गृहणी से लेकर सरपंच, लेखिका और समाजसेवी बनीं कंचन जी
भूमिका
गाँव की साधारण गृहणी से लेकर सरपंच, लेखिका और समाजसेवी तक की प्रेरणादायी यात्रा तय करने वाली कंचन राठौड़ आज महिलाओं के आत्मविश्वास और सशक्तिकरण की जीती-जागती मिसाल हैं। उन्होंने रूढ़िवादी परंपराओं को चुनौती देकर महिलाओं को घूंघट और संकोच की ओट से बाहर निकालने का साहसिक प्रयास किया। उनकी संस्था We Can न केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रही है, बल्कि मानसिक संबल और सामाजिक पहचान भी दिला रही है। कंचन जी ने शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वरोजगार, डिजिटल ज्ञान और सरकारी योजनाओं के माध्यम से हजारों महिलाओं और बालिकाओं की जिंदगी बदल डाली है। उनकी कविताओं और लेखन ने भी समाज में स्त्री के सम्मान और अस्तित्व के प्रति नई चेतना जगाई है। आइए, उनसे हुई प्रेरणादायी बातचीत पर नज़र डालते हैं—
प्रेरणादायी साक्षात्कार : कंचन राठौड़
प्रश्न १. कंचन जी, सबसे पहले हम यह जानना चाहेंगे कि एक साधारण गृहणी से सरपंच और फिर We Can संस्था की संस्थापिका बनने तक की यह यात्रा आपने कैसे तय की?
उत्तर : "यह यात्रा संघर्षों से भरी रही। मैंने कई महिलाओं को घुट-घुटकर जीते हुए देखा। शराबी पति, आर्थिक तंगी, सामाजिक बंधन—इन सबसे जूझती महिलाओं की पीड़ा ने मुझे भीतर तक झकझोरा। तभी मैंने निश्चय किया कि मैं स्वयं को ही नहीं, बल्कि औरों को भी मजबूत बनाऊंगी। इसी सोच ने मुझे नेतृत्व की राह दिखाई और We Can संस्था की नींव रखी।"
प्रश्न २. आपकी संस्था ने महिलाओं के लिए कौन-कौन से विशेष कार्य किए हैं जिन पर आपको गर्व है?
उत्तर : "सबसे बड़ा कार्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। हमने सिलाई, चूड़ी निर्माण, ब्यूटी पार्लर जैसी ट्रेनिंग दिलवाईं। साठ स्वयं सहायता समूह बनाकर छह सौ महिलाएं आज अपनी आजीविका चला रही हैं। लगभग एक हज़ार महिलाएं सरकारी योजनाओं का लाभ ले रही हैं। पांच सौ बालिकाओं के सुकन्या समृद्धि खाते खुलवाए गए। इसके अलावा, हमने स्वास्थ्य कार्यशालाएँ, डिजिटल शिक्षा और शैक्षणिक भ्रमण भी आयोजित किए हैं।"
प्रश्न ३. आप महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ मानसिक मजबूती पर भी जोर देती हैं। इसके पीछे क्या सोच है?
उत्तर : "मुझे लगता है कि आर्थिक मजबूती तभी सार्थक है जब महिला मानसिक रूप से भी सशक्त हो। कई महिलाएं परिस्थितियों से हार मान लेती हैं। मैंने 150 से अधिक महिलाओं की व्यक्तिगत काउंसलिंग की है और उन्हें खुद से प्यार करना सिखाया है। आत्मविश्वास ही सबसे बड़ा हथियार है।"
प्रश्न ४. आपने मनरेगा और प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना जैसी सरकारी योजनाओं में भी महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की। इसके परिणाम क्या रहे?
उत्तर : "पहले महिलाओं का नाम जॉब कार्ड में मुश्किल से होता था। हमने प्राथमिकता से उनका नाम शामिल करवाया और आज 60% से अधिक महिलाओं के नाम पर कार्ड बने हैं। विश्वकर्मा योजना के तहत 400 महिलाओं के आवेदन कराए और उन्हें टूल किट मिली। इससे उन्हें रोजगार मिला और आत्मसम्मान भी।"
प्रश्न ५. बालिकाओं के लिए आपने कौन से विशेष कदम उठाए हैं?
उत्तर : "मेरा मानना है कि बेटियाँ ही समाज का भविष्य हैं। हमने 500 से अधिक बालिकाओं के सुकन्या समृद्धि खाते खुलवाए। उन्हें खेलों के लिए सामग्री उपलब्ध कराई। बचपन किताबों के संग अभियान चलाकर बच्चों में पढ़ाई की रुचि जगाई। स्कूलों में अच्छे कार्य करने वाले बच्चों को पारितोषिक देकर प्रोत्साहित किया। साथ ही, बाल विवाह रोकने के लिए जागरूकता अभियान चलाया।"
प्रश्न ६. आप स्वयं लेखिका भी हैं। लेखन आपके सामाजिक कार्यों में किस तरह सहायक रहा?
उत्तर : "लेखन मेरी आत्मा की आवाज़ है। मेरी पहला काव्य संग्रह घूंघट में सपने राजस्थान साहित्य अकादमी से प्रकाशित हुआ है। कविताएँ और लघुकथाएँ लिखकर मैं महिलाओं को उनके नारीत्व पर गर्व करना सिखाती हूँ। साहित्य मुझे समाज में परिवर्तन का संवेदनशील माध्यम देता है।"
प्रश्न ७. इतने बड़े स्तर पर कार्य करते हुए आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
उत्तर : "सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक सोच थी। लोग कहते थे कि औरत का काम सिर्फ घर तक सीमित है। लेकिन मैंने वहीँ से शुरुआत की। आज वही लोग मेरी सराहना करते हैं। दूसरी चुनौती आर्थिक संसाधन की थी, लेकिन महिलाओं की मेहनत और सहयोग ने सब आसान कर दिया।"
प्रश्न ८. आपके लिए सबसे संतोषजनक क्षण कौन सा रहा?
उत्तर : "जब एक विधवा महिला, जो निराशा में जी रही थी, सिलाई सीखकर अपनी बेटियों की पढ़ाई कराने लगी, तो उसकी आँखों में चमक देखकर लगा कि मेरी मेहनत सफल हुई। ऐसे कई क्षण मेरे जीवन की सच्ची उपलब्धि हैं।"
प्रश्न ९. आपको कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले। इन सम्मानों को आप कैसे देखती हैं?
उत्तर : "सम्मान प्रेरणा देते हैं, लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान तब है जब कोई महिला कहती है – “दीदी, अब हम मजबूर नहीं, मजबूत हैं।” यही मेरी असली जीत है। बाकी पुरस्कार केवल समाज का विश्वास हैं।
प्रश्न १०. अंत में, आप उन महिलाओं और बालिकाओं को क्या संदेश देना चाहेंगी जो अभी भी घबराहट और संकोच में जी रही हैं?
उत्तर : मैं यही कहूँगी – “अपने नारीत्व पर गर्व करें, अपने भीतर की शक्ति को पहचानें और जीवन की कठिनाइयों को अपनी मजबूती बनाएं। जब स्त्री खुद खड़ी होगी, तो पूरा समाज खड़ा होगा।”
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