभ हुआ। इसके बाद मांडलगढ़, सांभरलेक और नसीराबाद में अपनी अद्वितीय सेवाएँ प्रदान कर उन्होंने सैकड़ों विद्यार्थियों के जीवन को दिशा दी।
33 वर्षों की इस शिक्षण यात्रा में उन्होंने केवल कक्षाओं तक सीमित न रहते हुए विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया।
NSS प्रोग्राम ऑफिसर के रूप में युवाओं को समाजसेवा का मार्ग दिखाया, खेल प्रभारी रहते हुए प्रतिभाओं को मंच दिया और स्मारिका प्रकाशित की, शोध, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, UGC प्रोजेक्ट और पुस्तक लेखन के माध्यम से वाणिज्य शिक्षा में नया आयाम जोड़ा, संपादकीय कार्यों से साहित्यिक अभिव्यक्ति को समृद्ध किया।
उनकी रुचि लेखन, संगीत, आध्यात्मिकता और साहित्यिक अध्ययन में रही, जिसने उन्हें एक संवेदनशील शिक्षिका और प्रेरणादायक व्यक्तित्व बनाया।
प्रिय सुधा जी, आपने अपने जीवन संदेश में कहा है –
"निस्संदेह, आपने अपने पूरे करियर में दुआओं और शुभकामनाओं का ही खजाना बाँटा है—
विद्यार्थियों को ज्ञान, सहयोगियों को प्रेरणा और संस्थान को नई ऊँचाइयाँ दीं।"
आज जब आप ३१ मई २०२५ को सेवानिवृत्ति की इस नई यात्रा पर अग्रसर हो रही हैं, तो हम सबकी ओर से यही शुभकामना है कि आपका आगे का जीवन भी उसी उजाले और संतोष से भरा रहे, जो आपने शिक्षा जगत में फैलाया है।
हम आपको विदाई नहीं, बल्कि सम्मानित अभिनंदन के साथ नई राह की शुभकामनाएँ देते हैं।
सुधा जी का विदाई भाषण
डॉ. सुधा मित्तल
आदरणीय प्राचार्य महोदय, सहकर्मी, मेरे विद्यार्थियों और प्रिय साथियो,
आज मैं जब यहाँ खड़ी हूँ, तो मन में अनेक स्मृतियाँ एक साथ जीवंत हो रही हैं। १९९२ में जब मैंने सावित्री कन्या महाविद्यालय, अजमेर में पहली बार शिक्षण सेवा शुरू की थी, तब सोचा भी नहीं था कि यह सफर 33 वर्षों तक इतना अर्थपूर्ण और प्रेरणादायक बनेगा।
इन वर्षों में मांडलगढ़, सांभरलेक और नसीराबाद जैसे विभिन्न कॉलेजों में सेवा देते हुए मुझे हजारों विद्यार्थियों के साथ काम करने, उन्हें मार्गदर्शन देने और उनसे बहुत कुछ सीखने का सौभाग्य मिला। मेरे लिए शिक्षण केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए योगदान का माध्यम रहा।
NSS प्रोग्राम ऑफिसर के रूप में पाँच वर्षों तक युवाओं को सामाजिक सेवा का संदेश देना, खेल प्रभारी रहते हुए प्रतिभाओं को निखारना, शोधपत्र, पुस्तक लेखन, संपादकीय कार्य और विभिन्न समितियों का संचालन—ये सब अनुभव मुझे हमेशा गर्व से भरते हैं।
मेरी रुचियाँ – लेखन, संगीत, आध्यात्मिकता और साहित्यिक किताबों का अध्ययन – मुझे इस पूरे सफर में संतुलित और प्रेरित करती रहीं।
आज मैं यह कहते हुए विदा ले रही हूँ कि—
"तय है जो दिया वो लौटकर आयेगा, तो क्यों ना सिर्फ दुआएं ही दी जायें…"
यही सोचकर मैंने हमेशा अपने विद्यार्थियों, सहकर्मियों और संस्थान को अपनी तरफ से केवल दुआएँ, ज्ञान और सकारात्मकता देने का प्रयास किया है।
सेवानिवृत्ति मेरे लिए अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। मैं आगे भी लेखन, शोध और सामाजिक सेवा में सक्रिय रहना चाहती हूँ।
मैं हृदय से आप सभी का आभार व्यक्त करती हूँ—
मेरे माता-पिता, जिन्होंने मुझे शिक्षा का मूल्य सिखाया, मेरे पति सुनील कुमार मित्तल और परिवार का, जिन्होंने हर कदम पर समर्थन दिया,
मेरे सभी सहकर्मी और विद्यार्थी, जिन्होंने मुझे हमेशा सम्मान और स्नेह दिया।
आज मैं जो कुछ भी हूँ, वह आपके विश्वास और सहयोग का परिणाम है। मैं यहाँ से केवल एक शिक्षिका के रूप में नहीं, बल्कि आपके आशीर्वादों और शुभकामनाओं के साथ एक जीवनभर की विद्यार्थी के रूप में जा रही हूँ।
धन्यवाद।
सूचना स्रोत और पाठ्य सटीकता सुनिश्चयन




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