शिक्षिका, साहित्यकार एवं सृजनधर्मी व्यक्तित्व हैं पुष्पा जी

कला, गणित और संवेदनाओं का सुंदर संगम

शिक्षिका, साहित्यकार एवं सृजनधर्मी व्यक्तित्व हैं पुष्पा जी  

बातचीत

भूमिका

शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होती, वह जीवन को समझने और समझाने की कला भी है। जब कोई शिक्षक अपने विषय को रचनात्मकता, संवेदनशीलता और जीवन-मूल्यों के साथ जोड़ देता है, तब शिक्षा केवल ज्ञान नहीं रहती, बल्कि एक आनंदमय अनुभव बन जाती है। ऐसे ही प्रेरणास्पद व्यक्तित्व हैं श्रीमती पुष्पा ठाकुर, जो मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा से हैं और गणित विषय की शिक्षिका होने के साथ-साथ साहित्य, संगीत और कला की साधिका भी हैं।

एम.एससी. (गणित) की शिक्षा प्राप्त श्रीमती पुष्पा ठाकुर ने गणित जैसे गंभीर माने जाने वाले विषय को रंगों, आर्ट एवं क्राफ्ट तथा खेल-आधारित गतिविधियों से जोड़कर विद्यार्थियों के लिए सहज और रोचक बना दिया है। उनका मानना है कि एक शिक्षक की वास्तविक पहचान केवल उसके विषय-ज्ञान से नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व, व्यवहार और जीवन-मूल्यों से होती है।

संगीत में उन्हें विशेष रुचि है। स्वर कोकिला लता मंगेशकर उनके लिए केवल एक महान गायिका नहीं, बल्कि सादगी, समर्पण और साधना की जीवंत प्रतिमूर्ति हैं। साहित्य उनके अंतर्मन की अभिव्यक्ति है, जहाँ वे समाज, रिश्तों, प्रेम, स्त्री, बच्चों और जीवन की सच्चाइयों को कविता का स्वर देती हैं।

आइए, जानते हैं उनके विचार, उनकी शिक्षण यात्रा, उनकी साहित्यिक संवेदनाएँ और जीवन-दर्शन।

विशेष साक्षात्कार

प्रश्न १. सबसे पहले अपने बारे में हमारे पाठकों को बताइए।

उत्तर : "मैं श्रीमती पुष्पा ठाकुर, मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा से हूँ और गणित विषय की शिक्षिका हूँ। मैंने नैनपुर (मध्यप्रदेश) से एम.एससी. (गणित) की शिक्षा प्राप्त की है। शिक्षण मेरे लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज निर्माण का माध्यम है। इसके साथ-साथ साहित्य, संगीत और कला मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।"

प्रश्न २. अधिकांश विद्यार्थियों को गणित कठिन लगता है, लेकिन आपको यह विषय इतना प्रिय क्यों है?

उत्तर : "मुझे हमेशा से गणित बहुत रोचक लगा है। गणित केवल संख्याओं का विज्ञान नहीं, बल्कि तर्क, अनुशासन और रचनात्मक सोच का विषय है। यदि इसे सही तरीके से पढ़ाया जाए तो विद्यार्थी इसे बोझ नहीं, बल्कि एक खेल की तरह सीखते हैं।"

प्रश्न 3. आपकी शिक्षण शैली पारंपरिक पद्धति से अलग मानी जाती है। इसके पीछे क्या सोच है?

उत्तर : "मेरा मानना है कि केवल ब्लैकबोर्ड और किताबों तक सीमित रहकर पढ़ाना आज के समय की आवश्यकता नहीं है। मैंने गणित को आर्ट और क्राफ्ट से जोड़ दिया है। रंगों, चार्ट, मॉडल, गतिविधियों और खेलों के माध्यम से बच्चे स्वयं अवधारणाओं को समझते हैं। जब सीखने में आनंद जुड़ जाता है, तब कठिन से कठिन विषय भी सरल हो जाता है।"

प्रश्न ४. क्या कला और गणित का वास्तव में कोई संबंध है?

उत्तर : "निश्चित रूप से। ज्यामिति में आकृतियाँ, सममिति, अनुपात, डिज़ाइन, पैटर्न और रचनात्मकता—ये सभी कला से जुड़े हुए हैं। जब विद्यार्थी स्वयं रंगों और कलात्मक सामग्री से आकृतियाँ बनाते हैं तो गणित उनके लिए जीवंत हो जाता है। सीखना तभी सार्थक है जब वह अनुभव बन जाए।"

प्रश्न ५. आपके अनुसार एक आदर्श शिक्षक की सबसे बड़ी पहचान क्या है?

उत्तर : "एक शिक्षक केवल विषय नहीं पढ़ाता, वह जीवन जीने की कला भी सिखाता है। बच्चे शिक्षक की बातों से अधिक उसके व्यवहार से सीखते हैं। इसलिए शिक्षक का व्यक्तित्व, अनुशासन, संवेदनशीलता और सकारात्मक दृष्टिकोण ही उसकी सबसे बड़ी पहचान है।"

प्रश्न ६. संगीत आपके जीवन में क्या स्थान रखता है?

उत्तर : "संगीत मेरे लिए आत्मिक शांति का माध्यम है। मुझे लता मंगेशकर जी के गीत गाना बहुत पसंद है। उनके गीत गाते हुए ऐसा लगता है मानो मैं एक अलग ही दुनिया में पहुँच गई हूँ। उनकी सादगी, विनम्रता और साधना मुझे हमेशा प्रेरित करती है।"

प्रश्न ७. साहित्य की ओर आपका झुकाव कैसे हुआ?

उत्तर : "मुझे बचपन से पढ़ने और लिखने का शौक रहा है। समाज में जो कुछ भी घटित होता है, वह मेरे मन को प्रभावित करता है। उन्हीं अनुभूतियों को मैं शब्द देती हूँ। मेरा विश्वास है कि साहित्य व्यक्ति के विचारों को व्यापक बनाता है और समाज से गहराई से जोड़ता है।"

प्रश्न ८. आपकी कविताओं के प्रमुख विषय क्या होते हैं?

उत्तर : "मैं जीवन की सच्चाइयों पर लिखना पसंद करती हूँ। रिश्ते, प्रेम, स्त्री, बच्चे, परिवार, समाज और मानवीय संवेदनाएँ मेरी कविताओं के प्रमुख विषय हैं। मैं चाहती हूँ कि मेरी रचनाएँ केवल पढ़ी ही न जाएँ, बल्कि महसूस भी की जाएँ।"

प्रश्न ९. आपकी कविता 'मेरा हिस्सा' के पीछे क्या भाव है?

उत्तर : यह कविता आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच रिश्तों की अनकही जरूरत को व्यक्त करती है। हम अपने काम, जिम्मेदारियों और भागदौड़ में इतना उलझ जाते हैं कि अपनों के लिए समय ही नहीं बचता। कविता केवल कुछ शामों की माँग नहीं करती, बल्कि रिश्तों के लिए समय, संवाद और अपनापन बचाए रखने का संदेश देती है।"

प्रश्न 10. आपके जीवन का मूल मंत्र क्या है?

उत्तर : "मैं मानती हूँ कि जीवन बहुत अनमोल है। स्वयं प्रसन्न रहिए, दूसरों को भी प्रसन्न रखिए। जहाँ तक संभव हो लोगों की सहायता कीजिए, लेकिन बदले में अपेक्षाएँ मत रखिए। यही सुखी जीवन का सबसे सरल मार्ग है।"

प्रश्न ११. आपने 'मनसा, वाचा, कर्मणा' को अपना जीवन सिद्धांत बनाया है। इसका आपके लिए क्या अर्थ है?

उत्तर : "मेरे लिए इसका अर्थ है—विचार, वाणी और कर्म में एकरूपता। जो सोचें वही कहें और जो कहें वही करें। यही व्यक्ति के चरित्र की सबसे बड़ी पहचान है।"

प्रश्न १२. आपकी रचनाएँ विभिन्न समाचार-पत्रों और पुस्तकों में प्रकाशित होती रही हैं। यह अनुभव कैसा रहता है?**

उत्तर : "जब कोई रचना पाठकों तक पहुँचती है और उनके मन को स्पर्श करती है, तो वह लेखक के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होता है। प्रकाशन मुझे और अधिक जिम्मेदारी के साथ लिखने की प्रेरणा देता है।"

प्रश्न १३. आज के विद्यार्थियों और युवा शिक्षकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

उत्तर : "विद्यार्थियों से मैं कहूँगी कि सीखने को कभी बोझ मत समझिए। जिज्ञासु बनिए और हर विषय को समझने का प्रयास कीजिए। युवा शिक्षकों से मेरा आग्रह है कि वे शिक्षा को रचनात्मक बनाएँ। बच्चों को केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए तैयार करें।"

प्रश्न १४. अंत में, आपकी आगामी साहित्यिक और शैक्षणिक योजनाएँ क्या हैं?

उत्तर : "मैं शिक्षा में नवाचार, गतिविधि-आधारित गणित शिक्षण और साहित्य लेखन को निरंतर आगे बढ़ाना चाहती हूँ। मेरी इच्छा है कि मेरी रचनाएँ समाज में सकारात्मक सोच और मानवीय संवेदनाओं को और अधिक मजबूत करें।"

समापन

श्रीमती पुष्पा ठाकुर यह सिद्ध करती हैं कि शिक्षा तब प्रभावी बनती है जब उसमें ज्ञान के साथ संवेदना, कला और जीवन-दृष्टि का समावेश हो। गणित को रंगों से सजाने वाली यह शिक्षिका साहित्य से मनों को जोड़ती हैं और संगीत से आत्मा को स्पंदित करती हैं। उनका व्यक्तित्व शिक्षा, सृजन और मानवीय मूल्यों का ऐसा संगम है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

सूचना स्रोत

श्रीमती प्रमिला त्रिवेदी
स्थानीय संपादिका
उलझन सुलझन, महिला प्रकोष्ठ
बेंगलुरु
प्रस्तुति




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