सृजन के सरोकार और स्त्री-चेतना

साक्षात्कार

सृजन के सरोकार और स्त्री-चेतना

प्रस्तावना

हिन्दी साहित्य के क्षितिज पर अपनी मखमली आवाज़ और हृदयस्पर्शी श्रृंगारिक गीतों से अमिट छाप छोड़ने वाले डॉ. रामकुमार रसिक जी का व्यक्तित्व केवल एक रचनाकार का नहीं, बल्कि एक युग-निर्माता का है। उन्होंने न केवल स्वयं माँ सरस्वती की साधना की, बल्कि 'काव्य-रसिक संस्थान' के माध्यम से देश भर के इक्कीस राज्यों में फैले हज़ारों नवांकुरों को एक नया आसमान दिया है। पूर्व में प्रकाशित उनके साक्षात्कारों में जहाँ उनकी प्रारम्भिक यात्रा और संस्थागत विकास पर चर्चा हुई थी, वहीं 'उलझन सुलझन' (महिला विंग) की राष्ट्रीय संयोजिका श्रीमती विजया डालमिया जी ने इस विशेष संवाद में उनके भीतर छिपे संवेदनशील इंसान, समकालीन साहित्य में महिलाओं की भूमिका, और एक लेखक के सामाजिक सरोकारों को टटोलने का प्रयास किया है। आइए, रसिक जी के अन्तर्मन को छूते इस अनूठे संवाद से जुड़ते हैं।

विषय - अन्तर्मन की उलझनें और कविता का जन्म

श्रीमती विजया डालमिया: "सादर प्रणाम रसिक जी! 'उलझन सुलझन' मंच पर आपका बहुत-बहुत स्वागत है। अक्सर आपकी पंक्तियाँ—"तुम ज़ेहन से भुला तो न दोगे मुझे, सच बताओ रुला तो न दोगे मुझे"—सीधे दिल पर दस्तक देती हैं। एक रचनाकार जब समाज की उलझनों को देखता है, तो क्या उसके भीतर भी कोई द्वंद्व चलता है? कविता उन उलझनों को सुलझाने का माध्यम कैसे बनती है?

डॉ. रामकुमार रसिक: "विजया जी, आपको और आपकी पूरी टीम को मेरा स्नेहिल नमन। आपने बहुत गहरा प्रश्न पूछा है। वास्तव में, लेखक कोई अलग ग्रह का प्राणी नहीं होता। जब मैं समाज में विसंगतियाँ, रिश्तों में बिखराव या किसी का दर्द देखता हूँ, तो वह पीड़ा मेरे भीतर एक उलझन बन जाती है। जब तक मैं उसे कागज़ पर शब्द नहीं दे देता, तब तक मन अशान्त रहता है। कविता दरअसल उस आन्तरिक छटपटाहट की 'सुलझन' है। जब भाव शब्दों में ढलकर गीत बनते हैं, तो वह न सिर्फ मेरे मन को, बल्कि सुनने वाले के मन को भी धीरे से छू लेते हैं और उसे एक सुकून देते हैं।"

विषय:समकालीन लेखन में स्त्री-चेतना और महिला विंग की भूमिका

श्रीमती विजया डालमिया: आप स्वयं सुमित्रा सरल जी जैसी कवयित्रियों के लेखन के प्रशंसक रहे हैं। 'उलझन सुलझन' विशेष रूप से महिला लेखिकाओं के संवर्धन के लिए काम कर रहा है। आज के दौर में, महिला रचनाकारों की अभिव्यक्ति और उनके साहित्य को आप किस रूप में देखते हैं?

डॉ. रामकुमार रसिक: यह बहुत सुखद बदलाव है। एक समय था जब गोष्ठियों में महिला रचनाकारों की संख्या नगण्य होती थी, लेकिन आज वे मंचों की रीढ़ हैं। महिला लेखिकाओं के पास संवेदना की वह गहराई होती है, जो पुरुषों के पास दुर्लभ है। वे जब माँ, बेटी, पत्नी या समाज के संघर्षों पर लिखती हैं, तो उसमें एक अनूठी प्रामाणिकता होती है। आपकी संस्था 'उलझन सुलझन' (महिला विंग) जो कार्य कर रही है, वह वन्दनीय है। मेरा मानना है कि जब तक आधी आबादी के विचारों को मुख्यधारा के साहित्य में पूरा स्थान नहीं मिलेगा, तब तक साहित्य अधूरा रहेगा। हमारी संस्था में भी श्रीमती मीना जैन जी जैसी विदुषी राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में पूरे समर्पण के साथ कमान संभाल रही हैं।

विषय-आभासी (Online) युग में भावनाओं की शुद्धता

श्रीमती विजया डालमिया: आपने तकनीक को अपनाकर देश के कोने-कोने में कवियों को ऑनलाइन मंच दिया। लेकिन एक उलझन यह भी है कि स्क्रीन के इस दौर में क्या वह 'जीवन्त आत्मीयता' और भावनाओं की 'शुद्धता' बची रह पाती है, जो आमने-सामने के कवि सम्मेलनों में होती थी?

डॉ. रामकुमार रसिक: "विजया जी, आपका यह संदेह पूरी तरह तार्किक है। यह सच है कि जो ऊर्जा प्रत्यक्ष रूप से श्रोताओं की 'वाह-वाह' और तालियों में होती है, उसकी तुलना स्क्रीन से नहीं की जा सकती। लेकिन तकनीक एक सेतु (पुल) है। जब दूर-दराज के गाँवों में बैठी कोई प्रतिभावान कवयित्री या कवि, साधनों के अभाव में मुख्यधारा के मंचों तक नहीं पहुँच पाता, तब यह ऑनलाइन माध्यम वरदान साबित होता है। रही बात भावनाओं की, तो यदि कविता में 'भाव पक्ष' मजबूत है, लयबद्धता है, तो वह मोबाइल स्क्रीन को चीरकर भी सुनने वाले के जेहन में उतर जाती है। माध्यम कोई भी हो, आत्मा शुद्ध होनी चाहिए।"

विषय: चाटुकारिता बनाम स्वस्थ लेखन: आज के दौर का सच

श्रीमती विजया डालमिया: आपने पूर्व में भी संकेत दिया था कि आज के कलमकारों को चाटुकारिता छोड़कर 'स्वस्थ लेखन' की ओर लौटना चाहिए। एक राष्ट्रीय मार्गदर्शक के रूप में आप आज की युवा पीढ़ी को इस भटकाव से बचाने के लिए क्या व्यावहारिक सुझाव देंगे?

डॉ. रामकुमार रसिक: "आज का सबसे बड़ा संकट यह है कि लोग रातों-रात प्रसिद्धि चाहते हैं। सोशल मीडिया पर मिलने वाले चंद 'लाइक्स' और 'कमेंट्स' को लोग अपनी योग्यता मान बैठते हैं। मेरा सुझाव बहुत स्पष्ट है—पहला, लिखने से पहले पढ़ने की आदत डालिए। अच्छा साहित्य पढ़िए। दूसरा, आत्ममुग्धता से बचिए। यदि कोई वरिष्ठ या आपकी संस्था की कोई विदुषी आपकी रचना में वर्तनी (spelling) या व्याकरण की त्रुटि सुधारती है, तो उसे सहर्ष स्वीकार कीजिए। चाटुकारिता आपको कुछ समय के लिए तालियाँ तो दिला सकती है, लेकिन कालजयी साहित्य केवल सत्य और ईमानदारी से ही लिखा जा सकता है।"

विषय - भावी पीढ़ी को सौंपे जाने वाले संस्कार

श्रीमती विजया डालमिया: रसिक जी, एक अन्तिम प्रश्न। जब आप मुड़कर अपनी इस विशाल साहित्यिक यात्रा को देखते हैं, तो आने वाली पीढ़ी के लिए अपने गीतों के माध्यम से क्या विरासत छोड़ जाना चाहते हैं?

डॉ. रामकुमार रसिक: "मैं चाहता हूँ कि आने वाली पीढ़ी यह याद रखे कि साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, यह समाज को दिशा देने वाला प्रकाशपुंज है। मेरे गीतों में जहाँ प्रेम और श्रृंगार की सौम्यता है—जैसे "तुम चुपके चुपके, सपनों में आया न करो", वहीं उनमें मर्यादा और संवेदना भी है। मैं अपनी विरासत के रूप में आने वाली पीढ़ी को एक ऐसा मंच और ऐसी सोच सौंपना चाहता हूँ, जहाँ किसी भी नवांकुर को कभी उपेक्षा का शिकार न होना पड़े, और वे गर्व से शुद्ध हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार कर सकें।"

श्रीमती विजया डालमिया: रसिक जी, 'उलझन सुलझन' मंच से जुड़ने और इतनी बेबाकी व आत्मीयता से अपने विचार साझा करने के लिए आपका हृदय से आभार। आपके विचार हम सभी के लिए मार्गदर्शक रहेंगे।

डॉ. रामकुमार रसिक: "बहुत-बहुत धन्यवाद, विजया जी। आपकी संस्था 'उलझन सुलझन' निरन्तर साहित्य की सेवा करती रहे, यही मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ हैं।"

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