तुझको सजाता रहा (कविता)

 तुझको सजाता रहा

भूमिका 

“तुझको सजाता रहा” एक ऐसी भाव-प्रधान रचना है जिसमें कवि ने प्रेम को बाह्य यथार्थ से अधिक अंतर्मन की सृजनात्मक प्रक्रिया से जोड़ा है। यह कविता किसी प्रत्यक्ष मिलन की कथा नहीं, बल्कि कल्पना, स्मृति और भाव-साधना के माध्यम से रची गई एक आत्मिक संवाद-यात्रा प्रतीत होती है। कवि अपनी प्रियतमा को व्यक्ति से अधिक एक काव्य-प्रेरणा के रूप में ग्रहण करता है और इसी कारण उसकी उपस्थिति शब्दों, छन्दों और बिम्बों में मूर्त होती चलती है।

रचना का प्रमुख स्वर श्रृंगार के वियोग पक्ष से सम्बद्ध है, परन्तु इसमें करुणा का मृदु स्पर्श भी अंतर्निहित है। कवि बार-बार “अपने शब्दों से तुझको सजाता रहा” जैसी आवृत्ति के माध्यम से यह संकेत देता है कि सृजन ही उसके लिए सांत्वना का साधन है। इस दृष्टि से कविता केवल प्रेमाभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सर्जक-मन की आंतरिक प्रक्रिया का सूक्ष्म चित्रण भी है।

भाषा सरल, प्रवाहमयी तथा भावानुकूल है। तत्सम और प्रचलित शब्दों का संतुलित प्रयोग रचना को गरिमा देता है, जबकि “पूनम की ज्यों चाँदनी”, “नयन के निलय” जैसे बिम्ब सौम्यता और कोमलता का वातावरण निर्मित करते हैं। उपमा और मानवीकरण के संयमित प्रयोग से काव्य में सौंदर्य आता है, किंतु अलंकारों का आग्रह कहीं भी कृत्रिम नहीं लगता।

रचना की संरचना क्रमिक है—प्रारंभ में कल्पना का विस्तार, मध्य में भाव-आराधना, और अंतिम बंद में यथार्थ का बोध। विशेषतः अंतिम पद में “तन्द्रा” का टूटना कविता को एक मार्मिक मोड़ देता है, जहाँ स्वप्न और सत्य का द्वंद्व स्पष्ट रूप से उभरता है। यह परिवर्तन कविता को भावुकता से निकालकर आत्मबोध की ओर ले जाता है, जो इसे एक संतुलित और विचारोत्तेजक समापन प्रदान करता है।

समग्रतः यह रचना एक सहज, संवेदनशील और कल्पनाशील काव्य-प्रयास है, जिसमें प्रेम को सृजन की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अतिशय अलंकरण से दूर रहते हुए कवि ने आत्मीय भावों को संयमित भाषा में अभिव्यक्त किया है, जिससे कविता में सरलता के साथ-साथ एक आंतरिक मार्मिकता भी बनी रहती है।

तुझको सजाता रहा

कल्पनाओं   में  तुमको  बसाते  हुए,
मैं गज़ल गीत  तुम  पर  बनाता रहा,
छन्द रस औ' अलंकार  तुझको बना,
अपने शब्दों से तुझको सजाता रहा।

बन गयी तू  ग़ज़ल  मेरी  मनमोहिनी,
रूप लावण्य  पूनम  की ज्यों चाँदनी,
अर्घ्य तुझको कलम की चढ़ाता रहा,
अपने शब्दों से तुझको सजाता रहा।

नैन  के  निलय  में  स्वप्न  बसते  तेरे,
ये नयन  रात-दिन  ख़्वाब रचते  तेरे,
तुझको ले चल गगन  में घुमाता रहा,
अपने शब्दों से तुझको सजाता रहा।

टूट   तन्द्रा   गयी   सत्य   था  सामने,
तू  नहीं  थी  वहाँ   हाथ  यह  थामने,
दिल  'नरेशा'   यूँ   ही  बहलाता  रहा,
अपने शब्दों से तुझको सजाता रहा।

सर्वथा मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना।

         ✍️ नरेश चन्द्र उनियाल,
    पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड।

      
रचना की समीक्षा

आदरणीय श्री नरेश चन्द्र उनियाल जी की यह रचना "तुझको सजाता रहा" विरह, कल्पना और सृजन के सुंदर ताने-बाने से बुनी गई है। कवि ने अपनी प्रियतमा को केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि अपनी 'कविता की आत्मा' बना दिया है।
इस कविता समीक्षा:-
भाव पक्ष 
कविता का मुख्य स्वर श्रृंगार (वियोग) और समर्पण है।
सृजन की प्रक्रिया: कवि ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कविता के ही उपकरणों (छंद, रस, अलंकार) का सहारा लिया है। यह एक अद्भुत बिम्ब है कि रचनाकार अपनी कला से ही अपने प्रेम को साकार करने की कोशिश कर रहा है।
कल्पना बनाम यथार्थ: अंतिम बंद में जब "तन्द्रा" (नींद/मूर्च्छा) टूटती है, तो कविता एक गहरा मोड़ लेती है। यह स्वप्निल सुख और वास्तविक सूनेपन के बीच के द्वंद्व को बहुत ही मार्मिक तरीके से दर्शाती है।
कला पक्ष
भाषा: भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और सुबोध है। तत्सम शब्दों (अर्घ्य, लावण्य, निलय, तन्द्रा) का प्रयोग कविता को एक गरिमा और गहराई प्रदान करता है।
अलंकार विधान: उपमा: "पूनम की ज्यों चाँदनी" के माध्यम से नायिका के रूप का सात्विक वर्णन किया गया है।
मानवीकरण: अपनी लेखनी को अर्घ्य चढ़ाना और शब्दों से किसी का श्रृंगार करना—ये प्रयोग कविता को जीवंत बनाते हैं।
लय और छंद: कविता में एक आंतरिक लय है। "अपने शब्दों से तुझको सजाता रहा" की पुनरावृत्ति (टेक) पाठक के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती है और विरह की निरंतरता को दर्शाती है।
बंद-वार विशेष टिप्पणी
प्रथम बंद: कविता की शुरुआत ही सृजन से होती है। 'कल्पनाओं में बसाना' और 'गीत बनाना' कवि के मानसिक एकांत को दर्शाता है।
द्वितीय बंद: यहाँ नायिका को 'गज़ल' का रूप दे दिया गया है। "अर्घ्य तुझको कलम की चढ़ाता रहा" पंक्ति में प्रेम की पराकाष्ठा है, जहाँ कवि अपनी कला को ईश्वरीय आराधना की तरह समर्पित कर रहा है।
तृतीय बंद: 'नयन के निलय' (आँखों का घर) जैसे शब्द चयन बहुत ही परिष्कृत हैं। गगन में घुमाने की बात कल्पना की असीमित उड़ान को दर्शाती है।
चतुर्थ बंद: यह कविता का 'क्लाइमेक्स' है। यहाँ 'नरेशा' (कवि का नाम) का प्रयोग पारंपरिक काव्य शैली की याद दिलाता है। हाथ थामने के लिए किसी का न होना एक सूनापन पैदा करता है जो पाठक को भावुक कर देता है।

नरेश चन्द्र उनियाल जी की यह रचना एक सफल भाव-प्रधान रचना है। यह दिखाती है कि एक कवि के लिए उसका प्रेम केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उसकी संपूर्ण अभिव्यक्ति का आधार होता है। 'सत्य' और 'तन्द्रा' का टकराव कविता को एक दार्शनिक अंत देता है।

प्रस्तुति

डॉ. दक्षा जोशी 'निर्झरा'

स्थानीय सम्पादिका 

उलझन सुलझन (लेडीज विंग)

अहमदाबाद (गुजरात)

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व सहयोग






टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

शिक्षा का उजास (संशोधित) - श्री कुलदीप महुआ

🌼 ज्योति वही, जो मार्ग दिखाए 🌼

संघर्ष, संस्कृत और सफलता का संगम