संस्कृति को सहेजने वाली प्रतिभा हैं शारदा जी

भूमिका

डॉ. शारदा देवड़ा राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने और उसे नए आयाम देने वाली एक बहुआयामी प्रतिभा हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन की प्रख्यात कलाकार, लोक संगीत विशेषकर मांड गायन की संरक्षक, संवेदनशील कवयित्री, सृजनशील चित्रकार और समर्पित शिक्षाविद् के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। दो दशकों से अधिक समय से वे संगीत, साहित्य और कला को अपने जीवन की साधना मानकर समाज तक पहुँचा रही हैं। उनके खाते में 200 से अधिक पुरस्कार, अनेक शोध पत्र, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुतियां और चित्र प्रदर्शनियों की समृद्ध श्रृंखला शामिल है। डॉ. शारदा देवड़ा का व्यक्तित्व यह सिद्ध करता है कि जब परंपरा और नवाचार का संगम होता है, तब एक कलाकार संस्कृति का जीवंत दूत बन जाता है।




बातचीत

प्रश्न १. डॉ. शारदा जी, सबसे पहले हम यह जानना चाहेंगे कि संगीत, कला और साहित्य की इस त्रिवेणी यात्रा की शुरुआत आपके जीवन में कब और कैसे हुई?

उत्तर: "यह मेरे लिए विरासत का आशीर्वाद है। मेरे पिताजी डी.सी. देवड़ा स्वयं गुरु रहे हैं और हम सभी भाई–बहनों को संगीत, साहित्य और कला घर के वातावरण से ही मिली। बचपन से ही संगीत और चित्रकारी मेरी आत्मा का हिस्सा रहे, और धीरे-धीरे मंचीय प्रस्तुतियों, शोध और लेखन ने इसे एक विस्तृत दिशा दी।"

प्रश्न २. आप 'मांड गायन' की लुप्त होती शैली को जीवित रखने के लिए दो दशकों से कार्यरत हैं। इसके पीछे आपका उद्देश्य क्या रहा?

उत्तर: "राजस्थान का पारंपरिक मांड गायन हमारी धरोहर है। मैंने देखा कि नई पीढ़ी इससे दूर होती जा रही है। मेरा प्रयास यही रहा कि मंचीय प्रस्तुतियों, दूरदर्शन-आकाशवाणी प्रसारणों और शोध के माध्यम से इसे संरक्षित और प्रचारित करूं ताकि यह आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रहे।"

प्रश्न ३. राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर से जुड़े आपके अनुभव कैसे रहे?

उत्तर: "वहाँ आयोजित भक्ति संध्या और लोक संगीत कार्यक्रमों में प्रस्तुति देना मेरे लिए गौरवपूर्ण रहा। यह मंच परंपरा और नवाचार का संगम है, और मुझे वहाँ अपनी लोक शैली से देशभर के श्रोताओं को जोड़ने का अवसर मिला।"

प्रश्न ४. आपको अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2018 पर 'नेशनल वूमनिया अवॉर्ड' मिला। यह सम्मान आपके लिए कितना महत्वपूर्ण रहा?

उत्तर: "बहुत ही महत्वपूर्ण। यह सिर्फ मेरे लिए नहीं, बल्कि मांड गायन जैसी शैली को दिया गया सम्मान था। इससे यह विश्वास और गहरा हुआ कि हमारी लोक धरोहर को राष्ट्रीय पहचान दिलाना ही सबसे बड़ा पुरस्कार है।"

प्रश्न ५. आकाशवाणी और दूरदर्शन कलाकार के रूप में आपने विविध मंचों पर प्रस्तुति दी। कोई ऐसा अनुभव जो आज भी स्मरणीय है?

उत्तर: "डीडी राजस्थान नेशनल चैनल पर राजस्थानी लोक संगीत की प्रस्तुति देना बेहद विशेष रहा। जब श्रोताओं ने संदेश भेजे कि हमारी संस्कृति उनकी आत्मा तक पहुंच गई है, तो लगा कि यह यात्रा सार्थक है।"

प्रश्न ६. ईटीवी उर्दू पर आपकी ग़ज़ल प्रस्तुति भी हुई। ग़ज़लों से आपका लगाव कैसे जुड़ा?

उत्तर: "संगीत और कविता दोनों आत्मा को जोड़ते हैं। ग़ज़लें रूहानी एहसास देती हैं। जब मंच मिला तो मैंने अपनी गायकी में ग़ज़लों की कोमलता को भी उतारा और वह दर्शकों को पसंद आया।"

प्रश्न ७. आपने YouTube चैनल "Shivam Sharde Records" के माध्यम से भी संगीत प्रस्तुत किया। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर आपके गीत जैसे 'छोटी सी उमर', 'ओ मां' और 'लहरिया' को खूब सराहना मिली। यह बदलाव आपको कैसा लगता है?

उत्तर: "आज के समय में डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म बहुत प्रभावी हो सकते हैं। इससे युवा वर्ग तक हमारी प्रस्तुतियां तुरंत पहुंचती हैं। मुझे खुशी है कि मेरे गीतों को हजारों लोगों ने पसंद किया और इससे लोक संगीत व नई रचनाओं को पहचान मिली।"

प्रश्न ८. आपने शोध लेखन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 'हिमाचल का आदिवासी लोक संगीत' पर आपके शोधपत्र को विशेष सराहना मिली। इस दिशा में आपकी सोच क्या है?

उत्तर: "मेरी सोच यही रही है कि कला का अध्ययन केवल प्रस्तुति तक सीमित न रहे। शोध के माध्यम से परंपराओं का दस्तावेजीकरण जरूरी है। हिमाचल का आदिवासी लोक संगीत अद्वितीय है और इसे अकादमिक स्तर पर सामने लाना मुझे सौभाग्य लगता है।"

प्रश्न ९. आपकी कविताएं और ग़ज़लें भी आकाशवाणी-दूरदर्शन और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत हुईं। काव्य की प्रेरणा आपको कहां से मिली?

उत्तर: "कविता मेरे लिए मन की अभिव्यक्ति है। जीवन के अनुभव, समाज की परिस्थितियां और अपनी संवेदनाएं—ये सब जब शब्दों में उतरती हैं, तो कविता बन जाती हैं। आकाशवाणी और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुति ने मुझे अपने शब्दों की शक्ति पर विश्वास दिलाया।

काव्य लेखन की प्रेरणा मुझे अपने पिता श्री डी सी देवड़ा 'सुरंगानंद' जी से मिली! मैं बचपन से ही कविताएं लिखती हूं!"

प्रश्न १०. २०२१ में विश्व के सबसे लंबे वर्चुअल कवि सम्मेलन में आपकी भागीदारी रही। उस अनुभव को आप कैसे देखती हैं?

उत्तर: "यह सचमुच ऐतिहासिक था। इंडिया वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज इस आयोजन में अपनी कविताओं का योगदान देना मेरे लिए अविस्मरणीय अनुभव रहा। यह बताता है कि साहित्य की कोई सीमा नहीं होती।"

प्रश्न ११. चित्रकला के क्षेत्र में आपकी प्रदर्शिनियों ने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। आपका झुकाव चित्रकला की ओर कब और कैसे हुआ?

उत्तर: "चित्रकला बचपन से ही मेरी रुचि का हिस्सा रही। जब भी मन संगीत से विराम चाहता था, तो रंग और रेखाएं मुझे सुकून देती थीं। धीरे-धीरे यह शौक प्रदर्शिनियों तक पहुंचा।

पिता जी आर्टिस्ट चित्रकार, संगीतकार और कवि है इस लिए ये तीनों ही विधाएं मुझे विरासत में मिली है!"

प्रश्न १२. आपकी चित्र प्रदर्शिनियां—ललित कला अकादमी जयपुर, शिमला, अजमेर, कांगड़ा, धर्मशाला और भमलादा आर्ट विलेज—बहुत चर्चित रहीं। आपके लिए कौन-सी प्रदर्शनी सबसे यादगार रही?

उत्तर: "धर्मशाला कांगड़ा आर्ट म्यूजियम की इंटरनेशनल आर्ट एग्जिबिशन मेरे लिए बहुत खास रही। वहाँ भारत के साथ कई देशों के कलाकारों ने भाग लिया और कला के माध्यम से संस्कृतियों का संगम देखने को मिला।"

प्रश्न १३. संगीत और चित्रकला—दोनों में संतुलन बनाना कितना कठिन होता है?

उत्तर: "यह कठिन नहीं बल्कि सुखद है। जब सुर थक जाते हैं तो रंग उन्हें जीवन देते हैं, और जब रंग थक जाते हैं तो संगीत उन्हें सांस देता है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।"

प्रश्न १४. आपको 'काव्यश्री सम्मान 2023' मिला, जिसे इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज किया गया। यह सम्मान आपके लिए क्या मायने रखता है?

उत्तर: "यह मेरे साहित्यिक सफर का अहम पड़ाव है। विशेषकर इस काव्य ग्रंथ में अशोक चक्र विजेताओं के जीवन पर दोहे रचने का अवसर मेरे लिए गर्व का विषय है।"

प्रश्न १५. आपने निर्णायक के रूप में भी विभिन्न स्तरों पर कार्य किया। इस भूमिका का अनुभव कैसा रहा?

उत्तर: "निर्णायक होना एक जिम्मेदारी है। इसमें प्रतिभाओं को परखना ही नहीं बल्कि उन्हें प्रोत्साहित करना भी जरूरी होता है। मैंने सदैव यही प्रयास किया कि प्रतियोगी हतोत्साहित न हों, बल्कि नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ें।"

प्रश्न १६. परिवार की बात करें तो आपके पिताजी और भाई-बहनों का योगदान आपके सफर में कितना रहा?

उत्तर: "पूरा परिवार मेरी प्रेरणा रहा है। पिताजी डी.सी. देवड़ा हमारे गुरु हैं और सभी भाई-बहन राष्ट्रीय कलाकार हैं। यही पारिवारिक संस्कार मेरे जीवन की असली पूंजी हैं।"

प्रश्न १७. आज की युवा पीढ़ी जो संगीत और कला से जुड़ना चाहती है, उन्हें आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

उत्तर: "मैं यही कहूँगी कि कला केवल पेशा नहीं, बल्कि साधना है। यदि समर्पण और धैर्य से इसे साधा जाए, तो यह जीवन को नई दिशा देती है। परंपराओं से जुड़े रहना और नवाचार को स्वीकार करना—दोनों का संतुलन ही कलाकार को पूर्ण बनाता है।"

👉 यह साक्षात्कार डॉ. शारदा देवड़ा जी के बहुआयामी व्यक्तित्व और उनके योगदान को सम्पूर्ण रूप में प्रस्तुत करता है।

उपलब्धियाँ 








सूचना स्रोत

 

पाठ्य उन्नयन और विस्तार 

 

प्रस्तुति




टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

शिक्षा का उजास (संशोधित) - श्री कुलदीप महुआ

🌼 ज्योति वही, जो मार्ग दिखाए 🌼

संघर्ष, संस्कृत और सफलता का संगम