सेवा, संवेदना और संकल्प की मिसाल डॉ. मधु अग्रवाल से विशेष बातचीत
सेवा, संवेदना और संकल्प की मिसाल हैं डॉ. मधु
भूमिका
कुछ लोग अपने पेशे को केवल रोजगार मानते हैं, जबकि कुछ लोग उसे मानव सेवा का माध्यम बना लेते हैं। नागपुर की प्रसिद्ध होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ. मधु अग्रवाल ऐसे ही व्यक्तित्वों में से एक हैं, जिन्होंने चिकित्सा को केवल पेशा नहीं बल्कि सेवा, संवेदना और समर्पण का मिशन बना लिया। एक सफल गोल्ड मेडलिस्ट होम्योपैथ, महाराष्ट्र होम्योपैथिक फीमेल डॉक्टर एसोसिएशन, नागपुर की विगत दो वर्षों से वाइस प्रेसिडेंट, तथा पिछले पैंतीस वर्षों से चिकित्सा सेवा में सक्रिय डॉ. मधु अग्रवाल आज कॉलेज में हेड ऑफ द डिपार्टमेंट एवं प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।
सामाजिक सेवा के प्रति उनका समर्पण बचपन से ही दिखाई देता है। वर्षों से वे चैरिटेबल संस्थाओं के माध्यम से मरीजों की सेवा कर रही हैं। विशेष रूप से भाऊजी दफ्तरी चैरिटेबल संस्था में विगत तेन्तीस वर्षों से सप्ताह में तीन दिन निःस्वार्थ सेवाएं देना उनकी मानवीय संवेदनाओं का परिचायक है। इतना ही नहीं, होप फॉर होपलेस जैसे निःशुल्क शिविरों के माध्यम से वे विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के जीवन में आशा की किरण जगाने का कार्य भी कर रही हैं।
बातचीत
प्रस्तुत है डॉ. मधु अग्रवाल से एक विशेष बातचीत—
प्रश्न १. डॉ. मधु जी, सबसे पहले अपने बचपन और प्रेरणा के बारे में बताइए।
उत्तर : "बचपन से ही घर-परिवार और समाज में यह सुनती आई थी कि खेलोगे-कूदोगे होगे गंवार, पढ़ोगे-लिखोगे होगे होशियार। शायद यही बात मेरे मन में कहीं बैठ गई थी। तभी से लगता था कि खूब पढ़ाई करनी है, मेहनत करनी है और जीवन में कुछ ऐसा करना है जिससे अपनी पहचान बन सके और समाज के लिए कुछ सार्थक किया जा सके।"
प्रश्न २.होम्योपैथिक डॉक्टर बनने की प्रेरणा आपको कैसे मिली?
उत्तर : "सच कहूं तो डॉक्टर बनने की कोई विशेष योजना नहीं थी। मेरी सहेलियों ने एक साथ होम्योपैथी में एडमिशन लिया और मैं भी उनके साथ जुड़ गई। धीरे-धीरे पढ़ाई के दौरान इस क्षेत्र में रुचि बढ़ती चली गई और फिर हम सभी डॉक्टर बनकर निकले। कभी सोचा नहीं था कि यही मेरा जीवन मिशन बन जाएगा।"
प्रश्न ३. कॉलेज में पढ़ते-पढ़ते ही आप अध्यापन से कैसे जुड़ गईं?
उत्तर : "कॉलेज के दिनों में मेरे गुरुजनों ने मेरी क्षमता को पहचाना और मुझे अध्यापन के लिए प्रेरित किया। उनकी प्रेरणा से मैं टीचर बनी। आज मैं कॉलेज में हेड ऑफ द डिपार्टमेंट और प्रोफेसर हूँ। विद्यार्थियों को पढ़ाना, उन्हें चिकित्सा की बारीकियां समझाना मुझे बहुत संतोष देता है।"
प्रश्न ४. चिकित्सा सेवा के साथ सामाजिक कार्यों में आपकी इतनी गहरी भागीदारी कैसे बनी?
उत्तर : "लोगों की सेवा करना मुझे हमेशा से अच्छा लगता था। शुरुआत से ही मैं कई चैरिटेबल संस्थाओं से जुड़ी रही हूं। पिछले 33 वर्षों से “भाऊजी दफ्तरी चैरिटेबल संस्था” में सप्ताह में तीन दिन अपनी सेवाएं दे रही हूं। जब मरीजों को राहत मिलती है और उनके चेहरे पर मुस्कान आती है, तो वही मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी होती है।"
प्रश्न ५. होप फॉर होपलेस शिविर की शुरुआत कैसे हुई?
उत्तर : "करीब दस वर्षों पहले मेरी सहेली डॉ. रुचि जैन के साथ मिलकर हमने होप फॉर होपलेस कैंप की शुरुआत की। यह एक निःशुल्क शिविर है, जो हर चार महीने में आयोजित किया जाता है। इसका उद्देश्य उन बच्चों की सहायता करना है जो गतिमंद, मतिमंद, मंदबुद्धि, ऑटिज्म, ADHD जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं या जन्म से बोलने, देखने या चलने में असमर्थ हैं।"
प्रश्न ६. ऐसे विशेष बच्चों के उपचार में होम्योपैथी किस प्रकार मदद करती है?
उत्तर : "होम्योपैथी में हम बच्चे की संपूर्ण मानसिक और शारीरिक स्थिति को समझकर उपचार करते हैं। कई बार गर्भावस्था के दौरान भी मां की मानसिकता और परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए दवाइयों का चयन किया जाता है। यह कहना सही नहीं होगा कि हर बच्चा पूरी तरह ठीक हो जाता है, लेकिन उनकी निर्भरता काफी हद तक कम हो जाती है और जीवन की गुणवत्ता बेहतर होती है।"
प्रश्न ७. आपने कई ऐसे चमत्कारिक मामलों का जिक्र किया है जहाँ ऑपरेशन तक टल गया। कोई उदाहरण साझा करेंगी?
उत्तर : "ऐसे कई केस हमारे सामने आए हैं जहां मरीज को ऑपरेशन थिएटर तक ले जाया जा रहा था, लेकिन होम्योपैथिक दवा ने इतना असर दिखाया कि ऑपरेशन की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। कई ऐसी परिस्थितियों में, जहां सर्जरी जरूरी मानी जा रही थी, मरीज को बिना सर्जरी आराम मिला।"
प्रश्न ८. गैंग्रीन वाले मरीज का मामला काफी प्रेरणादायक लगता है। उसके बारे में बताइए।
उत्तर : "एक मरीज को गैंग्रीन हो गया था और डॉक्टरों ने पैर की तीन उंगलियां काटने की सलाह दी थी। हमने होम्योपैथिक उपचार शुरू किया और धीरे-धीरे स्थिति में सुधार हुआ। आखिरकार उनका पैर बच गया। ऐसे अनुभव हमें भी आश्चर्य और संतोष से भर देते हैं।"
प्रश्न ९. बेहोश मरीज के होश में आने वाली घटना को आप कैसे देखती हैं?
उत्तर : "एक मरीज अचानक बेहोश हो गया था और तीन दिन तक होश नहीं आया। परिवार वालों ने हमें फोन किया। हमने दवा का नाम बताया। चूंकि मरीज बेहोशी की हालत में था, इसलिए दवा शरीर के हिस्से पर लगाई गई। कुछ समय बाद मरीज को होश आ गया। चिकित्सा में ऐसे अनुभव हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि सही परिस्थिति में सही उपचार प्रभावी हो सकता है।"
प्रश्न १०. क्या फोन पर भी मरीजों का इलाज संभव है?
उत्तर : "जी हां, कई बार हम दूर बैठे मरीजों का उपचार फोन पर भी करते हैं। लेकिन इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात मरीज का ईमानदारी से जुड़ना और सही जानकारी देना है। होम्योपैथी में मरीज की मानसिक और शारीरिक स्थिति को समझना बहुत जरूरी होता है।"
प्रश्न ११. आपके अनुसार होम्योपैथी की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
उत्तर : "होम्योपैथी शरीर को भीतर से संतुलित करने का प्रयास करती है। यह केवल बीमारी नहीं बल्कि व्यक्ति की प्रकृति और मानसिक स्थिति को भी समझती है। कई बार यह ऐसे परिणाम देती है जो लोगों को चमत्कार जैसे लगते हैं।"
प्रश्न १२. जब कोई मरीज ठीक होता है तो आपको कैसा महसूस होता है?
उत्तर : "मरीज को ठीक होते देखना, उसे राहत मिलते देखना मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी है। वही मेरे काम की असली कमाई है।"
प्रश्न १३. आपने कहा कि मरीज का ठीक न होना डॉक्टर की असफलता है, होम्योपैथी की नहीं—इस पर कुछ कहना चाहेंगी?
उत्तर : "मेरा मानना है कि यदि कोई मरीज ठीक नहीं हो रहा है, तो हमें पहले अपनी चिकित्सा पद्धति, समझ और प्रयासों का मूल्यांकन करना चाहिए। किसी पद्धति को दोष देने से पहले डॉक्टर को आत्ममंथन करना चाहिए। हर चिकित्सा प्रणाली की अपनी सीमाएं और संभावनाएं होती हैं। ईमानदारी और सही प्रयास बहुत मायने रखते हैं।"
प्रश्न १४. नई पीढ़ी और युवा चिकित्सकों के लिए आपका संदेश क्या होगा?
उत्तर : "डॉक्टरी को केवल व्यवसाय न समझें। यह सेवा का माध्यम है। मरीज केवल दवा नहीं, संवेदना और विश्वास भी चाहता है। यदि समर्पण के साथ काम करेंगे तो सफलता अपने आप आपके कदम चूमेगी।"
लक्ष्यबद्ध प्रयासों की बानगियाँ
गैंग्रीन के मरीज को लाभ



























Nice
जवाब देंहटाएंप्रोत्साहित करने के लिए आभार
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