संवेदनाओं से सृजन तक डॉ. नमिता चौहान

संवेदनाओं से सृजन तक 

साहित्य, शिक्षा और संघर्ष की सशक्त हस्ताक्षर 

डॉ. नमिता चौहान से विशेष बातचीत

भूमिका

कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनका जीवन केवल उपलब्धियों की कहानी नहीं होता, बल्कि संघर्ष, संवेदनाओं, आत्मबल और निरंतर साधना का जीवंत दस्तावेज़ बन जाता है। डॉ. नमिता चौहान ऐसा ही एक प्रेरक नाम है, जिन्होंने निजी जीवन की चुनौतियों को अपनी ताकत बनाया और साहित्य तथा शिक्षा को जीवन का ध्येय।

राजस्थान के नीमराना (अलवर) में जन्मी, एक अध्ययनशील और साहित्यिक वातावरण में पली-बढ़ीं डॉ. नमिता चौहान को लेखन और चिंतन की प्रेरणा अपने पिता स्वर्गीय श्री तेज सिंह चौहान से मिली, जो स्वयं लेखक और प्रख्यात इतिहासकार थे। विवाहोपरांत उच्च शिक्षा अर्जित करते हुए उन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। आज वे जयपुर के श्री भवानी निकेतन महिला पीजी महाविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष होने के साथ-साथ राष्ट्रीय सेवा योजना, रेड रिबन क्लब तथा साहित्यिक संस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

साहित्य इनके लिए केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आत्मिक उपचार, सामाजिक चेतना और संवेदनशील समाज निर्माण का माध्यम है। अनेक पुस्तकों, कविताओं, कहानियों और साहित्यिक उपलब्धियों से समृद्ध डॉ. नमिता चौहान का जीवन अनेक महिलाओं, विद्यार्थियों और साहित्य प्रेमियों के लिए प्रेरणास्रोत है।

आइए, जानते हैं उनके जीवन, साहित्य, संघर्ष और सृजन के विविध आयामों को इस विशेष संवाद के माध्यम से—

बातचीत

प्रश्न १. आपका जन्म नीमराना, अलवर में हुआ। अपने बचपन और पारिवारिक परिवेश के बारे में कुछ बताइए।

उत्तर : "मेरा बचपन एक अध्ययनशील और संस्कारवान वातावरण में बीता। पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटी होने के कारण मुझे सभी का स्नेह मिला। घर में अनुशासन, अध्ययन और विचारशीलता का वातावरण था, जिसने मेरे व्यक्तित्व को गढ़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।"

प्रश्न २. आपके पिता स्व. श्री तेज सिंह चौहान लेखक और इतिहासकार भी थे। उनके व्यक्तित्व का आपके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर : मेरे पिता मेरे सबसे बड़े प्रेरणास्रोत रहे। उनका अध्ययनशील स्वभाव, अनुशासन, लेखन के प्रति समर्पण और इतिहास के प्रति गहरी रुचि ने मुझे बहुत प्रभावित किया। पढ़ने, सोचने और लिखने की प्रवृत्ति मुझे उनसे ही विरासत में मिली।"

प्रश्न ३. बचपन में साहित्य की ओर आपका झुकाव कैसे प्रारंभ हुआ?

उत्तर : "घर में आने वाली पंजाब केसरी पत्रिका में प्रकाशित कविताएँ, ग़ज़लें और लेख मुझे बहुत आकर्षित करते थे। मैं उन्हें अपनी डायरी में लिख लिया करती थी। शायद वहीं से साहित्य मेरे भीतर धीरे-धीरे आकार लेने लगा।"

प्रश्न ४. स्नातक के तुरंत बाद विवाह हो गया। विवाहोपरांत शिक्षा जारी रखना कितना चुनौतीपूर्ण रहा?

उत्तर : "निश्चित ही चुनौतियाँ थीं, लेकिन परिवार का सहयोग मेरे साथ रहा। मैंने हिंदी साहित्य में एम.ए., नेट, स्लेट और बाद में राजस्थान विश्वविद्यालय से पीएच.डी. पूरी की। यह सफर धैर्य, परिश्रम और परिवार के विश्वास से संभव हुआ।"

प्रश्न ५. आपके जीवन में मायके और ससुराल दोनों के सहयोग का उल्लेख मिलता है। इसे आप किस रूप में देखती हैं?

उत्तर : "मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानती हूँ कि मुझे दोनों परिवारों का स्नेह और सहयोग मिला। मेरे पिता और मेरे पति दोनों ने मुझे आगे बढ़ने, अपनी रुचियों को जीने और मनोनुकूल कार्य करने की पूरी स्वतंत्रता दी।"

प्रश्न ६. जीवन के कठिन दौर—विशेषकर संतान सुख मिलकर भी न मिलने की पीड़ा—को आपने कैसे साधा?

उत्तर : "वह समय बेहद भावनात्मक था। ऐसे समय में अध्ययन, अध्यापन और किताबें मेरी सबसे अच्छी साथी बनीं। मैंने अपने दुःख, संवेदनाओं और अनुभवों को शब्द देना शुरू किया। धीरे-धीरे लेखन मेरे लिए आत्मिक उपचार बन गया।"

प्रश्न ७. क्या यह कहना उचित होगा कि साहित्य ने आपको भीतर से संभाला?

उत्तर : "बिल्कुल। साहित्य ने मुझे टूटने नहीं दिया। उसने मुझे अभिव्यक्ति दी, आत्मविश्वास दिया और जीवन को नए अर्थों में देखने की दृष्टि दी।"

प्रश्न ८. वर्तमान में आप शिक्षा जगत में कई महत्वपूर्ण दायित्व निभा रही हैं। इनके बारे में बताइए।

उत्तर : "वर्तमान में मैं श्री भवानी निकेतन महिला पीजी महाविद्यालय, जयपुर में हिंदी विभागाध्यक्ष हूँ। साथ ही राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई की कार्यक्रम अधिकारी और रेड रिबन क्लब की प्रभारी के रूप में भी कार्यरत हूँ। हाल ही में अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जयपुर इकाई में बाल साहित्य प्रमुख का दायित्व भी मिला है।"

प्रश्न ९. शिक्षा और साहित्य—इन दोनों में संतुलन कैसे बना पाती हैं?

उत्तर : "मेरे लिए दोनों अलग नहीं हैं। शिक्षा विचार देती है और साहित्य संवेदना। दोनों मिलकर व्यक्ति और समाज को बेहतर बनाते हैं। यही सोच मुझे संतुलन बनाए रखने में मदद करती है।"

प्रश्न १०. कोरोना काल को आप अपनी साहित्यिक यात्रा का टर्निंग पॉइंट मानती हैं। कैसे?

उत्तर : "कोरोना काल ने मुझे आत्ममंथन का समय दिया। इसी दौरान लेखन को अधिक विस्तार मिला और साहित्यिक साधना नई दिशा में आगे बढ़ी।"

प्रश्न ११. आपकी साहित्यिक उपलब्धियों के बारे में पाठकों को क्या बताना चाहेंगी?

उत्तर : "अब तक मेरी तेरह पुस्तकें, दस आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। एक सौ पचास से अधिक कविताएँ, बारह कहानियाँ, संस्मरण, रेखाचित्र और समीक्षाएँ भी लिखी हैं। यह यात्रा अभी जारी है।"

प्रश्न १२. आपको ‘नारी गौरव पुरस्कार’, ‘साहित्यकार पुरस्कार’ और ‘गद्य प्रभाकर सम्मान’ जैसे सम्मान मिले। यह आपके लिए क्या मायने रखते हैं?

उत्तर : "ये सम्मान मेरे लिए प्रेरणा हैं। वे यह विश्वास मजबूत करते हैं कि मेरी लेखनी समाज तक पहुँच रही है और उसका प्रभाव पड़ रहा है।"

प्रश्न १३. आकाशवाणी जयपुर के काव्यधारा कार्यक्रम में काव्य-पाठ का अनुभव कैसा रहा?

उत्तर : "वह मेरे लिए अत्यंत सुखद और यादगार अनुभव था। अपनी रचनाओं को व्यापक श्रोताओं तक पहुँचाना हर रचनाकार के लिए विशेष क्षण होता है।"

प्रश्न १४. "अनेक साहित्यिक संस्थाओं से आपका जुड़ाव है। क्या सामूहिक साहित्यिक गतिविधियाँ लेखन को नई ऊर्जा देती हैं?

उत्तर : "निःसंदेह। साहित्यिक मंच संवाद, विचार-विनिमय और निरंतर सीखने का अवसर देते हैं। सामूहिकता लेखन को नई दृष्टि और ऊर्जा प्रदान करती है।"

प्रश्न १५. आपकी दृष्टि में एक अच्छा साहित्यकार बनने के लिए क्या आवश्यक है?

उत्तर : "संवेदनशीलता, निरंतर अध्ययन, धैर्य और समाज को समझने की दृष्टि बहुत आवश्यक है। साहित्य केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि जीवन का अनुभव है।"

प्रश्न १६. आज के युवाओं, विशेषकर साहित्य में रुचि रखने वाली युवतियों को क्या संदेश देना चाहेंगी?

उत्तर : "अपने सपनों को कभी छोटा मत समझिए। परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, यदि आप निरंतर सीखते और प्रयास करते रहते हैं तो सफलता अवश्य मिलती है। पढ़ना और संवेदनशील बने रहना बहुत ज़रूरी है।"

प्रश्न १७. आपके जीवन का मूल ध्येय क्या है?

उत्तर : "साहित्य और शिक्षा के माध्यम से एक संवेदनशील, जागरूक और मानवीय समाज के निर्माण में अपनी भूमिका निभाना ही मेरे जीवन का ध्येय है।"

प्रश्न १८. अंत में, साहित्य आपके लिए क्या है?

उत्तर : "साहित्य मेरे लिए जीवन का संबल, आत्मा की आवाज़ और समाज से संवाद का सबसे सुंदर माध्यम है।"

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