यादों की गलियों में लौट चलें

यादों की गलियों में लौट चलें

भूमिका

जीवन की सबसे अनमोल पूंजी धन-संपत्ति नहीं, बल्कि वे स्मृतियाँ होती हैं जो समय बीत जाने के बाद भी मन को स्नेह, अपनापन और आत्मीयता से भर देती हैं। बचपन की गलियाँ, माँ के हाथों का स्वाद, संयुक्त परिवार का प्रेम और रिश्तों की सहज ऊष्मा—ये सब केवल बीते हुए पल नहीं, बल्कि हमारे व्यक्तित्व की नींव हैं। स्मृतियाँ हमें यह अहसास कराती हैं कि जीवन की असली समृद्धि भौतिक साधनों में नहीं, बल्कि प्रेम, संस्कार और आत्मीय संबंधों में छिपी होती है।

इसी भावभूमि पर आदरणीया विजया डालमिया जी का यह प्रयास हमें उन सुनहरी यादों के संसार में ले जाता है, जहाँ हर छोटी-सी बात जीवन भर की पूँजी बन जाती है।

आलेख

आओ! यादों की गलियों में लौट चलें! 

विजया डालमिया

यादें कभी स्थिर नहीं रहतीं। वे चलती-फिरती हमारे साथ-साथ चलती हैं। जब मन बीते हुए कल से मुक्त नहीं हो पाता, तब स्मृतियाँ हमें अपने साथ उन गलियों में ले जाती हैं, जहाँ हर मोड़ पर कोई अपना इंतज़ार करता दिखाई देता है।



यादों की ये गलियाँ कभी संकरी होती हैं, तो कभी चुलबुली। इनमें कहीं मुस्कानों की मिठास घुली होती है, तो कहीं उलझनों की जलेबी जैसी टेढ़ी-मेढ़ी, लेकिन स्वादभरी स्मृतियाँ भी साथ चलती हैं।

माँ के हाथों के भोजन का स्वाद शायद ही कोई कभी भूल पाता हो। समय के साथ जब एक बेटी स्वयं माँ बनती है, तो वही अपनापन और वही स्वाद अनजाने में उसके हाथों में उतर आता है। तब उसके बच्चे मुस्कराकर कहते हैं—

"बिल्कुल नानी माँ जैसा स्वाद है!"

यही तो प्रेम की सबसे सुंदर विरासत है, जो बिना किसी घोषणा के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँच जाती है।

स्वाद की बात चले तो याद आता है कि मम्मी, ताईजी या घर की बड़ी महिलाएँ जो भी बनाती थीं, वही विशेष बन जाता था। दिन कोई भी हो, उनके हाथों का बनाया हर व्यंजन त्योहार जैसा लगता था।

आज अनेक प्रकार के व्यंजन उपलब्ध हैं, लेकिन वह स्वाद ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलता। फिर भी जब बहनें कहती हैं—

"बिल्कुल मम्मी भी ऐसा ही बनाती थीं।"

तो लगता है जैसे स्मृतियाँ फिर से जीवित हो उठी हों।

संयुक्त परिवारों में बच्चों से उनकी पसंद पूछकर भोजन बनाने का चलन नहीं था। जो बनता था, वही सब प्रेम से खाते थे और धीरे-धीरे वही हमारी पसंद भी बन जाता था। शायद इसी कारण जीवन में स्वीकार करने की आदत भी सहज रूप से विकसित होती थी।

तीज-त्योहारों की सुबह आज भी आँखों के सामने जीवंत हो उठती है। हमारे जागने से पहले ही मैया, ताईजी और मम्मी मिठाइयाँ और नमकीन बनाकर तैयार कर देती थीं। बड़ी-बड़ी टोकरियों में अख़बार बिछाकर रखे गए पकवानों की सुगंध पूरे घर में फैल जाती थी और बच्चों के चेहरे बिना किसी उपहार के ही खुशी से खिल उठते थे।

हर माँ अपने बच्चे की पसंद जानती है। लेकिन विडंबना यह है कि बड़े होकर वही बच्चे अक्सर माँ की पसंद भूल जाते हैं। दूसरी ओर, माँ तो बच्चे के जन्म के साथ ही अपनी पसंद-नापसंद को पीछे छोड़ देती है।

यही तो प्रेम का सबसे निर्मल रूप है—जहाँ त्याग है, समर्पण है, शुभकामना है, लेकिन प्रदर्शन नहीं।

जब प्रेम बिना किसी मिलावट के रिश्तों में बुना जाता है, तब उसे किसी बाहरी सजावट की आवश्यकता नहीं होती। वह सीधे हृदय में स्थान बना लेता है और अनायास ही मुँह से निकल पड़ता है—

"वाह! अद्भुत!"

माँ का प्रेम भी ऐसी ही अनुपम बुनावट है, जिसे देखकर स्वयं ईश्वर भी कह उठे—"वाह!"

आइए, एक बार फिर उन गलियों में लौट चलें, जहाँ न प्रतिस्पर्धा थी, न दिखावा, न मनमुटाव। वहाँ छोटे-छोटे घरों में बड़े-बड़े दिल बसते थे। उन घरों की सबसे बड़ी धरोहर थी—संस्कार, संकल्प, सहयोग और समर्पित प्रेम।

यही वे आधारशिलाएँ हैं, जिन पर हमारे जीवन की इमारत आज भी मजबूती से खड़ी है। यदि हम इन मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुँचा सकें, तो हमारी सबसे सुंदर विरासत जीवित रहेगी।

निहित भाव

यह लेख केवल बचपन की स्मृतियों का वर्णन नहीं है, बल्कि भारतीय पारिवारिक संस्कृति, मातृत्व और संयुक्त परिवार की आत्मीयता का संवेदनशील चित्रण है। लेखिका बताती हैं कि जीवन की वास्तविक संपत्ति आधुनिक सुविधाएँ नहीं, बल्कि वे संस्कार, प्रेम, त्याग और अपनापन हैं जो परिवार में सहज रूप से मिलते थे।

माँ के हाथों का स्वाद केवल भोजन का स्वाद नहीं, बल्कि उसके निस्वार्थ प्रेम, समर्पण और ममता का स्वाद है। संयुक्त परिवारों की सादगी ने बच्चों को स्वीकार्यता, सहयोग और संतोष का पाठ पढ़ाया। आज भले ही भौतिक सुख-सुविधाएँ बढ़ गई हों, लेकिन रिश्तों की वह गर्माहट और अपनापन कहीं पीछे छूटता जा रहा है।

लेख हमें प्रेरित करता है कि हम अपनी जड़ों, अपने संस्कारों और माता-पिता के त्याग का सम्मान करें तथा अगली पीढ़ी तक प्रेम, सहयोग और आत्मीयता की वही विरासत पहुँचाएँ। यही हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति और जीवन की वास्तविक समृद्धि है।

सृजक

 

 

स्नेह की छाँव

पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति







टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

शिक्षा का उजास (संशोधित) - श्री कुलदीप महुआ

🌼 ज्योति वही, जो मार्ग दिखाए 🌼

संघर्ष, संस्कृत और सफलता का संगम