प्रमिला जी की रचनाएं
पिंट्रेस्ट से साभार
भूमिका
प्रमिला त्रिवेदी की यह कविता विरह, स्मृति और मौन प्रेम की अत्यंत मार्मिक अभिव्यक्ति है, जिसमें बिछुड़ चुके जीवनसाथी के प्रति लेखिका का आत्मिक संवाद गहराई से उभरकर सामने आता है। यहाँ अनुपस्थिति केवल शारीरिक दूरी नहीं, बल्कि एक ऐसी भावावस्था है जहाँ स्मृतियाँ ही अस्तित्व का सहारा बन जाती हैं—“तुम नहीं हो” की स्वीकृति के साथ “हर पल साथ हो” का अनुभूत सत्य एक अदृश्य संबंध को जीवित रखता है। लेखिका अपने भीतर के टूटन, अकेलेपन और अधूरेपन को शब्दों में ढालते हुए यह दर्शाती हैं कि प्रेम मृत्यु या दूरी से समाप्त नहीं होता, बल्कि स्मृतियों, नादानियों और मौन में और अधिक गहरा हो जाता है। इस कविता में पीड़ा और प्रेम का अद्भुत संतुलन है, जहाँ जीवित होते हुए भी भीतर से शून्य हो जाने की अनुभूति और अंततः खामोशी को ही प्रेम की अंतिम भाषा मान लेने का संवेदनशील भाव स्पष्ट रूप से झलकता है।
तेरी याद
सूनो! तुम खामोश ही रहोगे क्या?
मैं जानती हूँ कि अब तुम नहीं हो,
पर लफ़्ज़ों से तुमको जीवित रखेंगे,
अगर तुम नहीं हो तो, क्यों नहीं हो?
और! मैं भी तो पल-पल मर ही रही हूँ न,
हाँ! शायद इसीलिए मैं हूँ, पर नहीं हूँ,
और! तुम नहीं होकर भी हर पल साथ हो,
आज़ मुझे कुछ यूँ हो रहा है,
तुम्हारी नादानियों से इश्क हो रहा है,
ये इश्क़ भी क्या-क्या रंग दिखाता है?
पर! अब मैं खामोश ही रहूँगी।
🌹तस्वीर पर भाव🌹
भूमिका
प्रमिला त्रिवेदी की यह कविता एक गहन भक्तिभाव से ओत-प्रोत आत्मिक पुकार है, जिसमें लेखिका का हृदय पूर्णतः अपने आराध्य कृष्ण के प्रेम में निमग्न दिखाई देता है। कविता में विरह, प्रतीक्षा और मिलन की लालसा का अत्यंत कोमल संगम है—जहाँ वह मोरपंख, बंसीवट और कालिंदी तट की स्मृतियों के माध्यम से दिव्य सान्निध्य की कल्पना करती हुई सांसारिक मोह को विस्मृत कर केवल श्याम-स्मरण में लीन हो जाना चाहती है। मुरली की मनोहर तान को सुनकर तन-मन अर्पित करने की भावना, गुंजमाल अर्पित कर कान्हा को रिझाने की आकांक्षा तथा हर क्षण मनमोहन की छवि निहारने की उत्कट चाह, लेखिका की निष्कलुष भक्ति, समर्पण और परमानंद की उस अवस्था को अभिव्यक्त करती है जहाँ भक्त और भगवान के मध्य प्रेम ही एकमात्र सेतु बन जाता है।
🌹तस्वीर पर भाव🌹
तेरी राह निहारूँ कान्हा
मोर पंख ले हाथ, ❤️
कब आओगे कृष्ण-कन्हाई
दे दो मेरा साथ, 🌹
एक लालसा मन में समाई,
🌹बंसीवट , कालिंदी तट,🌹
मिलूं मैं अपने कृष्ण-कन्हाई,
मुरली की तान मनोहर सुन के,
❤️तन मन सकल बिसारूँ,❤️
पल पल निहारूँ, मनमोहन की छवि,
उस पर तन मन वारूँ,
अपने कान्हा को रिझाऊँ,🌹
डालूं मैं गुंज माल, छवि को निहारूँ।
परमानंद हो भूल इस जग को
❤️श्याम-श्याम ही पुकारूँ,
पुलकित तन-मन वारूँ।❤️
मेरी डायरी से
भूमिका
प्रमिला त्रिवेदी जी की मेरी डायरी से शीर्षक रचना राधा-कृष्ण तत्व की अद्वैत भावना को समर्पित एक भावपूर्ण आध्यात्मिक स्तुति है, जिसमें लेखिका ने भक्ति को दर्शन का रूप दे दिया है। जिनके नाम के वर्णन में स्वयं शुकदेव मौन हो जाते हैं, उस राधा महिमा को शब्दों में बाँधने का विनम्र प्रयास यहाँ गहन श्रद्धा के साथ प्रकट होता है। लेखिका के लिए कृष्ण और राधा दो भिन्न सत्ता नहीं, बल्कि एक ही दिव्य सत्य के पूरक आयाम हैं—जहाँ कृष्ण शरीर हैं तो राधा प्राण; कृष्ण शक्ति हैं तो राधा भक्ति; कृष्ण प्रेम हैं तो राधा उसकी अभिव्यक्ति। यह रचना केवल उपमाओं का क्रम नहीं, बल्कि उस आध्यात्मिक अनुभूति का विस्तार है जिसमें राधा को आधार, कृपा और सृजन की मूल चेतना के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। लेखिका का भाव स्पष्ट करता है कि कृष्णत्व की पूर्णता राधा के बिना संभव नहीं—भक्ति ही वह सेतु है जो लीला को जीवन में और प्रेम को साधना में रूपांतरित करती है। इस प्रकार यह कविता श्रद्धा, समर्पण और राधा नाम की परम करुणामयी महिमा का हृदय से निकला स्तवन बनकर सामने आती है।
मेरी डायरी से
जिस राधा नाम की महिमा के वर्णन में स्वयं शुक मौन हो गये। यह जीव भला उसका क्या वर्णन कर पायेगा ?
कृष्ण शरीर हैं,
राधा प्राण हैं।
कृष्ण बांसुरी तो राधा तान हैं।
कृष्ण गिरधारी हैं, राधा जगधारी हैं।
कृष्ण मनमोहन तो राधा अति प्यारी हैं।
कृष्ण शक्ति हैं, राधा भक्ति हैं।
कृष्ण प्रेम तो राधा अभिव्यक्ति हैं।
कृष्ण कर्म हैं, राधा यश हैं।
कृष्ण फल तो राधा रस हैं।
कृष्ण पालनहार हैं,
राधा सृजनहार हैं।
कृष्ण जगत रूप तो
राधा जग आधार हैं।
कृष्ण करुणा सिन्धु हैं,
राधा कृपा सिन्धु हैं।
कृष्ण लीलाधर तो राधा उसका बिंदु (केंद्र) हैं।
कृष्ण चन्द्र हैं,
राधा शीतलता हैं।
कृष्ण जल तो राधा निर्मलता हैं!
बिना राधा के ना तो बाधा मिटती है
और ना ही जीवन धारा कृष्णमय होती है।
श्री किशोरी जी ही कल्याण करने वाली हैं।
जय श्री कृष्ण
एक ख्याल
भूमिका
प्रमिला त्रिवेदी जी की कविता एक ख्याल आत्मसंवाद, तन्हाई और भीतर उमड़ते भावों की सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्ति है, जहाँ लेखिका जीवन की निरंतर व्यस्तताओं और दूसरों के लिए जीते-जीते स्वयं से दूर हो जाने की पीड़ा को गहराई से अनुभव करती हैं। खामोशी को केवल रिक्तता नहीं, बल्कि एक ऐसी संवेदनशील भाषा के रूप में देखा गया है जो मन के अनकहे सत्य को उजागर करती है। कविता में तन्हाई, स्मृति, निर्भरता और भावनात्मक अभाव का द्वंद्व स्पष्ट है—बाहरी रूप से मुस्कुराते रहने की अदाकारी और भीतर की सिहरती हुई धड़कनों के बीच का अंतर लेखिका के अंतर्मन की थकान और संवेदनशीलता को दर्शाता है। प्रिय के अभाव में हर क्षण की जुदाई का लंबा हो जाना, जीवन का ठहराव और सूनापन, इस बात को रेखांकित करता है कि लेखिका के लिए संबंध केवल साथ नहीं, बल्कि अस्तित्व का आधार है। अंततः यह कविता स्वयं के पास लौटने, तन्हाई को समझने और जीवन की भागदौड़ में खोए हुए आत्म-बोध को पुनः पाने की एक गहन भावात्मक पुकार बनकर उभरती है।
एक ख्याल
दूर तक खामोशियों के संग बहा जाए कभी,
बैठ कर तन्हाई में, खुद को सुना जाए कभी,
क्योंकि ख़ामोशियों की भी तो ज़ुबान होती है,
गैरों की जिम्मेदारियों के लिए, उम्र सारी काट ली,
कुछ दिन तो खुद के भी पास रहा जाए कभी,
जिदंगी तुम बिन, उल्फत सी लगती है
एक पल की जुदाई भी मुद्दत-सी लगती है,
पहले नहीं सोचते थे, अब सोचने लगे हैं हम ,
हर लम्हे में आपकी ज़रूरत सी लगती है,
खुश हूँ मैं या खुश रहने की अदाकारी करने लगी हूँ,
सोचकर ही दिल की धडकन बढ़कर सहम जाती है
सोचती हूँ कैसे तन्हाइयों से दूर रहा जाए।
तब सूनापन लिए ज़िंदगी ठहर जाती है।
रचनाकार
🙏🌸🙏🌸🙏🌸🙏🌸🙏
प्रमिला त्रिवेदी
स्थानीय सम्पादिका
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
हैदराबाद
कल्पना, प्रस्तुति और सहयोग









टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें